आगरा के रसोई से सीखें सरसों का साग बनाने का पारंपरिक तरीका, 45 मिनट की धीमी आंच में छिपा है असली स्वादउत्तराखंड के बागेश्वर में डीएम कोर्ट बना आकर्षण का केंद्र, एक ही जगह से दिखते हैं सरयू संगम और ऐतिहासिक बागनाथ मंदिररोशनी के त्योहार पर बजट फ्रेंडली खरीदारी के लिए दिल्ली के शीर्ष पांच बाजारबैंक ऑफ इंग्लैंड की ब्याज दर बैठक से पहले ब्रिटिश पाउंड में उछाल, डॉलर पर बढ़ा दबावखातेगांव में अवैध शराब लदे वाहन ने पुलिस अधिकारी को रौंदा, 1 करोड़ रुपये की मदद का ऐलानकोहरे के चलते मुरादाबाद रेल मंडल से गुजरने वाली 26 ट्रेनें पूरी तरह रद्द, 16 के फेरे घटेजमीन की हलचल पर पैनी नजर रखने के लिए देशभर में खुलेंगे सौ नए भूकंप केंद्रगुजरात के स्कूलों में कम नंबर पर सार्वजनिक डांट पर रोक, विद्यार्थियों के मानसिक तनाव से निपटने के लिए बने सख्त नियमघर में लगे मोगरे में नहीं खिल रहे फूल, बागवानी विशेषज्ञ चेतना भल्ला ने बताए कलियों से भरने के तरीकेदीपावली पूर्व 6 नवंबर तक लक्ष्मीनारायण व बुधादित्य योग, मकर समेत इन राशियों पर धनवर्षा के संकेत
कोत्तूरु ताडेपल्ली में वैदिक धरोहर की साधना, 15 वर्षों के कड़े अनुशासन से तैयार होते हैं घनपाठीकल्चर
2 नव॰ 2026, 1:40 pm (1 घंटे पहले)· 1

कोत्तूरु ताडेपल्ली में वैदिक धरोहर की साधना, 15 वर्षों के कड़े अनुशासन से तैयार होते हैं घनपाठी

तेलंगाना के ग्रामीण अंचल में स्थित श्री षण्मुख वेद विद्यालयम पारंपरिक श्रुति पद्धति और कठोर गुरुकुल नियमों के जरिए वैदिक विद्वानों की नई पीढ़ी तैयार कर रहा है।

प्राकृतिक हरियाली और शांत आबोहवा के बीच बसा कोत्तूरु ताडेपल्ली गांव आज प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा के एक जीवंत केंद्र के रूप में अपनी विशेष पहचान बना रहा है। समकालीन भागदौड़ और डिजिटल युग के प्रभाव से दूर, इस शांत गांव में स्थित श्री षण्मुख वेद विद्यालयम पारंपरिक गुरुकुल व्यवस्था को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहा है। यहाँ आने वाले युवा शिक्षार्थी वर्षों तक कठोर साधना, कड़े अनुशासन और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए प्राचीन वैदिक ग्रंथों का गहन अध्ययन करते हैं, जिससे भारत की सहस्राब्दियों पुरानी मौखिक शिक्षण परंपरा अक्षुण्ण बनी हुई है।

आधुनिक उच्च शिक्षा के समकक्ष उपाधियाँ और कठोर साधना

आधुनिक अकादमिक जगत में जिस प्रकार लंबे शोध और गहन अध्ययन के पश्चात विद्यार्थियों को डॉक्टरेट अथवा पीएचडी जैसी सर्वोच्च उपाधियाँ प्रदान की जाती हैं, उसी प्रकार श्री षण्मुख वेद विद्यालयम में भी ज्ञान के स्तर और महारत के आधार पर वैदिक उपाधियाँ दी जाती हैं। यहाँ का पाठ्यक्रम सामान्य औपचारिक शिक्षा से काफी भिन्न और अत्यधिक संयम की मांग करने वाला है। विद्यार्थियों को प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त से लेकर देर शाम तक कड़े नियमों के तहत जीवन व्यतीत करना होता है, जहाँ उनका पूरा ध्यान केवल वेदों के मंत्रों को आत्मसात करने और उनकी शुद्धता बनाए रखने पर केंद्रित रहता है।

ये भी पढ़ें

क्रमपाठी से भाष्याचार्य तक की बहुस्तरीय यात्रा

गुरुकुल में वेदों का अध्ययन अलग-अलग चरणों में व्यवस्थित किया गया है, जिसकी जानकारी देते हुए डॉ. कप्पगंतु रामकृष्ण ने इसके विभिन्न सोपानों को स्पष्ट किया है। प्रारंभिक स्तर पर संहिता और क्रम पाठ सीखने में विद्यार्थियों को लगभग 10 वर्षों का लंबा समय लगता है। इस कठिन प्रारंभिक पड़ाव को सफलतापूर्वक पार करने वाले छात्र को 'क्रमपाठी' या 'अवधानी' की उपाधि से विभूषित किया जाता है। इसके पश्चात शुरू होने वाला अगला चरण कहीं अधिक पेचीदा और बौद्धिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है, जिसे जटा पाठ और घन पाठ के नाम से जाना जाता है।

इस अत्यंत कठिन स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने और इसे पूरा करने में 12 से 15 साल का समय लग जाता है। जो अध्येता इस मुकाम को हासिल करने में सफल रहते हैं, उन्हें 'घनपाठी' का सम्मान मिलता है। ज्ञान की यह साधना यहीं समाप्त नहीं होती, बल्कि आगे के विशिष्ट और विस्तृत अध्ययन के उपरांत शिक्षार्थी 'सलक्षण घनपाठी' बनते हैं। जब कोई विद्वान वेदों के गूढ़ दार्शनिक अर्थों, व्याख्याओं और अंतर्निहित सिद्धांतों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर लेता है, तब उसे 'भाष्याचार्य' की सर्वोच्च प्रतिष्ठा दी जाती है।

श्रुति परंपरा और मंत्रों की ध्वन्यात्मक शुद्धता का संरक्षण

कोत्तूरु ताडेपल्ली के इस गुरुकुल में वेदों का ज्ञान मात्र लिखित पुस्तकों या पांडुलिपियों के जरिए नहीं दिया जाता। यहाँ सदियों पुरानी पारंपरिक श्रुति परंपरा का पूरी प्रामाणिकता के साथ पालन किया जाता है। इस मौखिक विधा में विद्यार्थी अपने गुरु के मुख से प्रत्येक मंत्र का उच्चारण, उसका आरोह-अवरोह, लयबद्ध ताल और स्वर भेद को एकाग्रचित्त होकर सुनते हैं और फिर उसे पूरी शुद्धता के साथ कंठस्थ करते हैं। उच्चारण की यह सूक्ष्म तकनीक मंत्रों की मूल ध्वन्यात्मक शुद्धता को बिना किसी विकार के पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखने में सहायक सिद्ध होती है।

गांव का शांत और प्राकृतिक वातावरण शिक्षार्थियों को गहन मानसिक एकाग्रता बनाए रखने के लिए एक आदर्श परिवेश उपलब्ध कराता है। इस गुरुकुल से अपनी वर्षों की तपस्या और औपचारिक शिक्षा पूरी करने के बाद ये वैदिक विद्वान देश के अलग-अलग क्षेत्रों में जाते हैं, जहाँ वे इस प्राचीन ज्ञान का निरंतर प्रचार-प्रसार करते हैं। इसी समर्पित शैक्षणिक प्रयास के चलते कोत्तूरु ताडेपल्ली आज वैदिक विधाओं के उच्च कोटि के विद्वान गढ़ने वाले एक प्रतिष्ठित ग्रामीण संस्थान के रूप में निरंतर ख्याति अर्जित कर रहा है।

सवाल-जवाब

कोत्तूरु ताडेपल्ली गांव किस विशेषता के लिए जाना जाता है?
यह गांव प्राचीन गुरुकुल परंपरा और श्री षण्मुख वेद विद्यालयम के माध्यम से वैदिक अध्ययन को जीवित रखने के लिए प्रसिद्ध है।
वैदिक अध्ययन में 'क्रमपाठी' या 'अवधानी' की उपाधि कब मिलती है?
प्रारंभिक संहिता और क्रम पाठ के लगभग 10 वर्षों के कठोर अध्ययन को सफलतापूर्वक पूरा करने पर यह उपाधि दी जाती है।
'घनपाठी' बनने में एक विद्यार्थी को कितना समय लगता है?
जटा और घन पाठ जैसे जटिल चरणों को पूरा करके घनपाठी बनने में 12 से 15 वर्ष का समय लग जाता है।
वेदों के अध्ययन में 'भाष्याचार्य' की पदवी किसे प्राप्त होती है?
सलक्षण घनपाठी के उपरांत जब कोई विद्वान वेदों के गूढ़ दार्शनिक अर्थ और दर्शन का संपूर्ण ज्ञान अर्जित कर लेता है, तब उसे भाष्याचार्य कहा जाता है।
यहाँ वेदों को कंठस्थ कराने के लिए किस पद्धति का उपयोग किया जाता है?
यहाँ पारंपरिक श्रुति पद्धति का पालन होता है, जहाँ विद्यार्थी गुरु के मुख से सुनकर शुद्ध उच्चारण और लय के साथ मंत्र याद करते हैं।
शिक्षा पूरी करने के बाद यहाँ के वैदिक विद्वान क्या करते हैं?
अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद ये विद्वान देश के विभिन्न भागों में जाकर प्राचीन वैदिक ज्ञान और संस्कृति का प्रचार-प्रसार करते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp