उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अभी औपचारिक चुनावी शंखनाद होना बाकी है, लेकिन प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने रणनीतिक दांव और बयानबाजी की धार तेज कर दी है। भारतीय जनता पार्टी राज्य में लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटने की तैयारी में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव नए सामाजिक गठजोड़ के जरिए सत्ता पक्ष की घेराबंदी करने में लगे हैं। इस राजनीतिक मुकाबले की शुरुआती रूपरेखा तब और स्पष्ट हो गई जब लखनऊ में आयोजित पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति बैठक के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य की मौजूदा सत्ता को अंगद का पैर करार देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में इसे कोई डिगा नहीं सकता। इसके तुरंत बाद दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में जनसभा को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने जोरदार पलटवार किया और तंज कसा कि जब राजनीतिक जमीन ही नहीं बचेगी तो पैर रखने की जगह कहां से मिलेगी। इस जुबानी जंग ने साफ कर दिया है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सरकार और समाजवादी पार्टी के बीच चुनावी बिसात पूरी तरह बिछ चुकी है।
बीजेपी की रणनीति और 300 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य
आगामी 2027 के चुनाव में दो बिल्कुल विपरीत राजनीतिक विचारधाराओं और रणनीतियों का टकराव देखने को मिल रहा है। भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह अपने सांगठनिक ढांचे, बूथ प्रबंधन और 300 से अधिक सीटें जीतने के संकल्प को आगे बढ़ा रही है। लखनऊ में 30 अक्टूबर को हुई बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को 2017 के विधानसभा चुनाव के ऐतिहासिक प्रदर्शन की याद दिलाई, जहां पार्टी ने 312 सीटों पर शानदार जीत हासिल की थी और लगभग 40 फीसदी वोट शेयर अपने नाम किया था। अमित शाह ने कार्यकर्ताओं से उसी जोश के साथ मैदान में उतरने और लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का आह्वान किया। इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने 27 अक्टूबर को सार्वजनिक मंच से दोहराया था कि आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी 300 से अधिक सीटें जीतकर फिर से सत्ता संभालेगी।
बीजेपी के इस बड़े चुनावी दावे के पीछे मुख्य रूप से तीन मजबूत आधार दिखाई देते हैं। पहला आधार पार्टी का मजबूत संगठन है, जिसका नेटवर्क राज्य के हर बूथ स्तर तक सक्रियता से काम करता है। दूसरा आधार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार का कामकाज, कानून व्यवस्था पर सख्त रुख और बुनियादी विकास से जुड़ी जनकल्याणकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन है, जिसे पार्टी चुनावी मैदान में सबसे बड़ा हथियार बना रही है। तीसरा आधार हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एजेंडा है। बैठक के दौरान अमित शाह ने राम मंदिर आंदोलन के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख किया और कार्यकर्ताओं के सामने यह प्रतिबद्धता भी रखी कि राज्य में लगातार तीसरी बार सरकार बनने पर समान नागरिक संहिता को लागू किया जाएगा।
प्रतीकों की जंग और काशी के नतीजों पर राजनीतिक वार-पलटवार
अंगद के पैर की उपमा रामायण के उस प्रसंग से प्रेरित है, जिसमें अंगद ने लंका में रावण की पूरी सभा के सामने अपना पैर जमा दिया था और चुनौती दी थी कि कोई उसे हिला नहीं सकता। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस धार्मिक और सांस्कृतिक उपमा का उपयोग बीजेपी के अटूट राजनीतिक जनाधार, सांगठनिक शक्ति और चुनावी अजेयता को दर्शाने के लिए किया था। हालांकि, समाजवादी पार्टी ने इसी रूपक को बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है।
अखिलेश यादव ने 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि जो नेता उत्तर प्रदेश में सरकार को अंगद का पैर बता रहे हैं, वे वास्तविक धरातल की सच्चाई से अनजान हैं। उन्होंने कहा कि जब जनता के बीच से सियासी जमीन ही खिसक चुकी है, तो पैर टिकाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। अपने इस दावे को मजबूती देने के लिए सपा प्रमुख ने वाराणसी में हुए विधान परिषद चुनाव के नतीजों का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि काशी की जनता ने तथाकथित डबल इंजन सरकार को डबल जीरो थमा दिया है, जिससे यह साबित होता है कि जनता का विश्वास अब मौजूदा सरकार से उठ चुका है।
अखिलेश यादव का पीडीए फॉर्मूला और सामाजिक विस्तार का प्रयास
समाजवादी पार्टी की 2027 की चुनावी रणनीति का मुख्य आधार पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठबंधन है। अखिलेश यादव ने जून 2023 में औपचारिक रूप से इस राजनीतिक फॉर्मूले को पेश किया था। इस रणनीति का मुख्य मकसद समाजवादी पार्टी की पारंपरिक पहचान, जो मुख्य रूप से यादव और मुस्लिम मतदाताओं तक सीमित मानी जाती थी, उससे आगे बढ़कर एक व्यापक सामाजिक आधार तैयार करना है। इसके तहत पार्टी गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित समुदायों और विभिन्न अल्पसंख्यक वर्गों को एक मंच पर लाने की कोशिश में जुटी है।
राजनीतिक परिस्थितियों और आवश्यकता के अनुसार अखिलेश यादव ने समय-समय पर इस फॉर्मूले के दायरे को और अधिक लचीला बनाया है। कई मौकों पर उन्होंने पी शब्द की व्याख्या में पंडित और ए शब्द के संदर्भ में अग्रवाल जैसे अगड़ी जातियों के समूहों को भी शामिल करने की बात कही है, जिससे यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी समाज के अन्य वर्गों के लिए भी अपने दरवाजे खोल रही है। इसके अतिरिक्त सपा नेतृत्व ने पीडीए के दायरे में पीड़ित, दुखी और अपमानित महसूस करने वाले तमाम सामाजिक तबकों को भी जोड़ने की बात कही है, ताकि इसे महज तीन जातियों का गठजोड़ न मानकर एक बड़ा जन आंदोलन बनाया जा सके।
टिकट बंटवारे की नई योजना और 2027 की प्रमुख चुनौतियां
समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि पीडीए सिर्फ एक चुनावी नारा बनकर न रह जाए, बल्कि संबंधित वर्गों को सत्ता और संगठन में ठोस भागीदारी का सच्चा अहसास भी हो। पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया में इस सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता देने की रूपरेखा तैयार कर रही है। इस रणनीति के तहत सामान्य श्रेणी की विधानसभा सीटों पर भी दलित समाज के योग्य उम्मीदवारों को उतारने के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। चुनावी तैयारियों से जुड़ी रणनीतिक चर्चाओं में यह बात सामने आई है कि पार्टी 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर दलित और अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि के प्रत्याशियों को टिकट देकर नया राजनीतिक समीकरण गढ़ने की योजना बना रही है।
हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में इस फॉर्मूले के दम पर समाजवादी पार्टी ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की थी, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव में इसे दोहराना कई कठिन चुनौतियों से घिरा हुआ है। सबसे पहली चुनौती दलित समुदाय के भीतर मौजूद विभिन्न उप-जातियों और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को एक साथ साधे रखने की है, क्योंकि अलग-अलग इलाकों में उनकी राजनीतिक पसंद भिन्न हो सकती है। दूसरी बड़ी चुनौती गैर-यादव पिछड़ी जातियों का विश्वास जीतना है, जहां भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में अपने मजबूत सांगठनिक तंत्र और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए गहरा प्रभाव जमा रखा है। तीसरी चुनौती मुस्लिम मतदाताओं के बीच अपने पारंपरिक जुड़ाव को पूरी तरह अक्षुण्ण रखते हुए अन्य सभी वर्गों के साथ एक स्थायी और ठोस चुनावी गोलबंदी तैयार करने की है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी का संगठन और 300 पार का संकल्प भारी पड़ता है या अखिलेश यादव की सामाजिक गोलबंदी नया इतिहास लिखती है।





















