राजस्थान के अजमेर जिले में लगने वाले अंतरराष्ट्रीय पुष्कर पशु मेले की औपचारिक शुरुआत से पहले ही समूचे इलाके में रौनक छाने लगी है। पुष्कर के स्थानीय बाजारों में पशुओं को सजाने वाले आभूषणों और पारंपरिक वस्त्रों की दुकानें पूरी तरह सज चुकी हैं। इस सालाना आयोजन का मुख्य आकर्षण ऊंटों की अनूठी साज-सज्जा रहती है, जहां पशुपालक अपने मवेशियों को सिर से लेकर पैर तक रंगीन सामानों, पारंपरिक जेवरों और फूलों से तैयार करते हैं।
आभूषणों और सजावट पर आने वाला खर्च
पुष्कर मेले के दौरान पशुओं को सजाने की मांग तेजी से बढ़ती है। स्थानीय स्तर पर पशुओं के श्रृंगार का कारोबार करने वाले राजेंद्र प्रताप के अनुसार, एक ऊंट की सामान्य सजावट तैयार कराने में लगभग 20 से 22 हजार रुपये की लागत आती है। यदि कोई पशुपालक विशेष गुणवत्ता वाले और फूलों से लदे भारी श्रृंगार का विकल्प चुनता है, तो इसका बजट 25 से 30 हजार रुपये से लेकर 40 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। यह पूरा खर्च सामग्री की बनावट, कारीगरी और खरीदार की पसंद पर तय होता है।
पारंपरिक जेवरों से तैयार होता है ऊंट का शाही रूप
ऊंट की सजावट में कई प्रकार की पारंपरिक राजस्थानी वस्तुएं उपयोग में लाई जाती हैं। पशुपालक अपने ऊंट के अलग-अलग हिस्सों को सजाने के लिए प्लान, परची, गोरबंद, जाली, ताल पेटी, नेवरी, गलामी, घुंघरू और ताजे फूलों के गजरों का इस्तेमाल करते हैं। जब यह पूरा पारंपरिक साजो-सामान ऊंट पर चढ़ाया जाता है, तो वह मेले के विशाल मैदान में आने वाले पर्यटकों और खरीदारों के बीच आकर्षण का बड़ा केंद्र बन जाता है। इन आभूषणों की चमक और भव्यता के आगे आम पारंपरिक सजावट भी फीकी लगने लगती है।
घोड़ों और घोड़ियों की साज-सज्जा के विकल्प और बजट
बाजारों में केवल ऊंट ही नहीं, बल्कि घोड़ों और घोड़ियों की सजावट के लिए भी विस्तृत वैरायटी मौजूद है। राजेंद्र प्रताप बताते हैं कि घोड़ी के लिए साधारण स्तर का सजावटी सामान 8 से 10 हजार रुपये के बीच मिल जाता है। दूसरी तरफ, उत्कृष्ट गुणवत्ता, बारीक कढ़ाई और आकर्षक डिजाइन वाले श्रृंगार सेट की कीमत 20 से 25 हजार रुपये तक जाती है।
देशभर से खरीदारी करने पहुंच रहे व्यापारी और पशुपालक
पुष्कर में उपलब्ध इस विशेष पारंपरिक शिल्प की मांग सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं है। मेले में गुजरात, महाराष्ट्र और बिहार समेत देश के तमाम हिस्सों से पशु व्यापारी और चरवाहे डेरा डालते हैं। यहां आने वाले खरीदार न केवल मवेशियों के सौदे करते हैं, बल्कि अपनी पसंद के अनुसार ऊंटों और घोड़ियों के पारंपरिक आभूषण खरीदकर अपने गृह राज्यों में भी ले जाते हैं।


















