तेल की महंगाई से जूझ रहे भारतीय ग्राहकों के लिए एक अच्छी खबर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से नीचे आ गए हैं और भाव अब वहीं पहुंच गया है, जहां अमेरिका और ईरान के बीच टकराव शुरू होने से पहले था। दिन के कारोबार में तो ब्रेंट क्रूड एक समय 70 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे फिसल गया था। फिलहाल यह 0.46 फीसदी की गिरावट के साथ 73.28 डॉलर प्रति बैरल पर चल रहा है। वहीं अमेरिकी कच्चा तेल भी लुढ़ककर 69.95 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है।
कच्चे तेल में आई इस बड़ी नरमी का सीधा फायदा यह हो सकता है कि देश के अंदर पेट्रोल और डीजल के दामों में कटौती का रास्ता खुले। बीते कुछ हफ्तों में मध्य-पूर्व में पैदा हुए संकट की वजह से तेल की कीमतों में जो जबरदस्त उछाल आया था, वह अब लगभग पूरी तरह गायब हो चुका है।
दामों में गिरावट की असली वजह
कीमतों के इस तरह टूटने के पीछे सबसे बड़ी वजह ईरान की वैश्विक तेल बाजार में दोबारा वापसी है। अमेरिका और ईरान के बीच बनी सहमति के बाद अब बड़ी तादाद में तेल टैंकर होर्मुज जलडमरूमध्य से अपनी ट्रैकिंग प्रणाली चालू रखते हुए सुरक्षित निकल रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि दुनिया भर में तेल की आपूर्ति एक बार फिर सामान्य पटरी पर लौटती दिख रही है।
इस समय खरीदारों की पौ-बारह है, क्योंकि बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता उम्मीद से कहीं ज्यादा हो गई है। रिफाइनरी कंपनियों और खरीदारों के पास मध्य-पूर्व से लेकर पश्चिम अफ्रीका तक, दुनिया के तमाम बड़े तेल निर्यातक इलाकों से लगातार नए सौदों के प्रस्ताव आ रहे हैं। माना जा रहा है कि ईरान के विशाल तेल भंडार के बाजार में उतरने से आने वाले दिनों में सप्लाई और बढ़ेगी, जिससे दाम और नीचे जा सकते हैं।
बाजार में दिखा बेयरिश कॉन्टैंगो
कीमतों में आई इस सुस्ती का असर ब्रेंट क्रूड के प्रॉम्प्ट स्प्रेड पर भी साफ नजर आने लगा है। बुधवार को तेल बाजार का यह बेहद अहम संकेतक मध्य-पूर्व में टकराव शुरू होने के बाद पहली बार तकनीकी तौर पर बेयरिश कॉन्टैंगो की स्थिति में पहुंच गया।
कमोडिटी जानकारों का कहना है कि बेयरिश कॉन्टैंगो का सीधा मतलब यही होता है कि इस वक्त बाजार में तुरंत मिलने वाले तेल की मांग के मुकाबले उसकी सप्लाई कहीं ज्यादा है। यह इस बात का तकनीकी इशारा है कि निकट भविष्य में भी कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना रहने वाला है।













