देशभर के शिक्षण संस्थानों से हर वर्ष लाखों छात्र उच्च शिक्षा की डिग्रियां लेकर बाहर आते हैं। इन युवाओं और उनके परिवारों का यह सपना होता है कि कॉलेज की पढ़ाई पूरी होते ही एक बेहतरीन और स्थिर करियर की शुरुआत हो जाएगी। हालांकि, मौजूदा रोजगार बाजार के आंकड़े इस उम्मीद के विपरीत एक अलग ही कहानी बयां कर रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 15 से 29 वर्ष की उम्र के भारतीय स्नातकों में से बमुश्किल 26 प्रतिशत युवाओं के पास ही नियमित वेतन वाली नौकरियां उपलब्ध हैं। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि यदि सौ स्नातकों का आकलन किया जाए, तो उनमें से मात्र छब्बीस लोगों को ही हर महीने निश्चित आय प्राप्त हो रही है।
गुणवत्तापूर्ण रोजगार का गंभीर संकट
इस पूरी स्थिति का सबसे डराने वाला पहलू केवल नौकरी का न होना नहीं, बल्कि जो नौकरियां मिल रही हैं उनकी खराब गुणवत्ता है। आंकड़ों पर गौर करें तो हर सौ युवा स्नातकों में से केवल चार लोगों के पास ही ऐसा रोजगार है जिसमें लिखित अनुबंध, सवेतन अवकाश और सामाजिक सुरक्षा जैसे लाभ शामिल होते हैं। अधिकांश युवा बिना किसी औपचारिक समझौते के काम करने को मजबूर हैं। इसका परिणाम यह है कि रोजगार में होने के बावजूद उन्हें किसी प्रकार की दीर्घकालिक सुरक्षा या वित्तीय स्थिरता का लाभ नहीं मिल पा रहा है और उन्हें अस्थायी या कम सुविधाओं वाले कामों से संतोष करना पड़ रहा है।
युवाओं के कामकाजी स्वरूप का वितरण
विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय 15 से 29 वर्ष के युवा स्नातकों की वर्तमान स्थिति का ब्योरा इस प्रकार है
- 26 प्रतिशत युवा नियमित वेतन वाले रोजगार में हैं।
- 10 प्रतिशत युवा स्वतंत्र रूप से अपना व्यवसाय चला रहे हैं।
- 11 प्रतिशत युवा बिना किसी वेतन के अपने पारिवारिक कारोबार में हाथ बंटा रहे हैं।
- 3 प्रतिशत युवा दिहाड़ी या छोटे असंगठित कार्यों में संलग्न हैं।
- 15 प्रतिशत युवा रोजगार की तलाश में सक्रिय रूप से बेरोजगार हैं।
- 35 प्रतिशत युवा श्रम शक्ति का हिस्सा ही नहीं हैं।
केवल डिग्री हासिल करना क्यों नाकाफी है
तथ्यों से यह बात साफ हो जाती है कि देश में संकट केवल रोजगार की कुल संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि उस कार्य की प्रकृति भी एक बड़ा सवाल है। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भी कई नौजवानों को उनकी क्षमता के अनुरूप अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। कुछ लोगों को बेहद कम पारिश्रमिक पर काम करना पड़ रहा है, तो कुछ को रोजगार पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है। जानकारों का कहना है कि अब समय आ गया है जब केवल रोजगार के आंकड़े बढ़ाने के बजाय उसकी गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए। इसके लिए उद्योगों की वास्तविक मांगों के अनुकूल कौशल विकास कार्यक्रमों और प्रशिक्षण को बढ़ावा देना आवश्यक है। देश की युवा आबादी को अक्सर उसकी सबसे बड़ी ताकत के रूप में देखा जाता है, लेकिन यदि शिक्षित युवा ही सुरक्षित और आकर्षक रोजगार से वंचित रहेंगे, तो इसका सीधा असर उनकी व्यक्तिगत उन्नति के साथ-साथ देश की संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।



















