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डेयरी से कमाई का पक्का रास्ता: मुर्रा, मेहसाना और भदावरी जैसी इन भैंसों के दम पर बदल रही किसानों की किस्मतव्यापार
13 जून 2026, 12:08 pm (46 दिन पहले)· 0

डेयरी से कमाई का पक्का रास्ता: मुर्रा, मेहसाना और भदावरी जैसी इन भैंसों के दम पर बदल रही किसानों की किस्मत

खेती के साथ डेयरी को आय का बड़ा जरिया बना रहे किसान अब उन्नत नस्ल की भैंसों की ओर बढ़ रहे हैं। जानिए मुर्रा, मेहसाना, जाफराबादी और भदावरी नस्लें क्यों बन रही हैं पहली पसंद और किन बातों का रखना है ध्यान।

खेती-किसानी के साथ-साथ पशुपालन अब भीलवाड़ा जिले समेत कई इलाकों में किसानों की जेब भरने का भरोसेमंद जरिया बन चुका है। बात सिर्फ दूध बेचने की नहीं रही, बल्कि इसे एक नियमित और स्थायी रोजगार की तरह देखा जाने लगा है। यही वजह है कि पारंपरिक तरीके से पशु पालने वाले किसान अब सोच-समझकर ऐसी भैंसें चुन रहे हैं जो खर्च कम लें और दूध ज्यादा दें। दूध और डेयरी उत्पादों की लगातार बढ़ती खपत ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। जानकारों का साफ कहना है कि अगर नस्ल का चुनाव सही हो और पशु की देखभाल ठीक से की जाए, तो यह व्यवसाय मोटा मुनाफा दे सकता है।

मुर्रा — डेयरी की रीढ़ मानी जाने वाली नस्ल

जो किसान डेयरी शुरू करने की तैयारी में हैं, उनके बीच मुर्रा भैंस का नाम सबसे ऊपर आता है। पूरे देश में इसे भरोसे की नस्ल माना जाता है, और इसकी सबसे बड़ी खूबी है इसका भरपूर तथा ऊंची गुणवत्ता वाला दूध। मुर्रा के दूध में फैट यानी वसा की मात्रा अधिक होती है, और यही बात डेयरी चलाने वालों के लिए सीधे मुनाफे में बदल जाती है। एक स्वस्थ मुर्रा भैंस रोजाना कई लीटर दूध आराम से दे देती है। मजबूत शरीर और हर तरह की जलवायु में खुद को ढाल लेने की इसकी क्षमता ही वह कारण है, जिसके चलते राजस्थान समेत कई राज्यों के पशुपालक इसे अपनी पहली पसंद मानते हैं।

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मेहसाना और जाफराबादी — मुर्रा के दमदार विकल्प

मुर्रा अकेली बेहतरीन नस्ल नहीं है। गुजरात क्षेत्र से जुड़ी मेहसाना भैंस भी दूध उत्पादन में पीछे नहीं है। इसका शांत स्वभाव और अच्छी उत्पादन क्षमता इसे राजस्थान और भीलवाड़ा के किसानों के बीच लोकप्रिय बनाती है। इसे पालना अपेक्षाकृत आसान है, और संतुलित आहार मिलते रहने पर यह लंबे अरसे तक अच्छा दूध देती रहती है। इसके अलावा जाफराबादी नस्ल भी एक बढ़िया विकल्प के रूप में सामने आती है। आकार में बड़ी और शरीर से मजबूत यह भैंस अच्छी-खासी मात्रा में दूध देती है। कई पशुपालक इन्हीं नस्लों के बल पर अपनी कमाई बढ़ा रहे हैं और डेयरी कारोबार का दायरा भी फैला रहे हैं।

भदावरी — ज्यादा फैट, ज्यादा कमाई

फैट के मामले में भदावरी नस्ल की भैंस किसानों के लिए खास फायदेमंद साबित हो रही है। इसका दूध खासतौर पर अधिक वसायुक्त होता है, जिससे घी और दूसरे डेयरी उत्पाद बेहतर बनते हैं। बाजार में ज्यादा फैट वाले दूध की मांग हमेशा बनी रहती है, इसलिए यह नस्ल पशुपालकों को अतिरिक्त आमदनी का मौका देती है। लेकिन यहां एक जरूरी बात समझनी होगी — सिर्फ ज्यादा दूध देने वाली नस्ल खरीद लेना काफी नहीं है। पशुओं को संतुलित आहार, साफ पानी और सही आवास देना भी उतना ही अनिवार्य है। सही प्रबंधन के साथ ही ये नस्लें लंबे समय तक अच्छा उत्पादन देती हैं।

रोग प्रतिरोधक क्षमता बचाती है इलाज का खर्च

इन उन्नत नस्लों की एक और बड़ी ताकत इनकी मजबूत इम्युनिटी है। दूसरी नस्लों के मुकाबले ये भैंसें कम बीमार पड़ती हैं, जिसका सीधा फायदा यह है कि दवा और इलाज पर होने वाला खर्च घट जाता है। हालांकि इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि इन्हें देखभाल की जरूरत ही नहीं पड़ती। समय पर टीकाकरण, नियमित स्वास्थ्य जांच और साफ-सफाई का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है। जब पशु स्वस्थ रहते हैं तो दूध उत्पादन में रुकावट नहीं आती और किसान को आर्थिक नुकसान नहीं उठाना पड़ता।

खरीदने से पहले इन बातों की पड़ताल जरूरी

आने वाले वर्षों में डेयरी कारोबार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाने वाला है। इसलिए किसानों को सलाह दी जाती है कि भैंस खरीदने से पहले उसकी नस्ल, सेहत, दूध देने की क्षमता और उम्र की पूरी जानकारी जरूर जुटा लें। साथ ही हरे चारे, सूखे चारे और खनिज मिश्रण का संतुलित इस्तेमाल करें, ताकि पशु स्वस्थ रहकर अधिक दूध दे सकें। अगर किसान उन्नत नस्लों को चुनकर आधुनिक पशुपालन तकनीकें अपनाएं, तो डेयरी उनके लिए टिकाऊ और मुनाफेदार रोजगार बन सकती है — इससे न केवल परिवार की आमदनी बढ़ेगी, बल्कि गांवों की आर्थिक तस्वीर भी बदलेगी।

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