खरीफ सीजन के दौरान धान की खेती देश के किसानों के लिए सबसे अहम फसलों में शुमार होती है। इन दिनों खेतों में धान की फसल तेजी से अपनी बढ़त ले रही है। रोपाई का दौर बीतने के बाद अब पौधों में नई पत्तियों के निकलने और कल्ले फूटने की प्रक्रिया जोर पकड़ने लगती है। फसल के विकास के इस संवेदनशील दौर में पौधों को अतिरिक्त पोषण की आवश्यकता होती है। यदि इस चरण में खेतों में उर्वरकों का प्रबंधन वैज्ञानिक तरीके से किया जाए, तो न केवल पौधों की ग्रोथ अच्छी होती है बल्कि स्वस्थ और मजबूत कल्लों की संख्या में भी इजाफा होता है, जिसका सीधा और सकारात्मक असर अंततः बंपर पैदावार के रूप में सामने आता है।
उर्वरकों के इस्तेमाल में सावधानी और सही मात्रा का महत्व
बहुत से किसान यह मान लेते हैं कि खेतों में अंधाधुंध और अधिक मात्रा में खाद डालने से उत्पादन बढ़ जाता है, लेकिन यह धारणा बिल्कुल गलत है। खाद का इस्तेमाल करने से पहले खेत की मिट्टी की उपजाऊ शक्ति, धान की बोई गई किस्म, रोपाई का तरीका, सिंचाई के साधन और पहले दी जा चुकी खाद की मात्रा का पूरा आकलन करना बेहद आवश्यक होता है। अक्सर किसान भाई दूसरी टॉप ड्रेसिंग करते वक्त यूरिया की सही मात्रा को लेकर चूक कर बैठते हैं। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने पर पौधे जरूरत से ज्यादा हरे और कोमल हो जाते हैं, जिससे कीटों और बीमारियों का हमला होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा, फसल के गिरने की आशंका भी पैदा हो जाती है।
दूसरी टॉप ड्रेसिंग का सही समय और यूरिया की मात्रा
यदि आप भी अपनी धान की फसल में दूसरी बार खाद देने की तैयारी कर रहे हैं, तो रोपाई के लगभग 20 से 30 दिन बाद का समय इसके लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि संतुलित मात्रा में खाद डालने से फसल की सेहत सुधरती है। किसान प्रति एकड़ के हिसाब से लगभग 20 से 30 किलोग्राम यूरिया का इस्तेमाल दूसरी टॉप ड्रेसिंग के रूप में कर सकते हैं। धान के खेत में दूसरी बार उर्वरक डालने का मुख्य उद्देश्य पौधों में अधिकतम कल्लों का विकास करना और उनकी तंदुरुस्त बढ़वार को गति देना होता है ताकि फसल मजबूती के साथ आगे बढ़ सके।
नाइट्रोजन के अलावा अन्य जरूरी पोषक तत्वों की भूमिका
धान के खेत में दूसरी खाद का छिड़काव करते समय यह समझना भी अनिवार्य है कि फसल को केवल नाइट्रोजन की ही दरकार नहीं होती है। पौधों के सर्वांगीण विकास के लिए फास्फोरस, पोटाश, सल्फर और जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्व भी अपनी अहम भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, फास्फोरस पौधों की जड़ों के विकास और शुरुआती दौर में उनकी वृद्धि के लिए बहुत जरूरी होता है। यदि धान के खेतों में जिंक की कमी हो जाए, तो पौधों की ग्रोथ बुरी तरह प्रभावित होती है। ऐसे मामलों में पत्तियों पर अजीब से लक्षण उभरने लगते हैं और पौधे अपनी सामान्य ताकत खोकर कमजोर दिखने लगते हैं, जिससे अंततः कुल पैदावार में भारी गिरावट दर्ज की जा सकती है।
कई बार अन्नदाता यूरिया और डीएपी को एक ही श्रेणी की खाद समझ लेते हैं, जबकि दोनों के रासायनिक गुण और कार्य बिल्कुल अलग होते हैं। यूरिया का मुख्य काम पौधों को नाइट्रोजन उपलब्ध कराना है, जबकि डीएपी से फास्फोरस और नाइट्रोजन दोनों की पूर्ति होती है। इसलिए हमेशा खेत की वास्तविक जरूरत और मिट्टी की सेहत को परखकर ही उर्वरकों का चयन करना चाहिए। यूरिया डालने से पहले खेत का फालतू पानी बाहर निकाल देना चाहिए और जमीन में केवल हल्की नमी बनाकर रखनी चाहिए। नाइट्रोजन पौधों के भीतर क्लोरोफिल का निर्माण करने में मदद करता है। लगातार एक ही जमीन पर खेती करने से मिट्टी के प्राकृतिक गुण कम होने लगते हैं, जिसकी भरपाई केवल संतुलित उर्वरकों के नियमित इस्तेमाल से ही संभव हो पाती है।
कृषि विशेषज्ञों की सलाह और जल प्रबंधन
इस पूरी प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप कुमार बिसेन ने जानकारी दी है कि धान की रोपाई के ठीक 30 दिन बाद दूसरी खाद खेतों में डाल देनी चाहिए। उन्होंने बताया कि खाद डालने से ठीक पहले खेत के अंदर पर्याप्त नमी का होना बहुत जरूरी है। यदि खेत में उचित मॉइस्चर बना रहता है, तो पौधों की जड़ें पोषक तत्वों को आसानी से ग्रहण करती हैं, जिससे उनकी ग्रोथ बेहतरीन होती है और कुल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
डॉ. प्रदीप कुमार बिसेन ने यह भी स्पष्ट किया कि खाद का छिड़काव करते समय खेत के अंदर पानी का अत्यधिक भराव नहीं होना चाहिए। यदि खेत में बहुत ज्यादा पानी खड़ा रहता है, तो धान के पौधे अंदर ही अंदर पीले पड़ने शुरू हो जाते हैं। इसलिए दूसरी टॉप ड्रेसिंग करते समय खेत की जल निकासी और नमी की स्थिति पर विशेष रूप से नजर रखनी चाहिए ताकि फसल को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुंचे।



















