ईरान के हालिया फैसले से भारत समेत कई देशों को राहत की सांस लेने का मौका मिला है, क्योंकि देश के मालवाहक जहाजों के लिए होर्मुज स्ट्रेट का रास्ता खोल दिया गया है। हालांकि इस सहूलियत के साथ कई तरह की बड़ी और जटिल चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं जो व्यापारिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं। ईरान ने भारत के अलावा चीन, कतर और इराक के कार्गो जहाजों को अपने प्रतिबंधों के दायरे से बाहर रखने का निर्णय लिया है। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के बीच कुछ खास देशों के पोतों को सुरक्षित जलमार्ग मुहैया कराना है। इसके बावजूद उद्योग के जानकारों का मानना है कि केवल कागजी छूट मिलने मात्र से समुद्र के भीतर जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती है।
सैन्य संघर्ष और हमलों का निरंतर बना हुआ खतरा
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया भर के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शुमार किया जाता है। मौजूदा क्षेत्रीय तनाव और सैन्य गतिविधियों के कारण यह जलडमरूमध्य लगातार टकराव का मुख्य केंद्र बना हुआ है। ईरान की तरफ से कुछ चुनिंदा राष्ट्रों के जहाजों को छूट मिलने की घोषणा के बाद भी उन पर किसी भी प्रकार के हमले की आशंका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। विश्लेषकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि युद्ध जैसे माहौल में मानवरहित ड्रोन, समुद्र के भीतर बिछाई गई बारूदी सुरंगों और तटों से दागी जाने वाली मिसाइलों के बीच पोतों की सटीक पहचान करना बेहद कठिन हो जाता है। किसी भी सैन्य कार्रवाई के दौरान जहाज के ऊपर लगे झंडे या उसकी राष्ट्रीयता को पहचानने में गलती हो सकती है। ऐसे हालात में छूट का लाभ पाने वाले देशों के पोत भी किसी बड़े क्रॉसफायर या हमले की चपेट में आ सकते हैं। इसका एक गंभीर उदाहरण भारतीय पोत MSV अल-जुसुफी पर हुआ हमला है। ईरान की इस घोषणा से ठीक पहले ओमान के पास इस भारतीय ध्वज वाले पोत पर अज्ञात हवाई वस्तु से हमला हुआ था, जिसमें एक भारतीय नाविक की जान चली गई थी। यह घटना साबित करती है कि समुद्री क्षेत्र में हालात कितने ज्यादा खतरनाक हैं।
अमेरिकी प्रतिबंधों का शिकंजा और डॉलर प्रणाली का संकट
इस पूरी व्यवस्था के सामने दूसरी सबसे बड़ी बाधा अमेरिकी प्रतिबंधों की तलवार लटकना है। ईरान का यह दावा है कि जिन जहाजों को छूट दी गई है, उन्हें अमेरिकी पाबंदियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिकी कानूनों के तहत ईरान को किसी भी रूप में भुगतान करने वाली शिपिंग कंपनियों और ऑपरेटरों को छूट मिलेगी या नहीं। ऐसी खबरें सामने आई हैं कि ईरान भारतीय और चीनी पोतों से होर्मुज स्ट्रेट पार करने के एवज में ट्रांजिट फीस वसूल रहा है। यदि कोई कारोबारी इकाई ईरान की सरकार को इस तरह का भुगतान करती है, तो वह सीधे तौर पर अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ सकती है। अमेरिका पहले भी ईरान से जुड़े सभी प्रकार के वित्तीय और आर्थिक लेन-देन को लेकर काफी आक्रामक रुख अपनाता रहा है। इस स्थिति में इस मार्ग का प्रयोग करने वाली तमाम शिपिंग कंपनियों, वित्तीय संस्थानों और व्यापारिक संगठनों को भारी कानूनी व वित्तीय संकट झेलना पड़ सकता है। इनमें सबसे डरावना पहलू अमेरिकी डॉलर आधारित वैश्विक वित्तीय ढांचे से बाहर किए जाने का खतरा है, हालांकि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि लेन-देन किस प्रकार का है।
आसमान छूती बीमा लागत से खत्म हो सकता है आर्थिक लाभ
होर्मुज के रास्ते से पोतों को गुजारने में तीसरी बड़ी मुश्किल मरीन इंश्योरेंस यानी समुद्री बीमा से जुड़ी हुई है। वैश्विक व्यापार में जहाजों का बीमा अंतरराष्ट्रीय बीमा कंपनियों और अंडरराइटर्स द्वारा तय किए गए जोखिम आकलन के आधार पर किया जाता है। ईरान की तरफ से किसी पोत को पानी में उतरने की अनुमति मिलना इस बात की गारंटी नहीं है कि बीमा कंपनियां भी उसे पूरी तरह सुरक्षित मान लेंगी। चूँकि इस पूरे क्षेत्र में सैन्य टकराव और सख्त नाकेबंदी का खतरा बना हुआ है, इसलिए यहाँ से गुजरने वाले पोतों के लिए वॉर-रिस्क इंश्योरेंस का प्रीमियम बहुत ज्यादा बढ़ सकता है। बीमा की लागत में इस बेतहाशा बढ़ोतरी का सीधा और गहरा असर शिपिंग कंपनियों के साथ-साथ आयातकों की जेब पर पड़ेगा। यदि बीमा का खर्च हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तो ईरान द्वारा दिए गए सुरक्षित मार्ग का सारा आर्थिक फायदा धरी का धरी रह जाएगा। इसके परिणामस्वरूप देश में तेल, प्राकृतिक गैस और अन्य जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति पर आने वाली लागत में भी भारी उछाल आ सकता है।
ईरान की कूटनीतिक शर्तें और अनिश्चित भविष्य
इस छूट प्रणाली के साथ चौथी बड़ी चुनौती राजनीतिक और रणनीतिक समीकरणों की है। ईरान की तरफ से दी गई इस रियायत को केवल एक सामान्य समुद्री सुविधा के रूप में देखने के बजाय भू-राजनीतिक सौदेबाजी के तौर पर भी देखा जा रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत को यह सुविधा जरूरी दवाओं के आयात से जुड़ी कुछ खास शर्तों के बदले दी गई है, जबकि चीन के मामले में बीजिंग का राजनीतिक समर्थन सबसे बड़ा आधार माना जा रहा है। यदि इस तरह की शर्तें वास्तव में प्रभावी हैं, तो समुद्री मार्ग तक पहुँच केवल व्यापार की जरूरतों पर आधारित न होकर देशों के आपसी राजनीतिक रिश्तों पर निर्भर हो जाएगी। इसका साफ़ मतलब यह है कि ईरान द्वारा तैयार की गई छूट प्राप्त देशों की यह सूची पूरी तरह स्थायी नहीं है। क्षेत्रीय परिस्थितियों या कूटनीतिक संबंधों में उतार-चढ़ाव आने पर किसी भी देश से यह रियायत वापस छीनी जा सकती है। ऐसी आपात स्थिति में ईंधन और अन्य जरूरी सामान लेकर जा रहे पोतों के सामने अचानक रास्ता बंद होने का गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।
भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार का सवाल
भारत के परिप्रेक्ष्य में होर्मुज स्ट्रेट का मार्ग आर्थिक और रणनीतिक दोनों ही दृष्टियों से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। देश की ऊर्जा जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते से होकर भारत तक पहुँचता है। ऐसे हालात में इस जलडमरूमध्य में लंबे समय तक तनाव और अनिश्चितता का माहौल बने रहना भारत के कुल तेल और गैस आयात पर भारी पड़ सकता है। ईरान के इस फैसले से भारतीय नौवहन को भले ही आंशिक राहत मिलती दिखाई दे रही हो, लेकिन इसके साथ जुड़े हुए सैन्य हमलों, अमेरिकी प्रतिबंधों के शिकंजे और भारी-भरकम बीमा प्रीमियम के जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
















