ईरान और अमेरिका के बीच जंग छिड़ने के बाद भारत के सामने एलपीजी सप्लाई को लेकर बड़ा खतरा खड़ा हो गया था। भारत को सबसे ज्यादा एलपीजी देने वाले देश कतर पर ईरान के हमले ने हालात बिगाड़ दिए और कुछ दिनों तक देश में सिलेंडर की किल्लत होने का डर सताने लगा। लेकिन सरकार ने तुरंत अपनी सप्लाई चेन बदल दी और अब मिडिल ईस्ट में चाहे जो हालात बनें, भारत को गैस सिलेंडर की कमी झेलनी नहीं पड़ेगी।
कतर पर हमले से कैसे बना संकट
भारत लंबे समय से अपनी ज्यादातर एलपीजी जरूरत कतर से पूरी करता आया है। ईरान के कतर पर हमले के बाद यह सप्लाई लाइन कमजोर पड़ गई, जिससे रसोई गैस की उपलब्धता पर सीधा असर पड़ने की आशंका बन गई। इसी बीच मिडिल ईस्ट में तनाव के चलते सिलेंडर के दाम बढ़ने की खबरें भी अलग-अलग शहरों से आती रहीं।
सरकार ने कैसे संभाला मोर्चा
संकट गहराने से पहले ही सरकार ने आयात का रुख बदलना शुरू कर दिया। खबरों के मुताबिक होर्मुज जलडमरूमध्य से एलपीजी टैंकर जहाजों की आवाजाही सुनिश्चित की गई, जिससे सप्लाई पर मिडिल ईस्ट की अनिश्चितता का असर कम हुआ। साथ ही ईरान से भी सीधे आयात को लेकर करीब 8 साल पुरानी अड़चन हटाई गई, ताकि सप्लाई का एक और विकल्प तैयार हो सके। बिजली से सिलेंडर की सप्लाई की भरपाई करने की तैयारी पर भी चर्चा हुई, और बिहार जैसे राज्यों के कुछ गांवों में वैकल्पिक चूल्हों का इस्तेमाल भी सामने आया।
अमेरिका बना सबसे बड़ा भरोसेमंद सप्लायर
बीते 6 महीने के आयात आंकड़ों से साफ है कि भारत ने सबसे ज्यादा एलपीजी अमेरिका से मंगाया है। अमेरिका की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 50 फीसदी तक पहुंच गई है, जबकि इससे पहले यह हिस्सेदारी 10 फीसदी से भी कम हुआ करती थी। इस बदलाव ने भारत को मिडिल ईस्ट की किसी भी अस्थिरता से लगभग बेअसर कर दिया है।



















