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पलामू के डॉ. दिलीप पांडे ने बताए मानसून में सब्जियों की फसल को फफूंद और जलभराव से बचाने के अचूक उपायव्यापार
6 घंटे पहले· 1

पलामू के डॉ. दिलीप पांडे ने बताए मानसून में सब्जियों की फसल को फफूंद और जलभराव से बचाने के अचूक उपाय

भारी बारिश के कारण सब्जियों की फसल में जलभराव और जड़ सड़न का खतरा बढ़ जाता है। कृषि वैज्ञानिक के सुझाए गए पॉलीबैग नर्सरी, ऊंची क्यारियों और देसी नुस्खों से किसान अपनी पैदावार को सुरक्षित रखकर बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।

मानसून का मौसम भीषण गर्मी से तो काफी राहत दिलाता है, लेकिन सब्जी की खेती करने वाले किसानों के लिए यह समय चुनौतियों से भरा होता है। पलामू और आसपास के इलाकों में आजकल किसान पारंपरिक फसलों को छोड़कर बरसात के दिनों में भी सब्जियों की व्यावसायिक खेती कर रहे हैं। हालांकि, इस मौसम में जोखिम बहुत ज्यादा होता है। लगातार और मूसलाधार बारिश से खेतों में, खासकर निचले इलाकों में, जलभराव की गंभीर समस्या पैदा हो जाती है। जब खेतों में पानी ठहर जाता है, तो पौधों की जड़ों को हवा नहीं मिल पाती, जिससे वे बहुत तेजी से गलने लगती हैं। इसके अलावा, अत्यधिक नमी के कारण मिट्टी में फफूंद जनित बीमारियां तेजी से पनपती हैं। ये बीमारियां बहुत तेजी से पूरी फसल को तबाह कर सकती हैं, जिससे किसानों की मेहनत और उनकी आर्थिक स्थिति दोनों पर गहरा असर पड़ता है।

बरसात के इन खतरों से निपटने के लिए कृषि विशेषज्ञ किसानों को वैज्ञानिक और आधुनिक तरीके अपनाने की सलाह दे रहे हैं। चियांकी स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दिलीप पांडे बताते हैं कि रोपाई का शुरुआती चरण सबसे ज्यादा अहम होता है। उनका सुझाव है कि बारिश के मौसम में बीजों को सीधे खुले खेत में बोने से पूरी तरह बचना चाहिए। इसके बजाय, किसानों को अपनी नर्सरी पॉली ट्यूब या पॉलीबैग में तैयार करनी चाहिए। यह सुरक्षित तरीका नन्हे और नाजुक पौधों को तेज बारिश की मार से बचाता है। जब भारी बारिश रुक जाए और खेतों से अतिरिक्त पानी पूरी तरह निकल जाए, तब इन मजबूत हो चुके पौधों को खेत में सुरक्षित रूप से लगाया जा सकता है।

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नर्सरी की तैयारी और रोपाई का सही तरीका

पौधों को खेत में लगाने के दौरान सही जगह का चुनाव और खेत की बनावट बहुत मायने रखती है। डॉ. पांडे सलाह देते हैं कि पौधों को ऊंचाई वाले स्थानों या फिर सही ढलान वाली ऊंची क्यारियों में रोपना चाहिए, ताकि पानी तेजी से बहकर बाहर निकल सके। बरसात में सब्जियों के लिए रेज एंड फरो तकनीक अपनाना बहुत फायदेमंद साबित होता है। इस तरह की ऊंची क्यारियों में खेती करने से टमाटर, बैंगन और हरी मिर्च जैसी फसलें जुलाई के अंत तक पककर तैयार हो जाती हैं। मानसून के दौरान इतनी जल्दी बाजार में उपज पहुंचने से किसानों को अपनी फसल के बहुत ऊंचे दाम मिलते हैं।

जल निकासी और मिट्टी के पोषण का महत्व

खेतों से पानी की सही निकासी और मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन, मानसून की खेती के सबसे बड़े आधार हैं। रुका हुआ पानी पौधों की सेहत के लिए सबसे बड़ा दुश्मन है, इसलिए जल निकासी का पुख्ता इंतजाम होना बेहद जरूरी है। खेतों से बारिश का पानी जैसे ही बाहर निकल जाए, मिट्टी का तुरंत उपचार करना चाहिए। इसके लिए प्रति बीघा खेत में दो से ढाई किलोग्राम बेंटोनाइट सल्फर का छिड़काव करना एक बहुत ही कारगर उपाय है। सल्फर का यह प्रयोग जलभराव वाली मिट्टी में पनपने वाले फफूंद के असर को खत्म कर देता है। बीमारियों से बचाव के साथ-साथ पौधों की अच्छी ग्रोथ के लिए सीमित मात्रा में संतुलित उर्वरकों का इस्तेमाल भी जरूरी है। रासायनिक खादों के साथ जैविक खाद के इस्तेमाल पर भी जोर दिया जाता है, ताकि पौधों की नाजुक जड़ों पर बुरा असर पड़े बिना मिट्टी को पूरा पोषण मिल सके।

बरसात के मौसम में सटीक सिंचाई

यह सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन सूखे के मौसम की तरह ही बरसात में भी सिंचाई का सही प्रबंधन बहुत जरूरी है। डॉ. पांडे स्पष्ट करते हैं कि जब तक बारिश लगातार हो रही हो, तब तक अलग से पानी देने की कोई आवश्यकता नहीं है। किसानों को तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक बारिश रुक न जाए और खेत की ऊपरी मिट्टी सूखती हुई न दिखाई दे। जब सिंचाई की जरूरत महसूस हो, तो टपक सिंचाई प्रणाली को अपनाना सबसे बेहतर विकल्प है। यह ड्रिप सिस्टम हर दिन प्रत्येक पौधे की जड़ में बिल्कुल सटीक मात्रा में डेढ़ से दो लीटर पानी पहुंचाता है। पानी की यह मापी हुई मात्रा न केवल पानी की बर्बादी रोकती है, बल्कि जड़ों के पास एकदम सही नमी बनाए रखती है। इस सटीक तकनीक से फसल की गुणवत्ता में भारी सुधार होता है और किसानों का मुनाफा भी बढ़ता है।

कीट और फफूंद नियंत्रण के पारंपरिक उपाय

आधुनिक कृषि विज्ञान के अलावा, कई पारंपरिक और देसी उपाय भी फसलों को जड़ के सड़ने और फलों के खराब होने से बचाने में बेहद असरदार हैं। मिट्टी में सीधे तौर पर जैविक चीजों का इस्तेमाल करना एक पुराना और परखा हुआ तरीका है। पौधों की जड़ों के आसपास नीम की खली या फिर सूखी नीम की पत्तियों का बारीक चूर्ण डालने से फफूंद के खिलाफ एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच तैयार हो जाता है। कीड़े-मकोड़ों और फंगस की रोकथाम के लिए एक बेहतरीन जैविक कीटनाशक घर पर ही बनाया जा सकता है। इसके लिए एक लीटर शुद्ध गौमूत्र में आठ से दस लीटर साफ पानी मिलाकर घोल तैयार किया जाता है। इस जैविक घोल का छिड़काव करने से कई तरह के खतरनाक फफूंद और कीटों का प्रकोप काफी हद तक कम हो जाता है।

मिट्टी की नमी को छोटे स्तर पर नियंत्रित करने के लिए घर में मिलने वाली राख भी बहुत काम आती है। पौधों के तनों के चारों तरफ लकड़ी की राख को हल्की मात्रा में छिड़कने से दोहरे फायदे होते हैं। यह राख अपने आसपास की अतिरिक्त नमी को सोख लेती है, जिससे पौधे के एकदम करीब का वातावरण सूखा रहता है। नमी कम होने से पानी से भरी मिट्टी में भी जड़ों के गलने का खतरा काफी कम हो जाता है।

लत्तर वाली फसलों की सुरक्षा और खेत की साफ-सफाई

लत्तर वाली सब्जियों, जैसे कि लौकी और कद्दू, का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। अगर इनके फल गीली मिट्टी पर ही पड़े रहें, तो उनके सड़ने की आशंका बहुत ज्यादा होती है। इन खास फसलों को बचाने के लिए किसानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि फल सीधे जमीन के संपर्क में न आएं। इसके लिए मचान बनाना सबसे अच्छा उपाय है, जिस पर बेलें चढ़ जाती हैं और फल हवा में लटकते रहते हैं। अगर मचान बनाना संभव न हो, तो फलों के नीचे सूखी घास की एक मोटी परत बिछा देनी चाहिए, ताकि मिट्टी की नमी फलों तक न पहुंच सके। अंत में, खेत की नियमित और बारीकी से निगरानी करना सबसे जरूरी है। अगर किसी भी पौधे में रोगग्रस्त या सड़ी हुई पत्तियां दिखें, तो उन्हें तुरंत तोड़कर खेत से बाहर नष्ट कर देना चाहिए। साफ-सफाई के इस नियम का सख्ती से पालन करके ही बीमारियों को फैलने से रोका जा सकता है और मानसून में एक स्वस्थ पैदावार हासिल की जा सकती है।

सवाल-जवाब

मानसून में सब्जियों की खेती के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या है?
बरसात के मौसम में लगातार जलभराव सबसे बड़ा खतरा है, जिससे पौधों की जड़ें सड़ने लगती हैं और मिट्टी में फफूंद जनित बीमारियां तेजी से फैलती हैं।
बारिश में बीजों की बुआई का सबसे सुरक्षित तरीका क्या है?
कृषि वैज्ञानिक के अनुसार, बीजों को सीधे खेत में बोने के बजाय पॉली ट्यूब या पॉलीबैग में नर्सरी तैयार करनी चाहिए, ताकि तेज बारिश से नाजुक पौधों को बचाया जा सके।
खेत से पानी निकलने के बाद मिट्टी का उपचार कैसे करें?
जलभराव खत्म होने के बाद प्रति बीघा खेत में दो से ढाई किलोग्राम बेंटोनाइट सल्फर का छिड़काव करने से मिट्टी में फफूंद का प्रभाव खत्म हो जाता है।
बरसात में जड़ सड़न को रोकने के देसी उपाय क्या हैं?
पौधों की जड़ों के आसपास नीम की खली या सूखी नीम की पत्तियों का चूर्ण डालने, और हल्की मात्रा में लकड़ी की राख छिड़कने से फफूंद और अतिरिक्त नमी कम होती है।
लत्तर वाली सब्जियों को सड़ने से कैसे बचाएं?
लौकी और कद्दू जैसी लत्तर वाली सब्जियों को जमीन पर सीधे न रखकर मचान पर चढ़ाना चाहिए, या फिर फलों के नीचे सूखी घास बिछा देनी चाहिए।
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