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पलामू में सूखे का संकट: बारिश की कमी के बीच धान की इन खास किस्मों से किसानों को मुनाफे की उम्मीदव्यापार
3 घंटे पहले· 0

पलामू में सूखे का संकट: बारिश की कमी के बीच धान की इन खास किस्मों से किसानों को मुनाफे की उम्मीद

झारखंड के पलामू में सुपर एल नीनो के कारण बारिश की भारी कमी ने धान की खेती पर संकट खड़ा कर दिया है। नुकसान से बचने और खेती को मुनाफेमंद बनाने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने पारंपरिक बीजों को छोड़कर 'बाकर' और 'ब्राउन बोरा' जैसी कम अवधि वाली किस्मों की रोपाई करने की सख्त सलाह दी है।

झारखंड के पलामू जिले में इस वक्त कृषि परिदृश्य काफी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। राज्य भर में मानसून के सक्रिय रहने के बावजूद रेन शैडो जोन (वृष्टि छाया क्षेत्र) में आने वाले इस इलाके पर सुपर एल नीनो का गहरा असर दिख रहा है। सामान्य वर्षों के मुकाबले यहां काफी कम बारिश दर्ज की गई है। पानी की इस भारी किल्लत ने स्थानीय किसानों की चिंताएं काफी बढ़ा दी हैं। धान की खेती करने वाले कई किसानों ने अपनी नर्सरी में बिचड़ा (पौधे) तो तैयार कर लिया है और उनके कई खेत रोपाई के लिए पूरी तरह से तैयार भी हैं। हालांकि सिंचाई के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध न होने के कारण रोपाई का अहम काम अब तक अटका हुआ था। लेकिन पिछले 24 घंटों के दौरान जिले में 40 मिलीमीटर बारिश होने से उम्मीद की एक किरण जगी है। मौसम के इस बदलते मिजाज को देखते हुए कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को नई रणनीति के साथ खेती की तैयारियों में जुट जाने की सलाह दी है।

कम अवधि वाली किस्मों की ओर रुख करने की जरूरत

मौजूदा हालात को देखते हुए चियांकी स्थित क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश शाह ने किसानों का मार्गदर्शन किया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि अगर आने वाले दिनों में भी बारिश सामान्य से कम रहती है तो किसानों को अपनी पुरानी आदतों में बदलाव करना होगा। उन्हें लंबी अवधि में पकने वाले पारंपरिक धान की जगह कम समय में तैयार होने वाली किस्मों का रुख करना चाहिए। डॉ. शाह ने विशेष रूप से बाकर किस्म का जिक्र किया जो पहली श्रेणी की जमीन के लिए बेहद उपयुक्त है और पलामू अंचल में पहले से ही काफी लोकप्रिय है। इसके साथ ही वर्तमान मौसमी चुनौतियों के बीच ब्राउन बोरा किस्म भी किसानों के लिए एक शानदार विकल्प साबित हो सकती है। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार बाकर और ब्राउन बोरा दोनों ही किस्मों की खेती पहली और दूसरी श्रेणी की कृषि भूमि पर बड़ी आसानी से की जा सकती है जिससे किसानों को काफी सहूलियत मिलेगी।

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हाइब्रिड विकल्प और पैदावार का आकलन

जो किसान हाइब्रिड (संकर) धान की खेती में निवेश करना चाहते हैं उनके लिए भी विशेषज्ञ ने स्पष्ट पैमाने तय किए हैं। डॉ. शाह की सलाह है कि हाइब्रिड खेती के लिए ऐसी किस्मों का चुनाव किया जाना चाहिए जिनका फसल चक्र 100 से 105 दिनों में पूरा हो जाता हो। उदाहरण के तौर पर उन्होंने PAC-807 हाइब्रिड किस्म का नाम लिया जो 100 से 105 दिन की समयावधि में पककर तैयार हो जाती है। अगर सही तरीके से खेती की जाए तो इस किस्म से प्रति एकड़ 25 से 30 क्विंटल तक की शानदार पैदावार हासिल की जा सकती है। वहीं दूसरी ओर बाकर जैसी कम अवधि वाली फसलें बहुत तेजी से बढ़ती हैं और महज 60 से 70 दिनों के भीतर कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं। हालांकि इनमें समय कम लगता है लेकिन इनकी उपज भी उसी अनुपात में कम होती है। इनसे प्रति एकड़ लगभग 7 से 8 क्विंटल तक का उत्पादन मिल पाता है। इस तरह पानी की उपलब्धता और जोखिम उठाने की क्षमता के आधार पर किसानों के पास स्पष्ट विकल्प मौजूद हैं।

धान की खेती का आर्थिक गणित

सही फसल के चुनाव के अलावा डॉ. शाह ने किसानों को आर्थिक गणित भी समझाया ताकि वे सोच समझकर फैसला ले सकें। सामान्य धान की खेती करने पर औसतन लगभग 12 हजार रुपये प्रति एकड़ की लागत आती है। इसके विपरीत हाइब्रिड धान की खेती में पूंजी का निवेश ज्यादा होता है और यह खर्च करीब 25 हजार रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच सकता है। हालांकि शुरुआती लागत अधिक होने के बावजूद इसके वित्तीय परिणाम काफी उत्साहजनक हो सकते हैं। कृषि वैज्ञानिक का आकलन है कि अगर फसल चक्र के दौरान मौसम अनुकूल बना रहता है तो किसान 15 हजार से लेकर 20 हजार रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं। यह आर्थिक विश्लेषण इस बात को रेखांकित करता है कि अनियमित बारिश के जोखिम को कम करते हुए अधिकतम लाभ कमाने के लिए सही बीजों का चयन करना कितना महत्वपूर्ण है।

बुआई में देरी के छिपे हुए गंभीर जोखिम

इस एडवाइजरी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बुआई में होने वाली देरी के गंभीर जोखिमों पर केंद्रित था। डॉ. शाह ने लंबी अवधि वाले धान की देर से बुआई या रोपाई करने को लेकर सख्त चेतावनी दी है। अगर किसान इस देरी के बावजूद पारंपरिक किस्मों पर ही अड़े रहते हैं तो फसल में फूल आने का समय सर्दियों के मौसम तक खिसक जाएगा। मौसम का यह बेमेल होना फसल के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होता है क्योंकि ठंड के कारण धान की बालियों में दाने भरने की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप कुल कृषि उत्पादन में भारी और विनाशकारी गिरावट आ सकती है। इसलिए वर्तमान में चल रहे विलंब को देखते हुए लंबी अवधि की फसलों पर टिके रहना एक बहुत बड़ा जोखिम है जिसके कारण किसानों को भारी कृषि और वित्तीय नुकसान उठाना पड़ सकता है।

बेहतर आमदनी के लिए रणनीतिक बदलाव

अपनी सलाह के अंत में कृषि वैज्ञानिक ने किसान समुदाय से अपील की है कि मौसम की इस अनिश्चितता के बीच वे जल्दबाजी में आकर पारंपरिक लंबी अवधि वाले धान की खेती का फैसला न लें। इसके बजाय एक सोची समझी और रणनीतिक पहल की जरूरत है। किसानों को अपने स्थानीय मौसम के पैटर्न और जमीन की विशिष्ट स्थिति को ध्यान में रखते हुए कम अवधि वाली किस्मों का सावधानीपूर्वक चयन करना चाहिए। इन अनुकूल किस्मों के साथ समय पर रोपाई का काम पूरा करना सबसे ज्यादा जरूरी है। ऐसा करने से किसान न केवल सूखे जैसे हालात में अपने संभावित नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं बल्कि एक अच्छी फसल प्राप्त करने की अपनी संभावनाओं को भी काफी बढ़ा सकते हैं। अंततः मौजूदा चुनौतीपूर्ण मौसम में अच्छी पैदावार सुनिश्चित करने और अपनी आमदनी को बेहतर बनाने के लिए किसानों को मौसम के अनुरूप ही खेती की रणनीति अपनानी होगी।

सवाल-जवाब

पलामू में बारिश की वर्तमान स्थिति क्या है?
झारखंड में मानसून सक्रिय होने के बावजूद सुपर एल नीनो के कारण पलामू में सामान्य से कम बारिश हुई है, हालांकि हाल ही में 40 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई है।
कम बारिश होने पर धान की कौन सी किस्मों की सिफारिश की गई है?
कृषि वैज्ञानिकों ने बाकर और ब्राउन बोरा जैसी कम अवधि वाली किस्मों की सलाह दी है जिन्हें पहली और दूसरी श्रेणी की जमीन पर आसानी से उगाया जा सकता है।
PAC-807 जैसे हाइब्रिड धान से किसानों को कितनी पैदावार मिल सकती है?
PAC-807 हाइब्रिड किस्म 100 से 105 दिनों में तैयार हो जाती है और इससे प्रति एकड़ 25 से 30 क्विंटल तक की उपज मिल सकती है।
लंबी अवधि वाले धान की बुआई में देरी से क्या नुकसान होता है?
देर से रोपाई करने पर धान में फूल आने का समय सर्दियों तक पहुंच जाता है, जिससे दानों का भराव प्रभावित होता है और पैदावार में भारी गिरावट आती है।
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