सावन के शुरुआती दिनों में बादलों की मेहरबानी ने पश्चिमी राजस्थान के काश्तकारों में भारी उम्मीद जगाई थी, पर मौसम के अचानक पलटने से अब खेतों में मायूसी पसर गई है। जुलाई बीतते ही बादलों ने जो मुंह मोड़ा, उसका सीधा असर खरीफ की पैदावार पर दिखा और अब आने वाले शीतकालीन कृषि चक्र पर भी आफत मंडराने लगी है। खेतों के भीतर मौजूद जल स्तर तेजी से सूख रहा है, जिससे रबी की प्रारंभिक तैयारी संकट में घिर गई है।
अगस्त की शुरुआत से थमी फुहारें, बिगड़े जमीनी हालात
खेती के लिहाज से जुलाई का समय बेहद मुफीद रहा था, जिससे किसानों ने बड़े उत्साह के साथ बुआई का काम पूरा किया था। परिस्थितियां तब बिगड़ीं जब 2 अगस्त के उपरांत जोधपुर संभाग के विस्तृत भूभाग में बादलों की आवाजाही लगभग ठहर सी गई। लंबे समय तक पानी न बरसने के कारण मिट्टी की ऊपरी परत कठोर हो गई और पौधों को जीवन रक्षक सिंचन मिलना बंद हो गया।
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान जोधपुर में कार्यरत प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एच.आर. माहला ने इस स्थिति पर बात करते हुए बताया कि जुलाई बहुत अच्छा रहने के बाद 2 अगस्त से संभाग में वर्षा की बेहद कमी दर्ज हुई है। उनके मुताबिक इस लंबे सूखे दौर ने न केवल खड़ी फसलों का दम निकाला है, बल्कि आने वाली रबी की बीजाई पर भी सीधा प्रहार किया है।
पाली से बाड़मेर तक मूंग की फसल चौपट, लागत निकालना भी चुनौती
कम वर्षा की इस गंभीर मार का सबसे अधिक प्रभाव पाली, जालोर और बाड़मेर जिलों की खेती पर नजर आ रहा है। इन जिलों के ग्रामीण अंचलों में बारिश रुक जाने से अकाल जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। खरीफ सत्र में बोई गई दलहनी फसलों में विशेषकर मूंग की खेती बुरी तरह प्रभावित हुई है। फलियां आने के नाजुक वक्त पर पानी न मिलने से पौधे सूख गए हैं, जिससे किसानों के लिए बीज और खाद पर किया गया खर्च वापस निकालना भी भारी पड़ रहा है।
खेतों से गायब हुई संरक्षित नमी, चने और रायड़े का रकबा घटने के आसार
यह मौसमी असंतुलन केवल मौजूदा फसलों तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि अगले सीजन में भी इसका गहरा दुष्प्रभाव दिखेगा। मारवाड़ और आसपास के अंचलों में परंपरागत तौर पर किसान मानसून के बाद जमीन में बची रहने वाली संरक्षित नमी के आधार पर ही अगली फसलों का बीज डालते हैं।
इस मर्तबा अगस्त और उसके बाद के महीनों में पानी नहीं बरसने से खेतों की स्वाभाविक नमी पूरी तरह गायब हो चुकी है। जमीन के भीतर पानी की कमी को देखते हुए कृषि विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि इस दफा चने, तारामीरे और रायड़े (सरसों) की बुआई का कुल दायरा बहुत ज्यादा सिमट सकता है। किसान चाहकर भी सामान्य रकबे पर इन फसलों को नहीं लगा पाएंगे।
सूखे की चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों के जरूरी सुझाव
विषम मौसमी परिस्थितियों और खेतों में पानी की कमी को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को जोखिम घटाने के लिए वैकल्पिक फसल प्रबंधन अपनाने का परामर्श दिया है
- कम पानी वाली वैकल्पिक फसलों की प्राथमिकता: जिन काश्तकारों के पास ट्यूबवेल या अन्य सुनिश्चित सिंचाई साधन नहीं हैं और खेतों की मिट्टी में पानी की कमी है, वे अधिक जल चाहने वाली फसलों के फेर में न पड़ें। ऐसे खेतों में जीरा, ईसबगोल और मैथी जैसी फसलों को तरजीह दी जानी चाहिए, जिन्हें पकने के लिए लगातार पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती।
- अल्प अवधि में तैयार होने वाले बीज: यदि खेत के पास सिंचाई का थोड़ा बहुत प्रबंध मौजूद है, तो कृषि विशेषज्ञों से विचार-विमर्श करके कम समय में पककर तैयार हो जाने वाली किस्मों का ही चयन करें ताकि सीमित पानी में फसल निकाली जा सके।
- पाटा फेरकर नमी का संरक्षण: जिन कृषि भूमियों में अभी भी हल्की नमी शेष बची है, वहां काश्तकार बिना देर किए हल चलाकर सुहागा (पाटा) फेर दें। ऊपरी सतह बंद हो जाने से जमीन के भीतर मौजूद जल भाप बनकर वातावरण में नहीं उड़ेगा। साथ ही खेतों में मौजूद खरपतवार या पिछली फसलों के अवशेष बिछाकर मल्चिंग करें, जिससे जमीन काफी समय तक नम बनी रहे।
- टपका और फव्वारा प्रणालियों का इस्तेमाल: यदि किसी किसान के पास खेत में डिग्गी अथवा नलकूप की सुविधा उपलब्ध है, तो परंपरागत रूप से खुला पानी बहाने के बजाय ड्रिप या स्प्रिंकलर सिस्टम से ही सिंचाई करें। इससे कम पानी की खपत में ज्यादा रकबे तक जीवन रक्षक जल पहुंच सकेगा। इसके अलावा सिंचाई केवल तभी करें जब पौधे के विकास के लिए वह अत्यंत अपरिहार्य हो।
















