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पूर्णिया में किसानों के लिए आलू की खेती के आसान तरीके, बेहतर पैदावार के लिए अपनाएं ये जरूरी टिप्सव्यापार
28 अक्तू॰ 2026, 10:46 pm (2 घंटे पहले)· 1

पूर्णिया में किसानों के लिए आलू की खेती के आसान तरीके, बेहतर पैदावार के लिए अपनाएं ये जरूरी टिप्स

पूर्णिया के कृषि विशेषज्ञ डॉ. विकास कुमार ने आलू की बेहतर पैदावार के लिए खेत की तैयारी, खाद प्रबंधन और बीज उपचार से जुड़े महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।

पूर्णिया में सर्दियों की दस्तक के साथ ही किसानों ने आलू की बुआई की तैयारियां जोर-शोर से शुरू कर दी हैं। बंपर पैदावार हासिल करने के लिए जमीन को सही तरीके से तैयार करना, सही मात्रा में खाद डालना और गुणवत्तापूर्ण बीजों का चयन करना बेहद अहम माना जाता है। इसी सिलसिले में भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. विकास कुमार ने खेती से जुड़ी कई जरूरी बातें साझा की हैं। उनके अनुसार, आलू चूंकि एक भूमिगत फसल है, इसलिए इसकी पैदावार के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी सबसे बेहतरीन मानी जाती है। इसके अलावा, हल्की बालुई मिट्टी में भी इसकी फसल अच्छी तरह पनपती है और सीमांचल क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति इसके लिए बहुत अनुकूल है।

खेत की जुताई और मिट्टी की तैयारी

बुआई से पहले खेत को भुरभुरी और समतल बनाना सफलता की पहली सीढ़ी है। किसानों को खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई करनी चाहिए और आखिरी जुताई के वक्त पाटा लगाकर उसे अच्छी तरह समतल कर लेना चाहिए। इससे मिट्टी एकदम मुलायम हो जाती है और बीज लगाने में आसानी होती है। डॉ. विकास कुमार का कहना है कि अंतिम जुताई के समय खेत में पोषक तत्वों की पूर्ति के लिए जैविक खाद का इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है। इसके लिए लगभग बीस टन प्रति हेक्टेयर की दर से पुरानी और पूरी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट या साधारण कंपोस्ट का उपयोग किया जाना चाहिए।

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खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रबंधन

फसल के सही विकास के लिए प्रमुख उर्वरकों का संतुलित अनुपात बहुत जरूरी है। विशेषज्ञ के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, एक हेक्टेयर खेत में एक सौ बीस किलो नाइट्रोजन, एक सौ बीस किलो फास्फोरस और एक सौ किलो पोटाश की आवश्यकता होती है। मुख्य खादों के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए। अक्सर खेतों में जिंक और बोरॉन की कमी के कारण पौधों का विकास रुक जाता है, इसलिए खेत तैयार करते वक्त इनकी उपलब्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

बीज का चयन और बीजोपचार

स्वस्थ फसल के लिए बुआई से पहले बीजों का उपचार करना अनिवार्य है। कृषि विशेषज्ञ ने सलाह दी है कि खेत में रोपाई करने से पहले बीजों को बेविस्टिन नामक दवा से उपचारित जरूर कर लेना चाहिए। इसके साथ ही, रोपण के लिए इस्तेमाल होने वाले आलू के बीज कंद का वजन पंद्रह से पच्चीस ग्राम के बीच होना चाहिए। इन सभी वैज्ञानिक तरीकों और जरूरी सावधानियों का पालन करके किसान अपनी आमदनी कई गुना बढ़ा सकते हैं।

सवाल-जवाब

आलू की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मिट्टी कौन सी मानी जाती है?
आलू की खेती के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है, हालांकि हल्की बालुई मिट्टी में भी इसकी फसल अच्छी तरह उगती है।
खेत की तैयारी के दौरान कितनी बार जुताई करनी चाहिए?
किसानों को खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई करने की सलाह दी जाती है।
एक हेक्टेयर खेत में कितनी गोबर की खाद डालनी चाहिए?
अंतिम जुताई के समय लगभग बीस टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद, वर्मी कंपोस्ट या कंपोस्ट का इस्तेमाल करना चाहिए।
आलू की फसल के लिए मुख्य पोषक तत्वों की कितनी मात्रा तय की गई है?
प्रति हेक्टेयर खेत के लिए एक सौ बीस किलो नाइट्रोजन, एक सौ बीस किलो फास्फोरस और एक सौ किलो पोटाश की जरूरत होती है।
बुआई से पहले आलू के बीजों का उपचार किस दवा से करना चाहिए?
बुआई से पहले आलू के बीज कंदों को बेविस्टिन नामक दवा से उपचारित किया जाना चाहिए।
रोपण के लिए इस्तेमाल होने वाले आलू के बीज कंद का वजन कितना होना चाहिए?
आलू के बीज कंद का वजन लगभग पंद्रह से पच्चीस ग्राम के बीच होना चाहिए।
फसल में किन सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी अक्सर देखने को मिलती है?
आलू की फसल में कई बार बोरॉन और जिंक की कमी के कारण समस्याएं पैदा हो जाती हैं।
यह जानकारी किस कृषि विशेषज्ञ ने साझा की है?
यह जानकारी भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय के कृषि विशेषज्ञ डॉ. विकास कुमार ने दी है।
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