मानसून का आगमन किसानों के चेहरों पर तो खुशी लाता है, लेकिन पशुपालकों के लिए यह मौसम अपने साथ कई बड़ी चुनौतियां लेकर आता है। इस पूरे सीजन के दौरान दुधारू पशुओं में तरह-तरह की बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ जाता है। लगातार होने वाली बारिश और हवा में बढ़ी हुई नमी की वजह से बैक्टीरिया से होने वाले रोग, परजीवी संक्रमण और खुरों की समस्याएं बेहद तेजी से फैलने लगती हैं। यदि इस संवेदनशील समय में पशुओं की देखभाल करने में जरा सी भी कोताही बरती जाए, तो न सिर्फ दूध का उत्पादन गिर जाता है बल्कि पशुओं की जान पर भी बड़ा खतरा मंडराने लगता है। यही मुख्य वजह है कि मानसून के दिनों में पशुपालक भाइयों को अपने पशुओं के खानपान, पीने के पानी, रहने की जगह और कुल स्वास्थ्य पर बेहद पैनी नजर रखनी चाहिए।
फफूंदयुक्त चारे से होने वाले खतरे
पशु चिकित्सक विनोद चौधरी ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि बारिश के इस मौसम में सबसे बड़ा जोखिम भीगा हुआ चारा खाने से पैदा होता है। वातावरण में अत्यधिक नमी होने की वजह से दाना और हरा चारा बहुत जल्दी फफूंद की चपेट में आ जाता है। इस फफूंद के कारण चारे में एफ्लैटॉक्सिन जैसे खतरनाक और जहरीले तत्व पैदा होने लगते हैं। ऐसा दूषित चारा खाने से पशुओं के पेट में गंभीर विषाक्तता और पाचन से जुड़ी दिक्कतें पैदा हो जाती हैं, जिससे उनकी दूध देने की क्षमता में भारी गिरावट दर्ज की जाती है। डॉक्टर विनोद चौधरी ने सलाह दी है कि हरे चारे को कभी भी सीधे नहीं खिलाना चाहिए, बल्कि उसे छोटे टुकड़ों में काटकर हमेशा सूखे भूसे के साथ मिला कर देना चाहिए। इसके अलावा, पशुओं को हमेशा शुद्ध और साफ पानी ही पिलाना चाहिए ताकि किसी भी तरह के परजीवी संक्रमण के खतरे को न्यूनतम किया जा सके।
मच्छर, मक्खी और चीचड़ों से बचाव के उपाय
मानसून के आते ही मच्छर, मक्खी और चीचड़ों का प्रकोप कई गुना तक बढ़ जाता है, जिसके बारे में पशु चिकित्सक ने विशेष चेतावनी दी है। यही छोटे परजीवी कई बड़ी और घातक बीमारियों का मुख्य कारण बनते हैं। इससे बचने के लिए जरूरी है कि पशुशाला की नियमित रूप से सफाई की जाए और समय-समय पर सही कीटनाशक या चीचड़नाशक दवाओं का छिड़काव किया जाए। पशुपालकों को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि पशुशाला के आसपास किसी भी सूरत में पानी का जलभराव न होने पाए। इसके अलावा, पशुओं को समय पर डॉक्टर की सलाह से कृमिनाशक दवाएं भी दी जानी चाहिए ताकि शरीर के अंदर पलने वाले आंतरिक परजीवियों को पूरी तरह नियंत्रित रखा जा सके।
आफरा की समस्या से निपटने के घरेलू नुस्खे
बारिश का मौसम शुरू होते ही खेतों की मेड़ों पर और आसपास कई तरह की जहरीली और अनचाही घास उग आती है। जब पशु खुले में चरने के लिए जाते हैं और गलती से ऐसी जहरीली घास खा लेते हैं, तो उनकी तबीयत बहुत तेजी से बिगड़ सकती है। इसलिए चराई के दौरान पशुपालकों को बेहद सतर्क रहना चाहिए। इसके विपरीत, यदि किसी पशु को ज्यादा मात्रा में फलीदार हरा चारा खाने की वजह से आफरा यानी पेट फूलने की समस्या हो जाए, तो एक कारगर घरेलू उपाय के तौर पर 500 मिलीलीटर सरसों के तेल में 50 मिलीलीटर तारपीन का तेल मिलाकर पशु को पिलाया जा सकता है, जिससे तुरंत राहत मिलती है।
भैंसों का मद चक्र और खुरों की सुरक्षा
पशु चिकित्सक विनोद चौधरी के अनुसार, जैसे ही मानसून की शुरुआत होती है, भैंसों में मद चक्र पूरी तरह सक्रिय हो जाता है। इस दौरान पशुपालकों को चाहिए कि वे ताव के तमाम लक्षणों पर लगातार नजर बनाए रखें और सही समय आने पर कृत्रिम गर्भाधान कराएं। उन्होंने यह भी बताया कि लगातार गीले फर्श पर बंधे रहने की वजह से पशुओं के खुरों की कोमल त्वचा फट जाती है, जिससे बैक्टीरिया आसानी से अंदर घुस जाते हैं और फुट रॉट जैसी गंभीर बीमारी को जन्म देते हैं। इस जानलेवा समस्या से बचाव के लिए जरूरी है कि पशुशाला का फर्श हमेशा सूखा रखा जाए। फर्श पर सूखा चूना या राख का छिड़काव करना काफी फायदेमंद साबित होता है। इसके साथ ही, 5 प्रतिशत कॉपर सल्फेट या लाल दवा के घोल से नियमित रूप से खुरों का फुट बाथ कराना भी पशुओं के स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी रहता है।



















