बिहार के पूर्णिया में कृषि कार्य से जुड़े किसानों के लिए यह समय बेहद अनुकूल है। स्थानीय जलवायु और मिट्टी की स्थिति को देखते हुए मटर की खेती को एक मजबूत आय का स्रोत माना जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस फसल से कम अवधि में ही बेहतरीन पैदावार और तगड़ा मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है। सही समय पर बुवाई करने से फसलों की गुणवत्ता भी बेहतर होती है और बाजार में उचित दाम मिलते हैं।
पूर्णिया के लिए मटर की उन्नत किस्में
इस विषय पर जानकारी साझा करते हुए पूर्णिया स्थित भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. विकास कुमार ने बताया कि किसानों के लिए कई बेहतरीन किस्में उपलब्ध हैं। जवाहर मटर एक पारंपरिक और बेहद लाभकारी किस्म है, जो किसानों को लंबे समय से अच्छा रिटर्न दे रही है। इसके अलावा किसान जवाहर मटर 83 और जवाहर मटर 15 का चयन भी कर सकते हैं।
कृषि वैज्ञानिक के अनुसार दक्षिण भारत के अनुसंधान केंद्रों से विकसित अर्रका अजीत, अर्रका कार्तिक और अर्रका संपूर्णा भी मटर की शीर्ष किस्मों में शामिल हैं। इसके अलावा बोनिबिलि किस्म की खेती भी बड़े पैमाने पर की जाती है। बाजार में मीठीफली नाम से जानी जाने वाली मटर की मांग सीधी सब्जी के रूप में काफी अधिक रहती है, जिसकी बड़े स्तर पर काश्त की जाती है।
बुवाई का सही समय और दूरी का प्रबंधन
मटर की खेती की मुख्य शुरुआत वैसे तो अक्टूबर के महीने से हो जाती है, लेकिन किसान भाई चाहें तो नवंबर माह में भी इसकी बुवाई कर सकते हैं। प्रति हेक्टेयर खेत के लिए 100 से 120 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। पौधों की सही बढ़वार के लिए पौधे से पौधे की दूरी करीब 15 सेंटीमीटर और कतार से कतार की दूरी लगभग 45 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। इसके अतिरिक्त पौधों को सहारा देने के लिए अलान की व्यवस्था करना भी आवश्यक होता है ताकि फसल सुरक्षित रहे।
उत्पादन चक्र और खाद प्रबंधन
हरी मटर की फसल अमूमन 75 से 80 दिनों के भीतर पूरी तरह तैयार हो जाती है। इसकी पहली तोड़ाई मात्र 35 दिनों के भीतर ही शुरू हो जाती है। किसान अपने खेतों से 35 से 40 दिनों के अंतराल पर आसानी से फल तोड़ सकते हैं। मटर के पौधों को बहुत अधिक उर्वरकों की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि इनकी जड़ों में राइजोबियम नामक बैक्टीरिया पाया जाता है, जो प्राकृतिक रूप से पौधों की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करता है।
बुवाई के शुरुआती चरण में प्रति हेक्टेयर 20 से 30 किलो नाइट्रोजन, 40 से 50 किलो फास्फोरस और इतनी ही मात्रा में पोटाश देने की सिफारिश की जाती है। खेत की नमी बनाए रखने के लिए हर 10 से 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना जरूरी है। इस फसल में गंभीर बीमारियों का खतरा भी बेहद कम होता है, जिससे किसानों को कम लागत में अधिक लाभ मिलता है।


















