नई दिल्ली। महानगरों में जमीन की लगातार बढ़ती कीमतों और निर्माण लागत में इजाफे के कारण फ्लैटों के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं। इस परिस्थिति के बीच अटके हुए रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स का पुनर्निर्माण अब बिल्डरों के लिए एक नया और बेहतरीन वैकल्पिक मॉडल बनता जा रहा है। इस मॉडल के जरिए बिल्डर्स को बेहतर मार्जिन हासिल हो रहा है और साथ ही घर खरीदारों को भी सीधा लाभ पहुंच रहा है। इसके चलते देश भर के तमाम महानगरों में रियल एस्टेट कंपनियां नई परियोजनाएं जमीन से शुरू करने के बजाय पुरानी अटकी परियोजनाओं का नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी), आपसी सहमति और विकास प्राधिकरणों के माध्यम से अधिग्रहण करने में खासी रुचि दिखा रही हैं। इस पूरी प्रक्रिया का सीधा मतलब यह है कि दिल्ली-एनसीआर समेत देश के बड़े महानगरों में लंबे समय से अटकी पड़ी रियल एस्टेट परियोजनाओं के समय पर पूरा होने की उम्मीद काफी बढ़ गई है।
बिल्डर्स को कैसे मिलता है वित्तीय फायदा
इस तरह के सौदों में डेवलपर्स को कई प्रकार के बड़े फायदे होते हैं। वे प्रोजेक्ट के लिए बेहद महंगी जमीन खरीदने के भारी खर्च से पूरी तरह बच जाते हैं और उनका पूरा ध्यान पुराने बिल्डर की बकाया देनदारियों, विकास प्राधिकरणों या अन्य वित्तीय संस्थानों के बकायों तथा मकान खरीदारों की बची हुई राशि सहित अन्य जरूरी खर्चों को चुकता करने पर रहता है। यह तरीका न केवल काफी सस्ता पड़ता है बल्कि प्रोजेक्ट को कम से कम लागत में पूरा करने का रास्ता भी साफ करता है। इस पूरी योजना के अंतर्गत तमाम बिल्डर अब अमिताभ कांत कमेटी की सिफारिशों और सीओसी द्वारा स्वीकृत योजना के अनुरूप जमीनों का पिछला बकाया चुकाकर दोबारा काम शुरू कर देते हैं। एक बेहतरीन योजना, सही पुनर्निर्माण और उचित सेल की रणनीति मिलकर प्रोजेक्ट की कुल लागत को नियंत्रण में रखती है, जिससे बिल्डर का प्रॉफिट मार्जिन काफी अच्छा हो जाता है।
लागत संतुलन और गुणवत्ता की चुनौती
रेनॉक्स ग्रुप के चेयरमैन शैलेन्द्र शर्मा का मानना है कि रियल एस्टेट कंपनियों के सामने आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती लैंड और कंस्ट्रक्शन कॉस्ट के बीच एक सही संतुलन बिठाना है। पहले से लॉन्च हो चुके और काफी हद तक बिक चुके प्रोजेक्ट्स पर अचानक बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ सीधे तौर पर घर खरीदार पर डालना बिल्कुल आसान काम नहीं होता। ऐसी स्थिति में, एकदम नई परियोजना शुरू करने के बजाय किसी अपेक्षाकृत अधूरे प्रोजेक्ट का अधिग्रहण करके उसे आगे बढ़ाना बिल्डर के लिए एक बेहतर व्यावसायिक अवसर तैयार करता है। इसमें मार्जिन को लगातार बनाए रखने के लिए केवल इनवेंटरी बढ़ाना ही जरूरी नहीं है, बल्कि क्वालिटी, बेहतरीन डिजाइन और आधुनिक सुविधाओं का पूरा ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है जो आज के दौर के घर खरीदारों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
पुराने निर्माण से घट जाती है लागत
बिल्डर्स का यह भी कहना है कि पुराने प्रोजेक्ट्स को टेकओवर करने का एक सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि वहां पहले से ही काफी हद तक निर्माण हो चुका होता है, जिससे कुल लागत में भारी कमी आती है। कई बार अधूरी परियोजनाओं में 15 से 50 फीसदी और कभी-कभी तो 70 से 80 फीसदी तक का निर्माण कार्य पहले से ही पूरा मिलता है। उस पहले से हो चुके निर्माण पर दोबारा से पैसा खर्च करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती है, बल्कि केवल पूर्व निर्माण की गुणवत्ता एवं सुरक्षा की सख्त जांच की जाती है और जरूरी सुधार किए जाते हैं। इसके अलावा, पहले से अप्रूव्ड नक्शों में सुधार और अपडेट करके फ्लोर एरिया रेशियो के आधार पर अतिरिक्त फ्लोर और यूनिट्स बढ़ाने का शानदार मौका मिल जाता है, जिससे साइट पर अधिक यूनिट्स के निर्माण का नया रास्ता खुल जाता है।
देनदारियों से मुक्ति और कानूनी प्रक्रिया
रियरको प्राइवेट लिमिटेड की एमडी गीतांजलि खन्ना का कहना है कि एनसीएलटी के माध्यम से मिलने वाली किसी भी परियोजना में पुरानी कानूनी और वित्तीय देनदारियां पूरी तरह से खत्म हो जाती हैं। जमीन और जरूरी मंजूरियां पहले से ही तैयार हालत में मिलती हैं। आधे-अधूरे बने हुए टॉवर तुलनात्मक रूप से कम कीमत पर मिल जाते हैं। शुरुआती चरण की लागत मुख्य रूप से अथॉरिटी का बकाया चुकाने और पुरानी मंजूरियों को दोबारा से वैलिड करवाने में ही खर्च होती है, इसलिए एकदम नए प्रोजेक्ट्स के मुकाबले कम लागत में काम बहुत तेजी से शुरू हो जाता है। स्वामिह फंड के विशेष प्रावधान और बिना बिके यूनिट्स से आने वाले फंड के जरिए इस तरह की अटकी हुई परियोजनाएं बहुत जल्द पूरी हो जाती हैं।
कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और निर्माण लागत
कच्चे माल के दामों में लगातार उछाल आने की वजह से देश भर में कंस्ट्रक्शन कॉस्ट लगातार बढ़ती जा रही है। साल 2023 से 2025 के बीच देश के टॉप सात शहरों में औसत कोर बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉस्ट करीब 13 फीसदी की बढ़ोतरी के साथ 1,956 रुपये से बढ़कर सीधे 2,212 रुपये प्रति वर्गफुट तक पहुंच चुकी है। वहीं दूसरी ओर, एमईपी कॉस्ट भी 17 फीसदी से ज्यादा बढ़कर 672 रुपये से सीधे 788 रुपये प्रति वर्गफुट हो गई है। ऐसे हालात में, जिन प्रोजेक्ट्स में पहले से कुछ निर्माण हो चुका है, वे नए डेवलपर्स को मौजूदा मार्केट कॉस्ट के मुकाबले काफी लागत बचाने का सुनहरा अवसर देते हैं। इसके अलावा, बाजार में आई जोरदार तेजी के कारण फ्लैट्स की समग्र मांग और औसत सेल वैल्यू में भी इजाफा हुआ है, जिसके चलते ऐसी अटकी हुई परियोजनाओं का पुनर्निर्माण कर उन्हें पूरा करना और अच्छा मुनाफा कमाना आज के समय में पूरी तरह संभव हो पा रहा है।
बिल्डर्स के सामने आने वाले अवसर और चुनौतियां
डिलीजेंट बिल्डर्स के सीओओ अश्वनी नागपाल का कहना है कि किसी भी अटकी हुई परियोजना की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेने पर नए बिल्डर को एक ही समय में अवसर और चुनौती दोनों का सामना करना पड़ता है। इससे प्रोजेक्ट से जुड़े सभी हितधारकों को घर सहित अपना बकाया मिलने की मजबूत संभावना बनती है। इनसॉल्वेनसी प्रक्रिया के तहत पुरानी सभी जिम्मेदारियां, चाहे वे लीगल हों या क्रिमिनल, नए आने वाले बिल्डर पर नहीं आती हैं। हालांकि, इसके लिए पुराने घर खरीदारों को बहुमत के साथ भरोसे में लेकर चलना बेहद जरूरी होता है, ताकि स्वीकृत योजना के अनुसार परियोजना के पूरा होने में किसी भी प्रकार की कोई रुकावट न आए। पूर्व निर्मित ढांचे की मौजूदगी से नए बिल्डर को शीघ्रता से निर्माण शुरू करने के साथ-साथ वित्तीय प्रबंधन में भी बहुत सहयोग मिलता है, जबकि सही तरीके से दोबारा डेवलप किए जाने से अच्छा मुनाफा भी आसानी से बन जाता है।
मकान खरीदारों और अर्थव्यवस्था को मिलने वाले लाभ
सरकार की इस पूरी पहल और कदम का सीधा फायदा अंततः आम मकान खरीदारों को भी मिलता है। सालों से अपने सपनों का घर पाने का इंतजार कर रहे खरीदारों को अब अपने घर का हक मिलने में बड़ी मदद मिल रही है। शुरुआती स्तर पर निर्माण के लिए जरूरी फंड जुटाने के वास्ते बिल्डर कई बार कम कीमत पर यूनिट्स की सेल करते हैं, जिससे आम लोगों को कम कीमत पर फ्लैट उपलब्ध होने की अच्छी गुंजाइश बनती है। जब कोई अटकी परियोजना दोबारा से शुरू होती है, तो उसके साथ ही रोजगार के नए अवसर और सैकड़ों प्रकार के सामानों की खरीद-बिक्री का सिलसिला स्वतः शुरू हो जाता है। इसके अलावा बिजली, पानी, इंटरनेट और रजिस्ट्री के माध्यम से सरकारी तिजोरी को भी बड़े पैमाने पर राजस्व की प्राप्ति होती है।

















