रोहतास जिले के बिक्रमगंज स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. रतन कुमार के मुताबिक, यदि पुराने आम के पेड़ों पर सूखी, कमजोर, रोगग्रस्त और गैर-जरूरी टहनियां मौजूद रहती हैं, तो इससे पेड़ों की पैदावार पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे पुराने पड़ चुके पेड़ों को पूरी तरह से काटने के स्थान पर यदि वैज्ञानिक विधियों से उनका कायाकल्प किया जाए, तो उनकी फल देने की क्षमता को दोबारा काफी हद तक वापस लाया जा सकता है।
शाखाओं की छंटाई और सुरक्षा
इस पूरी कायाकल्प प्रक्रिया की शुरुआत में पेड़ की उन सभी पुरानी, सूखी, खराब और अनावश्यक शाखाओं को करीने से काटकर अलग कर दिया जाता है जिनकी अब कोई उपयोगिता नहीं रह गई है। इसके तुरंत बाद, काटे गए हिस्सों पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप लगाया जाता है, ताकि कटे हुए स्थानों पर किसी भी प्रकार के फफूंद या कवक संक्रमण की आशंका को न्यूनतम किया जा सके। इसके अलावा, पौधों को कीटों और बीमारियों के संभावित हमलों से सुरक्षित रखने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत ईसी का इस्तेमाल किया जाता है, जिसका लगभग 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल तैयार करके पूरे पौधों पर छिड़काव किया जाना चाहिए।
बरसात के मौसम में खाद और पोषण
डॉ. रतन कुमार का यह भी कहना है कि पुराने आम के बागों के पुनरुद्धार के लिए बारिश का सीजन सबसे बेहतरीन और अनुकूल समय माना जाता है। इस अवधि के दौरान टहनियों की सुनियोजित छंटाई करने के साथ-साथ पेड़ों को भरपूर मात्रा में जैविक खाद और जरूरी पोषक तत्व मुहैया कराना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि खाद की मात्रा पौधे की आयु को ध्यान में रखकर ही तय की जानी चाहिए, जैसे कि लगभग एक साल पुराने पौधे में 1 किलो, दो साल के पौधे में 2 किलो और 10 साल या उससे अधिक उम्र के पुराने पेड़ों में करीब 10 किलो कंपोस्ट खाद डालना बेहद फायदेमंद साबित होता है।
रासायनिक उर्वरकों का सही इस्तेमाल
जैविक खाद या कंपोस्ट देने के लगभग एक महीने के अंतराल के पश्चात पेड़ों को जरूरी रासायनिक उर्वरक देना भी अनिवार्य हो जाता है। डॉ. रतन कुमार के अनुसार, पौधे की उम्र और उसके शारीरिक आकार के आधार पर ही यूरिया, डीएपी और पोटाश की सटीक मात्रा निर्धारित करना सही रहता है। उदाहरणस्वरूप, एक वर्ष पुराने पौधे के वास्ते लगभग 100 ग्राम यूरिया, 75 ग्राम डीएपी और 60 ग्राम पोटाश की मात्रा निर्धारित की गई है। जैसे-जैसे पौधे की आयु बढ़ती जाती है, इसी निश्चित अनुपात में इन पोषक तत्वों की मात्रा में भी बढ़ोतरी की जा सकती है, हालांकि बहुत बड़े एवं पुराने पेड़ों के मामले में वास्तविक मात्रा का निर्धारण मिट्टी की जांच, पेड़ की मौजूदा सेहत और किसी स्थानीय कृषि विशेषज्ञ के परामर्श के आधार पर करना ही सबसे बेहतर होता है।
उत्पादकता बढ़ाने के लिए समग्र प्रबंधन
कृषि विशेषज्ञ का मानना है कि पुराने आम के पेड़ों की सेहत सुधारने के लिए केवल पानी और खाद दे देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके साथ-साथ शाखाओं की सही ढंग से छंटाई, कीट एवं रोग नियंत्रण और संतुलित पोषण का एक साथ पालन करना अनिवार्य है। यदि किसान भाई सही समय पर इस पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया को अपनाते हैं, तो पेड़ों से नई शाखाएं फूटने लगती हैं और पूरे बाग की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार होने की संभावना बढ़ जाती है।
बेकार समझकर काटने से बचें
ऐसी स्थिति में यदि आपके आम के बाग के पेड़ काफी पुराने हो चुके हैं और उन्होंने फल देना लगभग बंद कर दिया है, तो उन्हें बेकार मानकर काटने की कोई आवश्यकता नहीं है। वैज्ञानिक तरीकों से उनका जीर्णोद्धार करके अपने पुराने और सूखे पड़ रहे बाग को एक बार फिर से हरा-भरा और उपजाऊ बनाया जा सकता है।



















