घरेलू बाजार में खाद्य पदार्थों के दाम लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। चीनी के बाद अब देश भर में चावल की खुदरा कीमतों में भारी उछाल आने का खतरा मंडराने लगा है। आम आदमी की थाली में परोसे जाने वाले दाल-चावल और बिरयानी जैसी चीजें आने वाले दिनों में और अधिक महंगी साबित हो सकती हैं। इस स्थिति को समय रहते भांपते हुए प्रशासन ने इसके दाम थामने के लिए एक बड़ी रणनीति तैयार की है, जिसके तहत खुले बाजार में खाद्यान्न का स्टॉक भारी मात्रा में उतारा जाएगा।
बाजार में उतारा जाएगा दोगुना चावल
उपभोक्ताओं को महंगाई के इस बोझ से बचाने के लिए अब केंद्र सरकार ने बाजार में चावल की उपलब्धता बढ़ाने का पुख्ता बंदोबस्त कर लिया है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्तवर्ष के दौरान ओपन मार्केट के माध्यम से निजी कारोबारियों को बेचे जाने वाले चावल के लक्ष्य को बढ़ाकर दोगुना कर दिया गया है। पहले इस अवधि में लगभग 25 लाख टन चावल बाजार में उतारने की योजना बनाई गई थी, लेकिन अब इस कोटे को बढ़ाकर सीधे 50 लाख टन कर दिया गया है ताकि खुदरा दरों पर दबाव कम किया जा सके।
उत्पादन में गिरावट की आशंका
खाद्य क्षेत्र से जुड़े उद्योग जगत के अधिकारियों का कहना है कि बीते एक दशक में यह पहला ऐसा मौका है जब देश में चावल के कुल उत्पादन में भारी कमी आने की आशंका जताई जा रही है। जानकारों के अनुसार यह पिछले 20 वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट साबित हो सकती है। इसकी मुख्य वजह यह है कि जब फसल पूरी तरह पककर तैयार हो रही थी, ठीक उसी दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कहीं ज्यादा बारिश दर्ज की गई, जिसके कारण खेतों में खड़ी फसल को भारी नुकसान पहुंचा है।
दाम नियंत्रित करने के लिए सख्त कदम
इस संकट से निपटने के लिए भारतीय खाद्य निगम यानी FCI के विशाल गोदामों से अनाज निकालकर खुले बाजार में सप्लाई करने की पूरी तैयारी कर ली गई है। इसके अलावा देश के कई दक्षिणी राज्यों जैसे कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखने के लिए सख्त निर्देश जारी किए गए हैं। इन इलाकों में जमाखोरी पर पूरी तरह लगाम कसने और कीमतों को नियंत्रण में रखने के उद्देश्य से 31 जनवरी, 2027 तक चावल और धान दोनों पर स्टॉक की सीमा तय कर दी गई है।
मानसून और मौसम की मार
गौरतलब है कि भारत वैश्विक स्तर पर चावल का सबसे बड़ा उत्पादक देश होने के साथ-साथ इसका सबसे बड़ा निर्यातक भी माना जाता है। इस बार कृषि उत्पादन प्रभावित होने के पीछे मुख्य रूप से कमजोर मानसून का हाथ रहा है, जहां इस वर्ष बारिश सामान्य स्तर से करीब 13 फीसदी कम दर्ज की गई थी। इसके ऊपर से कटाई के मुहाने पर आई बारिश ने बची-खुची कसर पूरी कर दी। अब सरकार का मुख्य फोकस आपूर्ति श्रृंखला को दुरुस्त करने के साथ-साथ किसी भी तरह की कालाबाजारी और जमाखोरी पर नकेल कसना है ताकि आम जनता को राहत मिल सके।


















