भारत के डिजिटल परिदृश्य में पिछले एक दशक के भीतर जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिला है। एक दौर था जब मोबाइल फोन पर बातचीत करने और थोड़ा सा इंटरनेट डेटा इस्तेमाल करने के लिए लोगों को अपनी जेब से भारी रकम चुकानी पड़ती थी। उस समय मोबाइल डेटा एक विलासिता माना जाता था और आम नागरिक इसका उपयोग बहुत सोच-समझकर करते थे। यह पूरी स्थिति साल 2016 में अचानक बदल गई, जब मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाली कंपनी रिलायंस जियो ने भारतीय टेलीकॉम बाजार में आधिकारिक तौर पर कदम रखा। कंपनी ने आते ही मुफ्त वॉयस कॉलिंग और बेहद किफायती डेटा प्लान पेश किए, जिसने करोड़ों भारतीयों के स्मार्टफोन इस्तेमाल करने के पुराने तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया। केवल 170 दिनों के भीतर 10 करोड़ ग्राहकों का बड़ा आंकड़ा छूने वाली इस कंपनी की शुरुआती यात्रा अब उसके संभावित आईपीओ के चलते एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है।
मुफ्त कॉलिंग और किफायती डेटा से टेलीकॉम सेक्टर में नया मोड़
रिलायंस जियो के टेलीकॉम सेक्टर में कदम रखने से पहले ग्राहकों को आउटगोइंग कॉलिंग और सीमित इंटरनेट के लिए अलग-अलग रिचार्ज प्लान लेने पड़ते थे। बिलिंग की यह व्यवस्था आम उपयोगकर्ताओं के बजट पर भारी पड़ती थी। जियो ने अपनी शुरुआती सेवा के तहत उपभोक्ताओं को बिना किसी शुल्क के वॉयस कॉलिंग और भरपूर डेटा मुहैया कराया। इस आक्रामक रणनीति ने देश में मोबाइल इंटरनेट के उपयोग को जबरदस्त रफ्तार दी। बाजार में टिके रहने के लिए अन्य सभी टेलीकॉम कंपनियों को भी अपनी सेवाओं की दरों में भारी कटौती करनी पड़ी और अपने पुराने प्लान बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा। कंपनी का मकसद केवल ग्राहकों की संख्या बढ़ाना ही नहीं था, बल्कि देश के कोने-कोने तक आधुनिक संचार सुविधाओं को आम जनता की पहुंच में लाना भी था। इस सस्ते डेटा के दम पर वीडियो स्ट्रीमिंग, ऑनलाइन शिक्षा और विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल हर वर्ग के लिए बेहद आसान बन गया।
मात्र 170 दिनों में 10 करोड़ ग्राहकों का ऐतिहासिक आंकड़ा
टेलीकॉम इतिहास में किसी भी नई सेवा के विस्तार की रफ्तार इतनी तेज पहले कभी नहीं देखी गई थी। कंपनी ने अपने वाणिज्यिक लॉन्च के सिर्फ 170 दिनों के भीतर 10 करोड़ उपयोगकर्ताओं को अपने नेटवर्क से जोड़ लिया। यह तेज वृद्धि भारतीय बाजार में एक क्रांतिकारी बदलाव साबित हुई। इस बड़े विस्तार के चलते भारत तेजी से दुनिया में मोबाइल ब्रॉडबैंड डेटा की खपत के मामले में शीर्ष देशों की कतार में आकर खड़ा हो गया। इससे पहले महंगे इंटरनेट की वजह से देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऑनलाइन दुनिया से पूरी तरह कटा हुआ था, लेकिन सस्ती डेटा दरों ने पहली बार स्मार्टफोन चला रहे करोड़ों नए उपयोगकर्ताओं के लिए डिजिटल दुनिया के दरवाजे खोल दिए।
दूरदराज के इलाकों और ग्रामीण भारत तक कनेक्टिविटी का विस्तार
नेटवर्क विस्तार के दौरान बुनियादी ढांचे को केवल बड़े महानगरों या औद्योगिक शहरों तक सीमित नहीं रखा गया। कंपनी ने सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों, घने जंगलों और आदिवासी बस्तियों तक भी मोबाइल टावर और 4G कनेक्टिविटी पहुंचाने पर विशेष ध्यान दिया। इन पिछड़े और दुर्गम क्षेत्रों के निवासियों के लिए मोबाइल नेटवर्क केवल मनोरंजन या सोशल मीडिया तक सीमित साधन नहीं रहा। इस कनेक्टिविटी की मदद से आपात स्थिति में लोग अपने परिवारों से तुरंत संपर्क साधने लगे, दूरस्थ चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने लगे तथा नए आर्थिक और डिजिटल अवसरों से सीधे जुड़ पाए।
महामारी के संकट काल में लाइफलाइन बना डिजिटल नेटवर्क
साल 2020 में फैली कोरोना महामारी और देशव्यापी लॉकडाउन के कठिन दिनों में इंटरनेट की अहमियत और अनिवार्यता स्पष्ट रूप से सामने आई। संक्रमण से बचाव के लिए स्कूल और कॉलेज बंद हुए तो बच्चों की पूरी पढ़ाई ऑनलाइन माध्यम पर शिफ्ट हो गई। अनगिनत निजी और सरकारी दफ्तरों ने वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने की प्रणाली अपनाई, और अस्पतालों की भीड़ से बचने के लिए मरीजों ने डॉक्टरों से ऑनलाइन परामर्श लेना शुरू किया। इस चुनौतीपूर्ण दौर में मोबाइल नेटवर्क ने अलग-थलग पड़े परिवारों को एक-दूसरे से जोड़े रखने का सबसे बड़ा काम किया। इस कठिन परिस्थिति में टेलीकॉम कंपनियों के बुनियादी ढांचे ने भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन को गतिमान बनाए रखने में एक केंद्रीय भूमिका निभाई।
सार्वजनिक निर्गम की सुगबुगाहट के बीच भविष्य की राह
सस्ते प्लान और विशाल नेटवर्क के साथ शुरू हुई यह यात्रा अब पूंजी बाजार में संभावित लिस्टिंग के एक नए मुकाम पर पहुंचती दिख रही है। समय के साथ साधारण कॉलिंग नेटवर्क से आगे बढ़कर पूरी कंपनी एक बड़े डिजिटल और तकनीकी तंत्र के रूप में विकसित हो चुकी है। अब जब शेयर बाजार में कंपनी के संभावित आईपीओ को लेकर चर्चाएं तेज हैं, तो आम निवेशकों और संस्थागत फंड्स की दिलचस्पी भी इस पर बढ़ गई है। सस्ते टैरिफ, व्यापक नेटवर्क कवरेज और डेटा की बढ़ती मांग के दम पर खड़ा हुआ यह मॉडल दिखाता है कि किस तरह एक रणनीतिक बदलाव ने पूरे देश के टेलीकॉम और डिजिटल इकोसिस्टम की तस्वीर बदल दी।
















