नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने सम्मेलन के मंच से अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करने का आह्वान करते हुए ब्रिक्स सदस्य देशों को अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में लेन-देन बढ़ाने की सलाह दी है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की केंद्रीय भूमिका को समाप्त करके ही सदस्य देश अपने आर्थिक हितों की रक्षा कर सकते हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब वाशिंगटन की तरफ से लगातार प्रतिबंधों और टैरिफ की चेतावनियां दी जा रही हैं। इसके बावजूद भारत और ईरान जैसे देश अपने द्विपक्षीय व्यापार बास्केट का दायरा बढ़ाने पर सहमत हुए हैं, जो यह दर्शाता है कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं किसी भी बाहरी दबाव के सामने झुकने के मूड में नहीं हैं।
ईरानी राष्ट्रपति की सलाह और द्विपक्षीय व्यापार का बढ़ता दायरा
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन और भारतीय नेतृत्व के बीच बिश्केक में हुई पिछली मुलाकात के दौरान भी व्यापार संबंधों को मजबूत करने पर सहमति बनी थी। वहां दोनों पक्षों ने स्पष्ट किया था कि भारत और ईरान अपने द्विपक्षीय व्यापार बास्केट का विस्तार जारी रखेंगे। यह निर्णय उस समय सामने आया था जब डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से यह चेतावनी दी गई थी कि ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा। इस कड़े रुख के बावजूद भारत द्वारा व्यापार बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाना यह संदेश देता है कि देश अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्र आर्थिक प्राथमिकताओं के आधार पर निर्णय ले रहा है।
90% स्थानीय मुद्रा व्यापार और 'डॉलर के हथियार' का विरोध
क्रेमलिन के प्रवक्ता डिमित्री पेस्कोव ने इस आर्थिक परिवर्तन के आंकड़ों को साझा करते हुए पुष्टि की है कि ब्रिक्स सदस्य देश अब आपस में होने वाले 90% भुगतान और लेन-देन को अपनी स्थानीय मुद्राओं में पूरा कर रहे हैं। डिमित्री पेस्कोव के अनुसार, अमेरिका द्वारा डॉलर का उपयोग एक राजनीतिक और वित्तीय हथियार के रूप में किया जा रहा है, जिससे निपटने के लिए सदस्य देशों ने वैकल्पिक भुगतान तंत्र को प्राथमिकता दी है। विश्व की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंच अब एक एकीकृत मौद्रिक रणनीति की तरफ बढ़ रहा है, जिससे किसी एकल देश की मनमानी व्यवस्था को नियंत्रित किया जा सके।
न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB): स्थापना, ढांचा और वित्तीय तंत्र
डी-डॉलरलाइजेशन की इस पूरी प्रक्रिया को गहराई से समझने के लिए न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) के मॉडल और उसकी कार्यप्रणाली को जानना आवश्यक है। ब्रिक्स बैंक की स्थापना वर्ष 2014 में ब्राजील के फोर्टालेजा शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी। इस बैंक को 100 बिलियन डॉलर की शुरुआती पूंजी के साथ शुरू किया गया था, जिसमें पांचों संस्थापक सदस्य देशों ने 10-10 बिलियन डॉलर का योगदान दिया था। बाद में मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, बांग्लादेश और इथियोपिया जैसे नए देशों को सदस्य के रूप में शामिल किया गया।
बैंक के नियमों के अनुसार, नए सदस्यों के जुड़ने के बाद भी संस्थापक देशों की कुल हिस्सेदारी 55% से कम नहीं हो सकती है। इस बैंक का मुख्यालय शंघाई (चीन) में स्थित है, जबकि इसके क्षेत्रीय कार्यालय साओ पॉलो (ब्राजील), जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) और गांधीनगर (भारत) में कार्यरत हैं। भारत के वित्तीय विशेषज्ञ केवी कामत इस बैंक के पहले प्रमुख बने थे। ब्रिक्स बैंक का नेतृत्व रोटेशनल आधार पर तय होता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) या विश्व बैंक (World Bank) की तरह किसी एक देश का वीटो अधिकार या एकतरफा दबदबा नहीं रहता है।
बॉन्ड जारी करने की रणनीति और डी-डॉलरलाइजेशन के व्यावहारिक चैलेंज
न्यू डेवलपमेंट बैंक बुनियादी ढांचे, स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन और शहरी विकास जैसी परियोजनाओं के लिए सदस्य देशों को ऋण वितरित करता है। फंड जुटाने के लिए यह बैंक अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बॉन्ड जारी करता है। अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने के लिए अब भारतीय रुपए, चीनी युआन, ब्राजीलियाई रियाल और दक्षिण अफ्रीकी रैंड में भी बॉन्ड जारी किए जा रहे हैं। बैंक का लक्ष्य है कि उसके द्वारा दिए जाने वाले कुल ऋण का कम से कम 30% हिस्सा स्थानीय मुद्राओं में वितरित किया जाए, जिससे सदस्य देशों को फॉरेक्स फ्लक्चुएशन (विदेशी मुद्रा में उतार-चढ़ाव) के जोखिम से सुरक्षा मिल सके।
हालांकि, डी-डॉलरलाइजेशन का यह रास्ता रातोंरात पूरा नहीं हो सकता और इसमें कई बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं। ब्रिक्स बैंक को आज भी अपनी फंडिंग का एक हिस्सा जुटाने के लिए अंतरराष्ट्रीय डॉलर बाजारों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके अलावा, वैश्विक व्यापार संदेश प्रणाली SWIFT नेटवर्क पर अभी भी 80% से 85% लेन-देन निर्भर हैं। जब तक ब्रिक्स देश अपना पूरी तरह से स्वतंत्र वित्तीय मैसेजिंग सिस्टम नहीं बना लेते, तब तक डॉलर पर पूरी निर्भरता समाप्त करना एक कठिन कार्य बना रहेगा।
ब्रिक्स का वैश्विक आर्थिक वजन और कच्चे तेल का समीकरण
आर्थिक क्षमता के मामले में ब्रिक्स एक बेहद शक्तिशाली समूह के रूप में उभरा है। विश्व की लगभग 50% आबादी इन देशों में निवास करती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी के आधार पर, ब्रिक्स के 10 सदस्य देशों की नॉमिनल जीडीपी पूरी दुनिया की 30% है। यदि क्रय शक्ति समानता (PPP) के आधार पर गणना की जाए, तो ब्रिक्स देशों का हिस्सा 40% तक पहुंच जाता है।
ऊर्जा क्षेत्र में भी इस गठबंधन का दबदबा काफी मजबूत हुआ है। ब्राजील, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान के शामिल होने के बाद ब्रिक्स देश अब दुनिया के 40% से अधिक कच्चे तेल का उत्पादन करते हैं। भारत और चीन इस उत्पादित तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं। जब उत्पादन और उपभोग दोनों इस समूह के भीतर ही मौजूद हैं, तो डॉलर के बिना व्यापार करने का तंत्र बनाना व्यावहारिक रूप से संभव हो जाता है।
ट्रंप की चिढ़, 100% टैरिफ का दांव और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर असर
नरेंद्र मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की एकजुटता और हंसती हुई तस्वीरों से वाशिंगटन की चिंताएं बढ़ गई हैं। अमेरिकी रणनीतिकारों को डर है कि यदि डॉलर की वैश्विक मुद्रा के रूप में मांग घटती है, तो इसका सीधा नकारात्मक असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। डॉलर का प्रभुत्व कम होने से अमेरिका में मुद्रास्फीति (महंगाई) बढ़ सकती है और उसकी उधार लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
इसी खतरे को देखते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि जो भी देश डॉलर को कमजोर करने या उसके विकल्प के रूप में नई व्यवस्था बनाने का प्रयास करेगा, उस पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा। वह ब्रिक्स की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हुए इसे अप्रभावी करार देने की कोशिश करते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्रिक्स देश अपना स्वतंत्र सेटलमेंट सिस्टम सफलतापूर्वक स्थापित कर लेते हैं, तो अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ का असर काफी हद तक बेअसर हो जाएगा। यही आर्थिक बदलाव वाशिंगटन की बेचैनी का सबसे प्रमुख कारण है।


















