उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा 2026 में शामिल होने वाले लाखों अभ्यर्थियों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की तरफ से एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। अदालत ने प्राथमिक स्तर की इस पात्रता परीक्षा के मास्टर प्रश्नपत्र में शामिल दो विवादास्पद प्रश्नों को मूल्यांकन प्रक्रिया से पूरी तरह बाहर करने का आदेश दिया है। इस न्यायिक हस्तक्षेप के बाद परीक्षा का संपूर्ण स्कोरकार्ड अब नए सिरे से तैयार किया जाएगा, जिससे उन हजारों उम्मीदवारों को सीधी राहत मिलने की संभावना है जो केवल एक या दो अंकों के मामूली अंतर से उत्तीर्ण होने से वंचित रह गए थे।
मास्टर सेट के दो सवालों पर क्यों खड़ा हुआ था विवाद
उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग ने 3 जुलाई को प्राथमिक स्तर की यूपीटीईटी परीक्षा आयोजित की थी। इसके बाद 26 अगस्त को परीक्षा के परिणाम घोषित किए गए थे। परिणाम सार्वजनिक होते ही परीक्षा की अंतिम उत्तर कुंजी यानी फाइनल आंसर की को लेकर अभ्यर्थियों में असंतोष फैल गया। मास्टर प्रश्नपत्र के प्रश्न संख्या 36 और प्रश्न संख्या 37 के उत्तरों को लेकर आयोग ने एक ही प्रश्न के दो अलग-अलग विकल्पों को सही मान लिया था। एक बहुविकल्पीय परीक्षा प्रणाली में किसी एक प्रश्न के दो अलग उत्तरों को वैध ठहराए जाने से पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे।
अभ्यर्थियों के हाईकोर्ट जाने की मुख्य वजह
आयोग ने परिणाम तैयार करते समय केवल उन्हीं परीक्षार्थियों को अंक प्रदान किए थे जिन्होंने उन दो स्वीकृत विकल्पों में से किसी एक को अपनी उत्तर पुस्तिका में चुना था। दूसरी तरफ, जिन अभ्यर्थियों ने विकल्पों में विरोधाभास देखकर प्रश्न हल नहीं किया या जो भ्रम की स्थिति के कारण कोई अन्य निर्णय ले बैठे, उन्हें इसका कोई लाभ नहीं मिला। इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा नुकसान उन सामान्य और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों को उठाना पड़ा, जो निर्धारित न्यूनतम अर्हक अंक यानी 82 अंकों से केवल एक या डेढ़ नंबर के फासले से अनुत्तीर्ण घोषित हो गए थे। इसी विसंगति और असमान मूल्यांकन के विरोध में विजय सोनकर तथा अन्य प्रभावित अभ्यर्थियों ने न्याय की गुहार लगाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण ली थी।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की अहम टिप्पणी और आदेश
इस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने परीक्षा प्रणाली की निष्पक्षता पर बेहद महत्वपूर्ण अवलोकन किया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब किसी बहुविकल्पीय वस्तुनिष्ठ परीक्षा में चयन संस्था स्वयं ही एक प्रश्न के दो अलग-अलग उत्तरों को सही स्वीकार कर लेती है, तो उस प्रश्न का वास्तविक औचित्य और मूल्यांकन क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसा प्रश्न किसी भी स्थिति में योग्य और अयोग्य अभ्यर्थी के बीच सटीक अंतर तय करने में सक्षम नहीं रह जाता। संविधान में निहित समानता के मौलिक अधिकार की रक्षा करने के उद्देश्य से अदालत ने आदेश दिया कि प्रश्न संख्या 36 और 37 को मूल्यांकन प्रक्रिया से पूरी तरह हटा दिया जाए।
अब 148 अंकों पर इस तरह तैयार होगा नया परिणाम
अदालत के निर्देश के अनुसार, अब यूपीटीईटी 2026 का पूरा प्रश्नपत्र 150 अंकों के स्थान पर 148 अंकों का माना जाएगा। कुल पूर्णांक 148 होने के बाद उसी अनुपात में उत्तीर्ण होने के लिए आवश्यक न्यूनतम प्रतिशत की पुनः गणना की जाएगी। उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग को निर्देशित किया गया है कि वह सभी प्रभावित अभ्यर्थियों के प्राप्तांकों की नए सिरे से गणना करे और संशोधित स्कोरकार्ड जारी करे। इसके साथ ही अदालत ने यह तथ्य भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि इस परीक्षा में सफल होने का प्रमाण पत्र केवल पात्रता निर्धारित करता है, यह किसी भी अभ्यर्थी को परिषदीय विद्यालयों में सहायक अध्यापक के पद पर सीधे नियुक्ति पाने का दावा करने का अधिकार नहीं देता है।



















