सोशल मीडिया पर एक पोस्ट खूब चर्चा में है, जिसमें एक कर्मचारी ने नौकरी छोड़ने के बाद अपने अकाउंट में गलती से आई पूरी सैलरी सिर्फ ईमानदारी की बदौलत वापस लौटा दी। यह किस्सा श्रेयांश जैन का है, जिन्होंने लिंक्डइन पर अपना अनुभव शेयर करते हुए बताया कि कैसे एक पेरोल गलती ने कंपनी की पूरी सिस्टम खामी उजागर कर दी।
श्रेयांश जैन का कंपनी में आखिरी कामकाजी दिन 31 जुलाई था। इसके बाद अगस्त महीने में उन्होंने कंपनी के लिए कोई काम नहीं किया। इसके बावजूद 1 सितंबर को उनके बैंक खाते में अगस्त महीने की पूरी सैलरी क्रेडिट हो गई। यह देखकर वे भी हैरान रह गए, क्योंकि उन्हें पता था कि यह पैसा उनका हक नहीं है।
पहले तो श्रेयांश ने सोचा कि यह कंपनी के पेरोल विभाग की मामूली चूक है और जल्द ही खुद इसे ठीक कर लिया जाएगा। उन्हें उम्मीद थी कि ट्रांजैक्शन अपने आप रिवर्स हो जाएगा। लेकिन पूरा दिन गुजरने के बाद भी न कंपनी की तरफ से कोई कॉल आया, न ईमेल और न ही कोई मेसेज। इसके बाद उन्होंने चुपचाप इंतजार करने के बजाय खुद कदम उठाने का फैसला किया।
खुद फाउंडर्स को लिखा ईमेल
श्रेयांश ने इंतजार करने के बजाय सीधे कंपनी के फाउंडर्स को ईमेल किया और उन्हें इस गलती की पूरी जानकारी दी। साथ ही उन्होंने पैसे वापस भेजने के लिए कंपनी की बैंक डिटेल्स भी मांगीं। उनका यह कदम इतना कारगर साबित हुआ कि कुछ ही घंटों में एचआर टीम एक्टिव हो गई और 48 घंटे के भीतर पूरी रकम सही जगह पहुंच गई।
अगर श्रेयांश चाहते तो यह पैसा चुपचाप रख सकते थे या फिर कंपनी के खुद संपर्क करने का हफ्तों इंतजार कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और सीधे टॉप मैनेजमेंट तक बात पहुंचाई। इस पूरी घटना ने यह साबित कर दिया कि अगर नीयत साफ हो, तो किसी भी कॉरपोरेट गड़बड़ी को बिना किसी कड़वाहट या कानूनी झंझट के महज 48 घंटों में सुलझाया जा सकता है।
जब कंपनी का सिस्टम ही भूल गया इस्तीफा
श्रेयांश जैन के मुताबिक किसी इंसान या पेरोल सॉफ्टवेयर से गलती हो जाना कोई असामान्य बात नहीं है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कंपनी का अपना ऑटोमेटेड सिस्टम भी इतनी बड़ी चूक को पकड़ नहीं पाया। अगर कोई पूर्व कर्मचारी खुद आगे आकर यह जानकारी न दे, तो शायद कंपनी को महीनों तक पता ही नहीं चलता कि उसका पैसा किस तरह बेवजह बर्बाद हो रहा है। यह बात अकेले इस कंपनी की नहीं, बल्कि उन तमाम संगठनों के लिए चेतावनी है जो मानते हैं कि टेक्नोलॉजी हर गलती अपने आप पकड़ लेगी।
तेजी से बढ़ते स्टार्टअप्स के लिए सबक
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की ईमानदारी की कहानी नहीं है, बल्कि तेजी से आगे बढ़ रही कंपनियों के लिए एक चेतावनी भी है। जब कोई कंपनी तेजी से नई भर्तियां करती है, तो अक्सर उसकी ऑफबोर्डिंग प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है। किसी पूर्व कर्मचारी के खाते में सैलरी पहुंचना यही दिखाता है कि एचआर और फाइनेंस डिपार्टमेंट के बीच तालमेल की भारी कमी है। ऐसे मामलों में अक्सर किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की खामी जिम्मेदार होती है।
'घोस्ट एम्प्लॉई' फ्रॉड का खतरा
कॉरपोरेट जगत में इस तरह की घटनाओं को अक्सर 'घोस्ट एम्प्लॉई फ्रॉड' या 'पेरोल स्लिपेज' की कैटेगरी में रखा जाता है। कई बड़ी कंपनियों में पूर्व कर्मचारियों के नाम पर महीनों तक सैलरी निकलती रहती है, और इंटरनल ऑडिट न होने की वजह से कंपनी को करोड़ों रुपये का नुकसान झेलना पड़ता है। ऐसे मामलों का पता तभी चलता है जब कोई कर्मचारी खुद सामने आए या फिर कोई बड़ा ऑडिट किया जाए।
ऐसी गड़बड़ियों से बचने के लिए कंपनियों को तीन जरूरी कदम उठाने चाहिए
- 3-वे वेरिफिकेशन: इस्तीफे की जानकारी का एचआर, फाइनेंस और मैनेजर, तीनों स्तर पर ऑटोमेटेड क्रॉस-चेक होना चाहिए।
- ऑफबोर्डिंग चेकलिस्ट: कर्मचारी के आखिरी दिन ही पेरोल सॉफ्टवेयर में उसका स्टेटस 'इनएक्टिव' मार्क कर दिया जाना चाहिए।
- छमाही पेरोल ऑडिट: हर 6 महीने पर एक्टिव और रिलीव्ड कर्मचारियों के डेटा का मिलान जरूर किया जाना चाहिए।
श्रेयांश जैन का यह अनुभव दिखाता है कि टेक्नोलॉजी चाहे कितनी भी एडवांस क्यों न हो, इंसानी निगरानी और ईमानदारी की जगह कोई नहीं ले सकता। एक कर्मचारी की सतर्कता और सही समय पर उठाया गया कदम न सिर्फ कंपनी का नुकसान बचा सकता है, बल्कि भरोसे की मिसाल भी कायम कर सकता है। लिंक्डइन पर यह पोस्ट इसीलिए इतनी वायरल हुई क्योंकि इसमें ईमानदारी और कॉरपोरेट लापरवाही, दोनों की झलक एक साथ दिखी।



















