बच्चों को अनुशासन और मजबूत लीडरशिप गुण देने के लिए मशहूर सैनिक स्कूलों को लेकर ज्यादातर अभिभावक यही सोचते हैं कि यहां दाखिला लेने वाला हर बच्चा बड़ा होकर सिर्फ फौज में ही भर्ती होगा। जबकि हकीकत इस सोच से कहीं आगे की है। सुबह पांच बजे की परेड से लेकर रात की सेल्फ स्टडी तक चलने वाला सख्त रूटीन इन बच्चों के अंदर एक ऐसा अनुशासन भर देता है, जो उन्हें सेना से लेकर प्रशासन, कॉरपोरेट दुनिया, खेल के मैदान और रिसर्च लैब तक हर जगह आगे निकलने में मदद करता है।
इन स्कूलों को शुरू करने का मूल मकसद नेशनल डिफेंस एकेडमी यानी एनडीए के लिए कैडेट तैयार करना था, लेकिन दशकों में इनका असर फौज की सीमाओं से बाहर निकलकर जिंदगी के लगभग हर बड़े क्षेत्र तक पहुंच चुका है। कई बच्चे शुरू से ही सेना में जाने का इरादा नहीं रखते, फिर भी सैनिक स्कूल में पढ़ाई करना चाहते हैं। ऐसे बच्चे अक्सर इस उलझन में रहते हैं कि दाखिला लेते ही आगे चलकर वर्दी पहनना अनिवार्य हो जाएगा, जबकि सच्चाई इससे अलग है।
रक्षा बलों में अफसर बनने का पहला और सबसे बड़ा रास्ता
सैनिक स्कूल का सबसे बड़ा और पुराना लक्ष्य बच्चों को एनडीए और कंबाइंड डिफेंस सर्विसेज यानी सीडीएस के जरिए भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना में अफसर बनाना रहा है। देश की सेना में ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों में से एक बड़ा हिस्सा सैनिक स्कूलों के पुराने छात्रों का ही है। यहां से निकले छात्र लेफ्टिनेंट, कैप्टन, स्क्वॉड्रन लीडर और एडमिरल जैसे प्रतिष्ठित पदों तक पहुंचते हैं। सुबह की परेड से शुरू होने वाली सख्त दिनचर्या इन्हीं छात्रों को सेना की चुनौतीपूर्ण जिंदगी के लिए मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से पहले से तैयार कर देती है।
सिविल सेवा में भी दिखता है सैनिक स्कूल के छात्रों का दबदबा
जो छात्र सेना की मेडिकल जांच में पास नहीं हो पाते या किसी वजह से एनडीए तक नहीं पहुंच पाते, उनमें से बड़ी तादाद सिविल सर्विसेज की तरफ रुख करती है। सैनिक स्कूल में मिलने वाला जनरल नॉलेज का मजबूत आधार, देश-दुनिया की गहरी समझ और मुश्किल हालात में तुरंत सही फैसला लेने की आदत यूपीएससी की परीक्षा में उनके बहुत काम आती है। यही वजह है कि देश के कई जाने-माने आईएएस और आईपीएस अधिकारी सैनिक स्कूलों की ही देन हैं। स्कूल के दिनों में सीखी गई अनुशासन की आदत बाद में प्रशासनिक सेवा की जिम्मेदारियां संभालने में भी उतनी ही काम आती है, जितनी सेना में।
गूगल-अमेज़न से टाटा-रिलायंस तक, कॉरपोरेट दुनिया में भी जलवा
सैनिक स्कूल में टीमवर्क, टाइम मैनेजमेंट और क्राइसिस मैनेजमेंट यानी मुसीबत के वक्त सही और तुरंत फैसला लेने की कला बहुत बारीकी से सिखाई जाती है। यही कारण है कि आज गूगल, अमेज़न, टाटा और रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों में सैनिक स्कूल के कई पुराने छात्र टॉप मैनेजमेंट, प्रोजेक्ट हेड और एचआर जैसे लीडरशिप रोल्स में काम कर रहे हैं। कंपनियां ऐसे कर्मचारियों को तरजीह देती हैं जो दबाव में भी शांत रहकर सही फैसला ले सकें, और सैनिक स्कूल की ट्रेनिंग ठीक यही गुण छात्रों में विकसित करती है।
एडवेंचर और अनुशासनप्रिय जिंदगी के शौकीन छात्र मर्चेंट नेवी में कैप्टन या मरीन इंजीनियर भी बनते हैं। इसके अलावा कमर्शियल पायलट बनने की दौड़ में भी ये छात्र काफी आगे रहते हैं, क्योंकि सैनिक स्कूल की सख्त ट्रेनिंग उन्हें तकनीकी और मानसिक, दोनों मोर्चों पर बेहद मजबूत बनाती है। समंदर में जहाज चलाने से लेकर आसमान में विमान उड़ाने तक, हर जगह अनुशासन और तेज फैसले लेने की यही आदत उनके काम आती है।
खेल के मैदान से लेकर रिसर्च और अपने बिजनेस तक फैला दायरा
सैनिक स्कूल में खेल कोई अतिरिक्त गतिविधि नहीं, बल्कि रोजमर्रा की दिनचर्या का जरूरी हिस्सा होता है। यही वजह है कि यहां से पढ़े कई छात्र नेशनल और इंटरनेशनल स्तर के एथलीट बनते हैं। वहीं कुछ छात्र अपनी खुद की कंपनियां शुरू कर सफल एंटरप्रेन्योर यानी उद्यमी बनते हैं, क्योंकि जोखिम उठाने का जो जज्बा उनमें स्कूल के दिनों से पनपता है, वही उन्हें बिजनेस की दुनिया में भी नई ऊंचाइयों तक ले जाता है।
साइंस और मैथ्स जैसे विषयों पर भी सैनिक स्कूल में बहुत बारीकी से ध्यान दिया जाता है। यही वजह है कि एनडीए के अलावा बड़ी संख्या में छात्र आईआईटी और एनआईटी जैसे इंजीनियरिंग संस्थानों के साथ-साथ एम्स जैसे टॉप मेडिकल कॉलेजों में भी एडमिशन पाते हैं। आगे चलकर यही छात्र सफल सर्जन, इसरो में वैज्ञानिक या नामी यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसर तक बनते हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो सैनिक स्कूल की पढ़ाई किसी एक पेशे तक सीमित नहीं है। यहां से मिलने वाला अनुशासन, आत्मविश्वास और लीडरशिप का गुण छात्रों को चाहे वे सेना चुनें, सिविल सर्विस, कॉरपोरेट जगत, समंदर, आसमान, खेल का मैदान या रिसर्च लैब, हर जगह आगे बढ़ने में मदद करता है।


















