सरगुजा जिले में सितंबर की शुरुआत के साथ ही धान के पौधों में कल्ले फूटने का सिलसिला तेज हो गया है, और खेती के इस सबसे नाजुक मोड़ पर बरती गई हर छोटी-बड़ी लापरवाही सीधे उपज पर असर डाल सकती है। कृषि विशेषज्ञ संजय यादव ने किसानों को इस दौर में बरती जाने वाली सावधानियों को लेकर विस्तार से सलाह दी है।
संजय यादव के मुताबिक, सितंबर का महीना धान की बालियों से पहले कल्लों के विकास के लिहाज से सबसे अहम होता है। इस दौरान किसानों को सबसे पहले अपने खेत की मौजूदा हालत परखनी चाहिए, यह देखना चाहिए कि पौधों को पोषण की कितनी जरूरत है, और उसी हिसाब से खाद का छिड़काव करना चाहिए। सही समय पर सही मात्रा में पोषण मिलने से ही कल्लों का विकास ठीक से हो पाता है।
पोटाश से बढ़ेगी पौधों की ताकत
विशेषज्ञ ने बताया कि खरीफ की फसल में जरूरत के मुताबिक पोटाश का इस्तेमाल किया जा सकता है। पोटाश पौधों के तने को मजबूत बनाता है, जिससे वे प्रतिकूल मौसम और परिस्थितियों का सामना बेहतर तरीके से कर पाते हैं। इसके साथ ही पोटाश धान के दानों की चमक, गुणवत्ता और वजन बढ़ाने में भी मददगार साबित होता है, यानी सीधे तौर पर इसका असर आखिरी उत्पादन पर पड़ता है।
संजय यादव ने यह भी स्पष्ट किया कि संतुलित पोषण मिलने पर फसल की समग्र मजबूती बढ़ती है, जिससे पौधों में रोग और कीटों से लड़ने की क्षमता भी बेहतर होती है। हालांकि उन्होंने चेताया कि खाद और पोटाश की सही मात्रा हर खेत के लिए एक जैसी नहीं होती, इसका फैसला खेत की मिट्टी और फसल की विशिष्ट जरूरत को देखकर ही लेना चाहिए।
यूरिया का छिड़काव मौसम देखकर ही करें
यूरिया के इस्तेमाल को लेकर संजय यादव ने खास सावधानी बरतने की सलाह दी है। उनका कहना है कि यूरिया का छिड़काव तभी करना चाहिए जब मौसम साफ हो और फसल को वाकई इसकी जरूरत हो। ऐसा करने से पौधों में हरापन बना रहता है और कल्लों का विकास भी बेहतर ढंग से होता है।
सिर्फ एक खाद पर निर्भर न रहें किसान
कृषि विशेषज्ञ ने किसानों से अपील की कि वे धान की फसल में सिर्फ एक ही तरह की खाद पर निर्भर न रहें। इसके बजाय फसल किस अवस्था में है और उसे किस पोषक तत्व की कितनी जरूरत है, इसे समझकर संतुलित तरीके से पोषण प्रबंधन करना चाहिए। संजय यादव के मुताबिक यही संतुलन आगे चलकर मजबूत फसल और बेहतर उत्पादन की गारंटी देता है।


















