कॉर्पोरेट जगत में लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि सालों का अनुभव ही किसी कर्मचारी की सबसे बड़ी ताकत होती है। नए या फ्रेशर कर्मचारियों को अक्सर केवल सीखने और प्रशिक्षण लेने की स्थिति में ही देखा जाता है। हालांकि, हाल ही में सामने आई एक घटना ने इस पारंपरिक सोच को पूरी तरह से चुनौती दे दी है। नौकरी के अपने बिल्कुल पहले ही दिन एक नए बिजनेस स्कूल स्नातक ने अपनी बारीक नजर और तीक्ष्ण समझ की बदौलत कंपनी को एक बड़े वित्तीय संकट से बचा लिया। लिंक्डइन पर साझा किए गए इस वाकये में बताया गया है कि किस तरह नए कर्मचारी की एक छोटी सी पहल ने 30 लाख रुपये का सीधा नुकसान होने से रोक दिया।
पहले ही दिन सौंपी गई थी अहम जिम्मेदारी
वरिष्ठ पेशेवर अभिषेक अग्रवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन पर इस प्रेरक वाकये को साझा किया। उन्होंने एक प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूल से पास आउट हुए एक फ्रेशर को अपनी टीम में नियुक्त किया था। कार्यभार संभालने के पहले ही दिन अभिषेक ने उस नए कर्मचारी को कंपनी के सक्रिय क्लाइंट खातों की समीक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपी। उसी दौरान अभिषेक खुद एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़े क्लाइंट के लिए तैयार की जा रही रिपोर्ट को अंतिम रूप देने में व्यस्त थे। उन्होंने इस बेहद गोपनीय और जरूरी दस्तावेज को अपनी ओर से दो बार अच्छी तरह चेक किया, उस पर हस्ताक्षर किए और फिर ईमेल के जरिए क्लाइंट को भेज दिया। इस ईमेल की प्रति नए फ्रेशर कर्मचारी को भी जानकारी के लिए टैग की गई थी।
चौथे पन्ने पर पकड़ी गई बड़ी गणितीय चूक
रिपोर्ट भेजे जाने के कुछ ही समय बाद वह नया कर्मचारी थोड़ा झिझकते हुए अपने मैनेजर अभिषेक के पास पहुंचा। उसने बेहद विनम्रता के साथ मैनेजर से निवेदन किया कि वे रिपोर्ट के चौथे पन्ने पर दी गई कैलकुलेशन को एक बार फिर देख लें, क्योंकि वहां आंकड़ों में कुछ गड़बड़ी प्रतीत हो रही थी। शुरुआत में मैनेजर को पूरा भरोसा था कि चूंकि उन्होंने खुद दो बार जांच की है, इसलिए कोई गलती नहीं हो सकती। लेकिन नए कर्मचारी के विनम्र आग्रह पर जब उन्होंने आंकड़े दोबारा मिलाए तो वे हैरान रह गए। फ्रेशर की बात शत-प्रतिशत सही थी और रिपोर्ट के चौथे पन्ने पर वास्तव में एक बड़ी गणितीय चूक हुई थी।
30 लाख रुपये का नुकसान और कानूनी जोखिम टला
अगर यह गलती समय पर न पकड़ी जाती और क्लाइंट के पास बिना सुधार के रह जाती, तो कंपनी को लगभग 30 लाख रुपये का सीधा वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता। इसके अलावा, गलत आंकड़ों के कारण क्लाइंट के साथ कानूनी विवाद और मुकदमा होने का गंभीर खतरा भी मंडरा रहा था। गलती का अहसास होते ही मैनेजर ने बिना कोई समय गंवाए तुरंत सही की गई नई रिपोर्ट तैयार की और उसे दोबारा क्लाइंट को भेज दिया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी भूल के लिए क्लाइंट से ईमानदारी से माफी भी मांगी। क्लाइंट कंपनी के इस पारदर्शी और ईमानदार रवैये से इतना प्रभावित हुआ कि उसने न केवल व्यावसायिक संबंध बनाए रखे, बल्कि अपने कॉन्ट्रैक्ट की अवधि को भी आगे बढ़ा दिया।
पिछली इंटर्नशिप की कड़वी याद और मिला बड़ा सबक
जब मैनेजर ने नए कर्मचारी को उसकी इस सतर्कता और समय रहते गलती बताने के लिए धन्यवाद दिया, तो फ्रेशर ने अपने अतीत की एक दुखद कहानी साझा की। उसने बताया कि अपनी पिछली इंटर्नशिप के दौरान जब उसने एक वरिष्ठ अधिकारी की गलती की तरफ इशारा किया था, तो उसे सराहना मिलने के बजाय नौकरी से निकाल दिया गया था। इसी वजह से वह इस बार भी मैनेजर के पास अपनी बात लेकर आने में झिझक रहा था। यह सुनकर अभिषेक अग्रवाल ने उसका मनोबल बढ़ाया और स्पष्ट किया कि एक स्वस्थ कॉर्पोरेट माहौल में बेझिझक सवाल पूछने और साफ सोच रखने वाले कर्मचारियों की हमेशा कद्र की जानी चाहिए। यह वाकया दर्शाता है कि कार्यस्थल पर अनुभव से ज्यादा महत्वपूर्ण सही नजरिया और निडरता से बात रखने का माहौल होना है।



















