छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के सीतापुर इलाके में पली-बढ़ी आदिवासी समुदाय की बेटी अनुपा तिर्की की कहानी किसी भी युवा के लिए हौसले की मिसाल है। एक किसान परिवार में जन्मी अनुपा ने वर्ष 2015 में बास्केटबॉल के मैदान पर अपना पहला कदम रखा था। उस समय उन्हें इस खेल के नियमों और तकनीकों के बारे में कोई बुनियादी जानकारी भी नहीं थी। शून्य से शुरुआत करने के बाद उन्होंने लगातार अभ्यास और कड़ी मेहनत के दम पर न केवल अपनी खेल प्रतिभा को निखारा, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। आज वह खेल के साथ-साथ अपनी उच्च शिक्षा पूरी कर रही हैं, एक निजी स्कूल में पार्ट-टाइम नौकरी कर रही हैं और नई पीढ़ी के बच्चों को बास्केटबॉल की बारीकियां सिखाने में जुटी हैं।
राजनांदगांव से मिली खेल को सही दिशा
अनुपा के खेल जीवन में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब उन्हें एक समर्पित कोच का मार्गदर्शन मिला। कोच राजेश प्रकाश ने उनकी लगन को पहचाना और उन्हें बेहतर सुविधाओं वाले खेल केंद्र राजनांदगांव जाने का मौका दिया। राजनांदगांव में रहकर अनुपा ने बास्केटबॉल की आधुनिक तकनीकों, ड्रिबलिंग, पासिंग और कोर्ट पोजिशनिंग की गहन ट्रेनिंग हासिल की। शुरुआती स्तर से अभ्यास शुरू करने वाली अनुपा ने हर दिन मैदान पर पसीना बहाया और अपनी फिटनेस व खेल समझ को बेहतर बनाया। कोच के निरंतर सहयोग और सही मार्गदर्शन ने उन्हें एक साधारण शुरुआती खिलाड़ी से राज्य की मजबूत एथलीट में बदल दिया।
क्रोएशिया के अंतरराष्ट्रीय कोर्ट पर मिला बड़ा मंच
निरंतर अभ्यास और खेल के प्रति निष्ठा का सुखद परिणाम वर्ष 2017 में सामने आया, जब अनुपा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय दल के साथ खेलने का मौका मिला। उन्हें यूरोप के देश क्रोएशिया में आयोजित प्रतियोगिता में खेलने का अवसर प्राप्त हुआ। क्रोएशिया के कोर्ट पर खेलने का अनुभव उनके जीवन के सबसे यादगार पलों में से एक रहा। वहां का खेल माहौल, कोर्ट का स्तर और विदेशी खिलाड़ियों की तैयारी बिल्कुल अलग थी। दूसरे देशों के खिलाड़ियों की रणनीति और शारीरिक दक्षता को देखकर अनुपा ने नई खेल तकनीकें सीखीं। इस अंतरराष्ट्रीय अनुभव ने उनके आत्मविश्वास को बहुत मजबूती दी और यह साबित कर दिया कि दूरदराज के गांव की लड़की भी वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा कर सकती है।
किसान पिता ने हर कदम पर बढ़ाया बेटी का हौसला
अनुपा के पिता एक साधारण किसान हैं जो मुख्य रूप से धान की पारंपरिक खेती करते हैं। ग्रामीण अंचलों में अक्सर बेटियों के लिए खेलों की दुनिया में आगे बढ़ना आसान नहीं होता, जहां सामाजिक दबाव और सीमित संसाधन बड़ी रुकावट बनते हैं। इसके विपरीत, अनुपा के परिवार ने उनकी प्रतिभा पर पूरा भरोसा जताया। उनके माता-पिता ने किसी भी सामाजिक रूढ़ि की परवाह किए बिना बेटी के सपनों का पूरा समर्थन किया। उनके पिता ने हमेशा उन्हें मैदान में उतरने और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। परिवार के इसी मजबूत भावनात्मक और नैतिक संबल ने अनुपा को हर विपरीत परिस्थिति से जूझने की ताकत दी।
राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पांच से छह गोल्ड मेडल किए अपने नाम
घरेलू स्तर पर अनुपा का प्रदर्शन लगातार शानदार रहा है। उन्होंने देश की राजधानी दिल्ली और हरियाणा सहित विभिन्न राज्यों में आयोजित करीब पांच से छह राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। इन प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्पर्धाओं में खेलते हुए उन्होंने पांच से छह बार गोल्ड मेडल जीतकर अपने राज्य और क्षेत्र का नाम रोशन किया। राष्ट्रीय स्तर पर लगातार पदक जीतने से उनका खेल कौशल और निखरा। इन तमाम कामयाबियों ने खेल के मैदान में उनकी एक खास पहचान स्थापित की और उन्हें आगे की मुश्किल चुनौतियों से लड़ने की प्रेरणा दी।
बीपीएड की पढ़ाई और स्पोर्ट्स टीचर बनने का लक्ष्य
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने और ढेरों पदक जीतने के बावजूद अनुपा का वास्तविक जीवन संघर्ष अभी थमा नहीं है। वह वर्तमान में बीपीएड यानी बैचलर ऑफ फिजिकल एजुकेशन की पढ़ाई कर रही हैं। इसके साथ ही वह एक स्कूल में पार्ट-टाइम स्पोर्ट्स टीचर के तौर पर काम कर रही हैं, जिससे उन्हें बच्चों को प्रशिक्षित करने का व्यावहारिक अनुभव मिल रहा है। उनका अंतिम सपना अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद किसी विद्यालय में शारीरिक शिक्षा शिक्षक के तौर पर स्थायी सरकारी या निजी नौकरी पाना है। वह चाहती हैं कि एक स्थायी नौकरी के जरिए वह सुरक्षित भविष्य पाएं और ग्रामीण क्षेत्र के अन्य बच्चों को पेशेवर खिलाड़ी बनाने के लिए तैयार कर सकें।
खेल और पढ़ाई के बीच संतुलन साधना बड़ी चुनौती
अनुपा बताती हैं कि एक एथलीट के लिए गहन खेल प्रशिक्षण और अकादमिक पढ़ाई को एक साथ संभालना काफी कठिन होता है। शुरुआत में उन्होंने खेल को अपना करियर बनाने का कोई पूर्व-नियोजित सपना नहीं देखा था, लेकिन मैदान पर उतरने के बाद खेल की दुनिया ने उन्हें गहराई से आकर्षित किया। उन्होंने समझा कि दृढ़ संकल्प के जरिए किसी भी लक्ष्य को पाया जा सकता है। अपनी इस पूरी यात्रा में वह कोच राजेश प्रकाश के योगदान को बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं, जिन्होंने सीतापुर की एक साधारण लड़की को बड़े मंच तक पहुंचाने में आधारशिला रखी थी।



















