छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में मौसम के अचानक बदले मिजाज ने किसानों के अरमानों पर पानी फेर दिया है। बीते तीन से चार दिनों के दौरान इलाके में दिन-रात लगातार हुई मूसलाधार बारिश और भयंकर आंधी ने खेतों में खड़ी मक्के की फसल को बुरी तरह तबाह कर दिया। कुदरत की इस मार के चलते लहलहाते पौधे जमीन पर आ गिरे और उनमें लगे भुट्टे टूटकर बिखर गए, जिससे महीनों की कड़ी मेहनत और पूंजी एक झटके में डूब गई।
तैयार भुट्टों पर चली तेज हवाओं की मार
क्षेत्र के किसान सुरेंद्र टोप्पो की आपबीती इस प्राकृतिक मार की गंभीरता बयां करती है। उन्होंने लगभग 15 जून के आसपास अपनी तीन एकड़ जमीन में मक्के के बीज बोए थे। शुरुआत में मौसमी परिस्थितियां काफी मुफीद रहीं और खेत में फसल का विकास बेहद शानदार ढंग से आगे बढ़ा। पौधों में धीरे-धीरे फल आने लगे थे और मक्के के भुट्टे पूरी तरह विकसित होकर दूध भरने की अहम अवस्था तक पहुंच चुके थे। किसान अच्छी पैदावार और उससे मिलने वाले मुनाफे की उम्मीद लगाए बैठा था, लेकिन ठीक उसी वक्त मौसम ने करवट ले ली।
प्राकृतिक आपदा ने बिगाड़ा आर्थिक बजट
सुरेंद्र टोप्पो के अनुसार, तीन से चार दिनों तक बिना थमे चली तेज अंधड़ और बारिश ने खेत में ऐसा कहर बरपाया कि भारी वजन वाले मक्के के पौधे जमीन पर बिछ गए। पौधों में लगे अनगिनत भुट्टे टूटकर मिट्टी में मिल गए और पूरी तरह खराब हो गए। इस तबाही के बाद अब खेत में कुछ भी शेष नहीं बचा है, जिससे किसान को अपनी लगाई गई लागत तक निकालना नामुमकिन हो गया है। इस भारी बर्बादी के कारण अब उनके सामने आगामी कृषि सत्र की तैयारियों के लिए गंभीर वित्तीय संकट खड़ा हो गया है।
जैविक खाद से लेकर रासायनिक पोषण तक का खर्च डूबा
फसल की गुणवत्ता बेहतर बनाने के लिए सुरेंद्र टोप्पो ने अपनी खेती की शुरुआत से ही खास सावधानी बरती थी। उन्होंने जमीन तैयार करते समय बड़े पैमाने पर जैविक गोबर खाद का इस्तेमाल किया था। इसके उपरांत, फसल की बढ़वार के विभिन्न चरणों में आवश्यकतानुसार समय-समय पर रासायनिक खादों का छिड़काव और पोषण प्रबंधन भी सुनिश्चित किया गया था। इस पूरी कवायद में तीन एकड़ के रकबे पर उनका 50 हजार रुपये से अधिक का सीधा नकद खर्च आया था। उम्मीद थी कि जब भुट्टे पककर तैयार होंगे तो यह खर्च मुनाफे में बदलेगा, परंतु प्राकृतिक विपदा ने सारी मेहनत और निवेश को मलबे में बदल दिया।


















