छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में मानसून की फुहारों के बीच धान के खेतों में एक अनूठी और पुरानी रिवायत देखने को मिलती है. यहां के किसान बारिश के मौसम में खेतों की मेड़ पर पानी के तेज बहाव के बीच मछली पकड़ने के लिए एक विशेष पारंपरिक उपकरण का इस्तेमाल करते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में 'दांदर' कहा जाता है. पूरी तरह से सूखे बांस से तैयार की जाने वाली यह दांदर खेतों की मेड़ों पर ऐसे मुहाने पर बिठा दी जाती है जहां से पानी का निकास होता है. जब तेज बारिश का पानी ऊपर के खेतों से नीचे की ओर बहता है, तो पानी के साथ बहकर आने वाली मछलियां इस ढांचे में सीधी फंस जाती हैं. इस बेहद सादे और कारगर तरीके से ग्रामीण हर रोज आधा किलो से लेकर एक किलो तक ताजी मछलियां बिना किसी अतिरिक्त खर्च के हासिल कर लेते हैं.
कैसे बुनी जाती है गोल और लंबी दांदर
बरसात की शुरुआत होते ही बस्तर के गांव-देहातों में किसान अपने हाथों से दांदर तैयार करने के काम में जुट जाते हैं. पीढ़ियों से इस इलाके के बाशिंदे मछली के शिकार के लिए इसी देसी औजार पर भरोसा करते आए हैं. आकार में यह गोल और कुछ लंबाई लिए हुए एक जालीदार टोकरी जैसी संरचना होती है. इसकी बनावट में सबसे खास बात यह होती है कि इसके बारीक छिद्रों से होकर खेत का पानी तो बड़ी आसानी से पूरा का पूरा बाहर निकल जाता है, लेकिन अंदर दाखिल हुई मछलियां वापस नहीं लौट पातीं. बस्तर के बाशिंदे मछली पकड़ने के लिए बाजार में बिकने वाले नायलॉन के महंगे जालों अथवा प्लास्टिक के उपकरणों पर बिल्कुल निर्भर नहीं रहते, बल्कि अपने आसपास मौजूद प्राकृतिक संसाधनों से खुद ही अपनी जरूरत का सामान गढ़ते हैं.
सोनसाय ने साझा की दांदर बनाने की बारीकियां
दांदर तैयार करने में जुटे ग्रामीण सोनसाय ने इसकी बुनाई और लागत से जुड़े अनुभव साझा किए. सोनसाय के अनुसार, इस पूरे जाल को तैयार करने के लिए अच्छी तरह सूखे हुए बांस का इस्तेमाल किया जाता है. आर्थिक नजरिए से देखा जाए तो इसे बनाने में कोई बड़ा खर्च नहीं आता, क्योंकि बांस को पतले और छोटे टुकड़ों में काटकर बड़ी कुशलता से एक-दूसरे के साथ पिरोया जाता है. यदि रोजमर्रा के खेती-बाड़ी के कामों के बीच थोड़ा-थोड़ा फुर्सत का वक्त निकालकर इसे गढ़ा जाए, तो एक मुकम्मल दांदर तैयार करने में लगभग चार से पांच दिन का समय लग जाता है. सोनसाय का कहना है कि सूखी लकड़ी और मजबूत बांस की कमचियों से बनी एक दांदर इतनी टिकाऊ होती है कि वह करीब पांच साल तक बिना टूटे-फूटे लगातार काम करती रहती है.
बुजुर्गों से मिला परंपरागत हुनर और लगाने का तरीका
यह पारंपरिक शिल्प और खेत में इसे लगाने की कला कोई नई नहीं है, बल्कि सोनसाय ने इसे अपने पूर्वजों और परिवार के बड़े-बुजुर्गों को देखकर सीखा है. इस बांस के जाल का पूरा उपयोग केवल वर्षाकाल में ही किया जाता है, जब खेतों में पर्याप्त जलभराव रहता है. किसान इसे खेत के ऊपरी हिस्से या मेड़ के उस कटाव पर मजबूती से जमा देते हैं, जहां से पानी सीधे बहकर निकलता है. जैसे ही पानी की धारा एक खेत की सीमा लांघकर दूसरे निचले खेत में प्रवेश करती है, धार के साथ बहने वाली मछलियां दांदर के भीतर trapped हो जाती हैं और पानी स्वच्छंद होकर आगे निकल जाता है.






















