टेस्ट क्रिकेट की दुनिया में कई ऐसे ऐतिहासिक दौर आए हैं जब बल्लेबाजों का दबदबा इस कदर रहा कि विरोधी गेंदबाजों के लिए उन्हें रोकना नामुमकिन सा हो गया था। लाल गेंद के प्रारूप में किसी एक कैलेंडर वर्ष के भीतर रनों और शतकों का ऐसा अंबार खड़ा करना किसी भी खिलाड़ी के करियर का शिखर माना जाता है। इतिहास के अलग-अलग दशकों में महान बल्लेबाजों ने एक ही साल में कई तीन अंकों के स्कोर बनाकर नए मानक गढ़े हैं। इस सूची में पाकिस्तान के मोहम्मद यूसुफ सबसे आगे खड़े हैं, तो वहीं मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर, रिकी पोंटिंग और विवियन रिचर्ड्स जैसे दिग्गजों ने भी अपनी क्लास और निरंतरता से इतिहास के सुनहरे पन्नों पर अपना नाम अंकित किया है।
मोहम्मद यूसुफ का 2006 का अविश्वसनीय रिकॉर्ड और पोंटिंग की धाक
एक कैलेंडर वर्ष में सर्वाधिक टेस्ट शतक बनाने का विश्व कीर्तिमान पाकिस्तान के दिग्गज बल्लेबाज मोहम्मद यूसुफ के नाम है। साल 2006 में उन्होंने जो बल्लेबाजी की, उसने क्रिकेट जगत को स्तब्ध कर दिया था। उस पूरे साल यूसुफ ने 11 टेस्ट मैचों की 19 पारियों में कुल 9 शतक जड़ दिए। इस ऐतिहासिक सफर में उनके बल्ले से 99.33 के हैरतअंगेज औसत के साथ 1788 रन निकले। उस दौर में दुनिया का कोई भी गेंदबाजी आक्रमण उनके सामने टिक नहीं पा रहा था और उन्हें आउट करना सबसे जटिल चुनौती बन गया था।
दिलचस्प बात यह है कि उसी साल 2006 में ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान रिकी पोंटिंग भी गजब के फॉर्म में चल रहे थे। पोंटिंग ने 2006 में 10 मैचों की 18 पारियों में 7 शतक जमाए और 68.86 के औसत से 1333 रन अपने खाते में जोड़े। पोंटिंग की इस निरंतरता की झलक इससे पहले भी दिख चुकी थी, जब साल 2003 में उन्होंने 11 मैचों की 18 पारियों में 6 शतक ठोके थे और 1503 रन बनाए थे। एक ही बल्लेबाज द्वारा दो अलग-अलग वर्षों में छह या उससे ज्यादा शतक लगाना अपने आप में दुर्लभ उपलब्धि है।
विवियन रिचर्ड्स और अरविंदा डी सिल्वा का ऐतिहासिक जलवा
क्रिकेट इतिहास के सुनहरे पन्नों को पलटें तो वेस्टइंडीज के महान बल्लेबाज विवियन रिचर्ड्स का नाम चमकता दिखाई देता है। साल 1976 में रिचर्ड्स ने अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से गेंदबाजों में खौफ भर दिया था। उस वर्ष उन्होंने 11 टेस्ट मैचों की 19 पारियों में 7 शतक लगाए और 90.00 के जबरदस्त औसत से कुल 1710 रन बटोरे। बिना हेलमेट खेले जाने वाले उस दौर में उनका यह आक्रामक अंदाज क्रिकेट प्रेमियों के जेहन में हमेशा ताजा रहा है।
इसी तरह श्रीलंका के दिग्गज बल्लेबाज अरविंदा डी सिल्वा ने साल 1997 में शानदार बल्लेबाजी कौशल का प्रदर्शन किया था। उन्होंने 11 मैचों की 19 पारियों में मैदान पर उतरते हुए 7 शतक अपने नाम किए। इस दौरान डी सिल्वा ने 76.25 के औसत से कुल 1220 रन बनाए और श्रीलंकाई बल्लेबाजी क्रम की मजबूत रीढ़ बनकर उभरे।
सचिन तेंदुलकर की लंबी निरंतरता और बेजोड़ क्लास
भारतीय क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर ने भी अपने करियर के उत्तरार्ध में इस विशिष्ट सूची में अपनी मजबूत जगह बनाई। साल 2010 में तेंदुलकर ने परिपक्वता, धैर्य और तकनीक का बेमिसाल उदाहरण पेश किया था। उन्होंने उस कैलेंडर वर्ष में 14 टेस्ट मैचों की 23 पारियों में हिस्सा लिया और 7 शतक जड़कर कुल 1562 रन बनाए। इस दौरान मास्टर ब्लास्टर का औसत 78.10 रहा, जो यह साबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में दो दशक से अधिक समय बिताने के बाद भी उनकी रन बनाने की भूख और क्लास अद्वितीय थी।
गारफील्ड सोबर्स और डेनिस कॉम्पटन के पुराने कीर्तिमान
यदि टेस्ट क्रिकेट के पुराने दौर पर नजर डालें, तो वेस्टइंडीज के महान ऑलराउंडर गारफील्ड सोबर्स का प्रदर्शन सबसे अलग और जादुई नजर आता है। साल 1958 में सोबर्स ने केवल 8 मैचों की 13 पारियों में ही 6 शतक ठोक दिए थे। इस दौरान उन्होंने कुल 1299 रन बनाए और उनका बल्लेबाजी औसत 144.33 का रहा। किसी एक कैलेंडर वर्ष में छह या उससे अधिक शतक लगाने वाले बल्लेबाजों की पूरी सूची में 144.33 का यह औसत सबसे ज्यादा और विस्मयकारी है।
वहीं इंग्लैंड के डेनिस कॉम्पटन ने द्वितीय विश्व युद्ध के ठीक बाद साल 1947 में कमाल की बल्लेबाजी दिखाई थी। कॉम्पटन ने 1947 में 9 टेस्ट मैचों की 15 पारियों में 6 शतक लगाते हुए 1592 रन जुटाए थे। उस साल उनका औसत 82.78 रहा, जो उस दौर की मुश्किल पिचों के हिसाब से बेहद असाधारण माना जाता है।
मैथ्यू हेडन और तिलकरत्ने दिलशान का आक्रामक अंदाज
ऑस्ट्रेलिया के आक्रामक सलामी बल्लेबाज मैथ्यू हेडन ने साल 2002 में अपनी धमाकेदार बल्लेबाजी से विपक्षी गेंदबाजों की लाइन और लेंथ बिगाड़ दी थी। हेडन ने 2002 में 11 मैचों की 17 पारियों में बल्लेबाजी करते हुए 6 शतक ठोके और 72.50 के औसत से 1160 रन बटोरे। नई गेंद के खिलाफ क्रीज से बाहर निकलकर प्रहार करने की उनकी शैली ने उस दौर में टेस्ट क्रिकेट खेलने का अंदाज ही बदल दिया था।
श्रीलंका के विकेटकीपर बल्लेबाज तिलकरत्ने दिलशान ने भी साल 2009 में इसी तरह का आक्रामक अंदाज अपनाया। दिलशान ने उस कैलेंडर वर्ष में 11 टेस्ट मैचों की 18 पारियों में 6 शतक जड़े और 1097 रन अपने नाम किए। मध्यक्रम से ओपनिंग स्लॉट में आकर दिलशान द्वारा एक ही साल में छह टेस्ट शतक लगाना उनके करियर का सबसे स्वर्णिम अध्याय बन गया।



















