छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले से जुड़े एक पूर्व नक्सली दंपती की जिंदगी अब पूरी तरह बदल चुकी है. कभी घने जंगलों में हथियारों के साये में बरसों गुजारने वाले सरोज और उनकी पत्नी रश्मति अब खेती-किसानी और रोजगार के नए हुनर सीखकर सामान्य जीवन जी रहे हैं. दोनों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया और फिलहाल कोंडागांव के एक पुनर्वास केंद्र में नई जिंदगी की तैयारी में जुटे हैं.
इनाम की रकम और संगठन में भूमिका
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक सरोज और रश्मति दोनों पर मिलाकर एक समय 3 लाख रुपये का इनाम दर्ज था. बाद में सामने आए ब्योरे के अनुसार सरकार ने अकेले सरोज पर 8 लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा था, जबकि उनकी पत्नी रश्मति के सिर पर 5 लाख रुपये का इनाम था. सरोज साल 2008 में नक्सली संगठन में शामिल हुआ था और धीरे-धीरे तरक्की करते हुए वह कंपनी कमांडर के पद तक पहुंच गया. इस दौरान उसके पास एके-47 जैसे आधुनिक हथियार भी मौजूद थे.
संगठन में हुई मुलाकात, बाद में शादी
बीजापुर जिले की रहने वाली रश्मति साल 2015 में नक्सली संगठन से जुड़ी थीं. उन्होंने संगठन के जनताना सरकार के स्कूल में सिर्फ चौथी कक्षा तक पढ़ाई की थी, इसके बाद संगठन ने उन्हें 303 राइफल थमा दी. संगठन में काम के दौरान ही रश्मति की मुलाकात कंपनी कमांडर सरोज से हुई और दोनों के बीच प्यार हो गया. संगठन की सख्त बंदिशों के चलते दोनों खुलकर मिल नहीं पाते थे, इसलिए उन्होंने एक-दूसरे को प्रेम पत्र लिखकर अपनी भावनाएं जाहिर कीं. जब यह बात नक्सली नेतृत्व तक पहुंची तो संगठन ने ही दोनों की शादी करवा दी. शादी के फौरन बाद संगठन ने सरोज की जबरन नसबंदी करवा दी, ताकि परिवार की जिम्मेदारी उसे कभी संगठन के काम से दूर न कर सके.
हिंसा छोड़कर पुनर्वास योजना का सहारा
कई सालों तक जंगलों में रहकर नक्सली गतिविधियों में शामिल रहने के बाद सरोज और रश्मति ने हिंसा का रास्ता पूरी तरह छोड़ने का फैसला किया. दोनों ने आत्मसमर्पण कर सरकार की पुनर्वास योजना का लाभ उठाया, जो पूर्व नक्सलियों के लिए चलाई जाती है. फिलहाल दोनों पुनर्वास केंद्र में रहकर नई जिंदगी के लिए जरूरी प्रशिक्षण ले रहे हैं. दंपती का कहना है कि वे अब अपना खुशहाल परिवार बसाना चाहते हैं और सम्मान के साथ जीना चाहते हैं.
अब सीख रहे कमाई का नया हुनर
सरोज इन दिनों वाहन मैकेनिक बनने का प्रशिक्षण ले रहा है और साथ ही ट्रैक्टर चलाना भी सीख रहा है, ताकि आगे चलकर वह खेती और मशीनों से जुड़ा रोजगार कर सके. वहीं रश्मति सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण लेकर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं. दोनों की योजना है कि प्रशिक्षण पूरा होते ही वे अपने गांव लौट जाएं और वहीं खेती-किसानी शुरू करें. मेहनत के दम पर अपने परिवार का भविष्य संवारना ही अब दोनों की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है.




















