छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर स्थित कंपनी गार्डन परिसर में वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्थापित बापू की कुटिया इन दिनों प्रशासनिक उपेक्षा और खस्ताहाल व्यवस्थाओं के दौर से गुजर रही है। 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों के मानसिक सुकून, मनोरंजन और परस्पर संवाद के लिए बनाए गए इस केंद्र की इमारत में अब मूलभूत सुविधाओं का सर्वथा अभाव देखा जा रहा है। छत से पानी टपकने, टूटी हुई कुर्सियों, निष्क्रिय पंखों और सफाई के अभाव के कारण बुजुर्गों का यहां आना लगातार घटता जा रहा है। नगर निगम की ओर से मरम्मत कार्य न कराए जाने के चलते यहां आने वाले वृद्धजनों को छोटी-मोटी मरम्मत और ट्यूबलाइट जैसे बिजली के सामान अपनी जेब से पैसे खर्च करके सही कराने पड़ रहे हैं।
पुराने वैभव और वर्तमान बदहाली के बीच गहराता अंतर
बापू की कुटिया की शुरुआत के समय यह स्थान शहर के बुजुर्गों के लिए एक बेहद पसंदीदा ठिकाना हुआ करता था। सुबह और शाम के वक्त यहां बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक जुटते थे और अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से दूर सुकून के कुछ पल बिताते थे। परिसर में 15 से 20 सामान्य कुर्सियों के अलावा आराम फरमाने के लिए खास कुर्सियां रखी गई थीं। इसके अलावा टेलीविजन, दैनिक समाचार पत्र और कैरम जैसे खेलों की सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं। उस समय सैकड़ों बुजुर्ग यहां आकर एक-दूसरे से सुख-दुख बांटते थे।
हालांकि वर्तमान समय में स्थिति बिल्कुल उलट चुकी है। देखरेख के अभाव में सुविधाओं का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। टीवी गायब हो चुका है, समाचार पत्रों की आपूर्ति और मनोरंजन के साधन ठप पड़ चुके हैं। गंदगी और टूटी कुर्सियों के बीच अब रोजाना केवल 4 से 5 बुजुर्ग ही मुख्य रूप से कैरम खेलने के लिए यहां पहुंच पा रहे हैं।
संचालन का समय और कुटिया का मुख्य उद्देश्य
कंपनी गार्डन परिसर में निर्मित बापू की कुटिया की बाहरी दीवार पर एक पोस्टर भी लगाया गया है, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि यह स्थान 60 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए समर्पित है। इसका मुख्य उद्देश्य बुजुर्गों को ऐसा सुरक्षित और शांतिपूर्ण वातावरण प्रदान करना था, जहां वे अपने खाली समय में हमउम्र साथियों के साथ सामाजिक जुड़ाव बना सकें।
इस केंद्र के संचालन के लिए बाकायदा समय-सारणी निर्धारित की गई है। बुजुर्गों के आने के लिए सुबह 6:00 बजे से 8:30 बजे तक तथा शाम 5:00 बजे से 8:30 बजे तक का समय तय किया गया है। निर्धारित समय के बावजूद अंदर की अव्यवस्थाएं बुजुर्गों को यहां रुकने के बजाय लौटने पर मजबूर कर रही हैं।
जर्जर इमारत, जलभराव और सफाई का अभाव
कुटिया के भीतर की स्थिति दिन-ब-दिन दयनीय होती जा रही है। बारिश के मौसम में इमारत की सीलिंग से लगातार पानी टपकता है, जिसके कारण कमरे के भीतर पानी और कीचड़ जमा हो जाता है। फर्श और दीवारों पर गंदगी फैली रहती है तथा कई स्थानों पर लोगों द्वारा पान खाकर थूकने के निशान दिखाई देते हैं।
बैठने के लिए रखी गई अधिकांश कुर्सियां टूट चुकी हैं, जिससे बुजुर्गों को बैठने में असुविधा होती है। गर्मी से राहत दिलाने वाले पंखे या तो खराब हैं या बेहद धीमी गति से चलते हैं। मनोरंजन के लिए रखे गए अधिकांश सामान या तो टूट चुके हैं या गायब हो चुके हैं।
बुजुर्गों का दर्द और अपनी जेब से मरम्मत कराने की मजबूरी
स्थानीय बुजुर्गों ने इस बदहाली पर गहरा रोष और चिंता व्यक्त की है। कैरम खेलने पहुंचे प्रभात दुबे ने बताया कि कुटिया में चारों तरफ अव्यवस्था का माहौल है। उन्होंने कहा, "कुटिया की स्थिति बेहद खराब है और बल्ब या ट्यूबलाइट खराब होने पर हमें अपने पैसों से मरम्मत करानी पड़ती है।" उन्होंने बताया कि बिजली का कोई सामान खराब होने या परिसर में किसी जरूरी वस्तु की आवश्यकता पड़ने पर बुजुर्ग खुद आपस में पैसे जुटाकर व्यवस्था करते हैं।
एक अन्य वरिष्ठ नागरिक एसके शर्मा ने बापू की कुटिया को बुजुर्गों के सामाजिक जीवन के लिए बेहद अहम बताया। उन्होंने कहा, "बापू की कुटिया बुजुर्गों को आपस में जोड़ने वाला एक बेहतरीन स्थान है, जिसे बचाने के लिए सुविधाएं बहाल करना जरूरी है।" उन्होंने कहा कि पहले सुबह-शाम यहां बुजुर्गों का तांता लगा रहता था, लेकिन सुविधाओं के खत्म होने से अब इसकी रौनक पूरी तरह गायब हो चुकी है।
वहीं प्रदीप गुप्ता ने कुटिया के शुरुआती दिनों की याद ताजा करते हुए बताया, "शुरुआत में यहां अखबार, टीवी और आरामदायक कुर्सियों जैसी तमाम सुविधाएं थीं, जो अब पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं।" उन्होंने कहा कि पहले यहां आकर बुजुर्गों को मानसिक शांति मिलती थी, लेकिन अब टपकती छत, टूटी कुर्सियों और गंदगी के कारण बुजुर्गों ने यहां आना लगभग बंद कर दिया है।
नगर निगम प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की मांग
बापू की कुटिया की रौनक वापस लौटाने के लिए बिलासपुर के वरिष्ठ नागरिकों ने नगर निगम प्रशासन से गुहार लगाई है। बुजुर्गों ने मांग की है कि इमारत की सीलिंग की तत्काल वाटरप्रूफिंग और मरम्मत कराई जाए, ताकि बारिश में पानी टपकने की समस्या समाप्त हो सके। इसके साथ ही परिसर में नियमित साफ-सफाई सुनिश्चित करने, टूटी हुई कुर्सियों को हटाकर नई आरामदायक कुर्सियां लगाने तथा खराब पंखों व ट्यूबलाइटों को दुरुस्त करने की मांग की गई है।
बुजुर्गों का कहना है कि यदि बंद पड़ा टीवी दोबारा लगाया जाए, समाचार पत्र शुरू किए जाएं और कैरम समेत अन्य मनोरंजक खेलों के सामान उपलब्ध करा दिए जाएं, तो यह केंद्र एक बार फिर शहर के वरिष्ठ नागरिकों के लिए सबसे पसंदीदा और सुकून देने वाला ठिकाना बन सकता है।





















