छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर और लोक पर्वों में तीजा त्योहार का अपना एक खास और पवित्र स्थान है। इस पावन अवसर पर प्रदेश भर के घरों में पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू महकने लगती है। तीज पर्व पर बनाए जाने वाले तरह-तरह के पकवानों में खुरमी का विशेष स्थान है, जो अपनी खास बनावट और अद्भुत स्वाद के लिए पहचानी जाती है। गेहूं के आटे, गुड़, सूजी, तिल और शुद्ध देसी घी के मेल से तैयार होने वाली यह खुरमी बाहर से बेहद खस्ता एवं कुरकुरी होती है, जबकि अंदर से मिठास और सौंधेपन से भरपूर लगती है। बिलासपुर सहित राज्य के ग्रामीण और शहरी इलाकों में आज भी तीजा और अन्य बड़े पारिवारिक उत्सवों के दौरान इसे पारंपरिक तरीके से बनाने का रिवाज बड़ी संजीदगी के साथ निभाया जाता है। खुरमी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे बनाने में किसी दुर्लभ सामग्री की आवश्यकता नहीं होती और सही विधि से तैयार करने पर इसे कई हफ्तों तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
छत्तीसगढ़ी तीजा की मिठास और खुरमी की खासियत
तीजा का त्योहार छत्तीसगढ़ी समाज में महिलाओं के लिए अत्यंत भावनात्मक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। इस पर्व के दौरान विवाहित महिलाएं अपने मायके आती हैं और तीज व्रत रखकर परिवार के सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। मायके और ससुराल दोनों ही जगहों पर पारंपरिक पकवान तैयार करने का रिवाज सदियों से चला आ रहा है। इन पारंपरिक पकवानों की सूची में खुरमी हमेशा शीर्ष पर रहती है। इसे न केवल पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है, बल्कि रिश्तेदारों और मेहमानों को भी बड़े आदर के साथ परोसा जाता है। जब महिलाएं मिलकर खुरमी बनाती हैं, तो यह आयोजन केवल खाना पकाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आपसी प्रेम और सांस्कृतिक जुड़ाव को भी दर्शाता है।
आवश्यक सामग्री और सही माप
स्वादिष्ट और खस्ता खुरमी बनाने के लिए रसोई में आसानी से उपलब्ध होने वाली साधारण सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। मुख्य सामग्री के तौर पर गेहूं का आटा, सूजी, गुड़ या चीनी, तिल और घी की जरूरत पड़ती है। यदि आप खुरमी के स्वाद और सुगंध को और अधिक बढ़ाना चाहते हैं, तो इसमें बारीक कद्दूकस किया हुआ ताजा या सूखा नारियल, पीसी हुई हरी इलायची का पाउडर और थोड़ी सी सौंफ मिला सकते हैं। सौंफ और इलायची की मौजूदगी खुरमी को एक बेहतरीन खुशबू देती है, वहीं नारियल का बुरादा इसके हर निवाले में एक अलग तरह का सौंधापन घोल देता है। भले ही ये सामग्रियां बहुत बुनियादी हों, लेकिन सही अनुपात में इनके मिश्रण से खुरमी का स्वाद अत्यंत लाजवाब बनता है।
गुड़ का घोल और सख्त आटा तैयार करने का तरीका
खुरमी बनाने की प्रक्रिया की शुरुआत गुड़ का मीठा घोल तैयार करने से होती है। सबसे पहले एक बर्तन या पैन में गुड़ लें और उसमें आवश्यकतानुसार थोड़ा पानी मिलाकर गर्म करें। जब गुड़ पानी में पूरी तरह से घुल जाए, तो गैस बंद कर दें और इस घोल को कमरे के तापमान पर ठंडा होने के लिए रख दें। यदि आप गुड़ की जगह चीनी का इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो चीनी को भी इसी प्रकार पानी में घोलकर तैयार किया जा सकता है।
इसके बाद एक बड़े और चौड़े बर्तन में गेहूं का आटा, सूजी और तिल निकाल लें। इन सूखी सामग्रियों को आपस में अच्छी तरह मिला लें। अब इसमें लगभग एक चौथाई कप (¼ कप) पिघला हुआ घी डालें। यह घी आटे में मोयन का काम करता है, जो खुरमी को खस्ता बनाने का मुख्य आधार है। दोनों हाथों की हथेलियों से आटे और घी को तब तक अच्छी तरह मलें जब तक कि घी पूरे आटे में समान रूप से समाहित न हो जाए। सही मोयन की जांच करने के लिए थोड़े से आटे को अपनी मुट्ठी में दबाकर देखें। यदि आटा आसानी से एक बंधे हुए लड्डू का आकार ले लेता है और बिखरता नहीं है, तो समझें कि मोयन का माप बिल्कुल सटीक है।
मोयन सही होने के बाद, तैयार किए गए ठंडे गुड़ के घोल को थोड़ा-थोड़ा करके आटे में डालते जाएं और मिलाते रहें। ध्यान रहे कि आटा सख्त गूंथना है, इसे बिल्कुल भी नरम या गीला न होने दें। सख्त आटा ही खुरमी को करकरा और खस्ता बनाता है। जब आटा अच्छी तरह गूंथ जाए, तो इसे एक कपड़े से ढककर लगभग 10 मिनट के लिए रख दें। यह 10 मिनट का विश्राम आटे को सेट होने में मदद करता है और सूजी को नमी सोखने का समय देता है।
आकार देना और धीमी आंच पर सही तलने की विधि
10 मिनट बाद गूंथे हुए आटे को दोबारा थोड़ा मल लें और उसकी बड़ी-बड़ी लोइयां बना लें। इन लोइयों को चकले पर रखकर थोड़ा मोटा बेलें। खुरमी को पतली पूरी की तरह नहीं बेला जाता, बल्कि इसकी मोटाई थोड़ी अधिक रखी जाती है। इसके बाद एक तेज चाकू की मदद से इसे चौकोर, बर्फी के आकार में, गोल या अपनी पसंद के किसी भी डिजाइन में काट लें। छत्तीसगढ़ की पारंपरिक रसोई में खुरमी को हाथों से दबाकर अलग-अलग लोक डिजाइनों में भी रूप दिया जाता है।
अब एक कड़ाही में पर्याप्त मात्रा में तेल या घी डालकर गर्म करें। ध्यान रखें कि तलने के लिए तेल बहुत ज्यादा तेज गर्म नहीं होना चाहिए। यदि तेल बहुत गर्म होगा तो खुरमी ऊपर से तुरंत लाल हो जाएगी और अंदर से कच्ची रह जाएगी। इसलिए खुरमी के कटे हुए टुकड़ों को कड़ाही में डालें और धीमी से मध्यम आंच पर धीरे-धीरे पकने दें। खुरमी को दोनों तरफ से उलट-पुलट कर तब तक तलें जब तक कि उनका रंग सुंदर सुनहरा न हो जाए और वे कुरकुरी न दिखने लगें। धीमी आंच पर सब्र के साथ तलने से खुरमी भीतर तक बहुत अच्छी तरह पक जाती है और उसका खस्तापन लंबे समय तक बना रहता है। जब खुरमी पूरी तरह तल जाए, तो उसे तेल से निकालकर किसी जाली या बर्तन में रख लें।
भंडारण और अगली पीढ़ी तक परंपरा पहुँचाने की सीख
तली हुई खुरमी को तुरंत किसी डिब्बे में बंद न करें। इसे कड़ाही से निकालने के बाद पूरी तरह से ठंडा होने दें। जब खुरमी कमरे के तापमान पर आ जाए, तब इसे एक साफ और सूखे एयरटाइट डिब्बे में भरकर रख लें। सही तरीके से बंद डिब्बे में रखने पर यह खुरमी कई दिनों या हफ्तों तक बिल्कुल खस्ता, ताजा और स्वादिष्ट बनी रहती है। आप इसे चाय के साथ या शाम के नाश्ते के रूप में कभी भी खा सकते हैं।
तीजा केवल उपवास और पूजा तक सीमित रहने वाला त्योहार नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की समृद्ध और जीवंत खानपान संस्कृति का एक मजबूत स्तंभ है। खुरमी जैसे पारंपरिक मिष्ठान इस उत्सव की खुशियों को दोगुना कर देते हैं। आधुनिकता के इस दौर में जहां कई पारंपरिक पकवान और घरेलू रेसिपी धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं, वहीं तीजा जैसे लोक पर्व इन ऐतिहासिक स्वादों और पुरखों की परंपराओं को आने वाली नई पीढ़ी तक सहेजकर पहुंचाने का एक बेहद महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं।





















