छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित सिलफिली क्षेत्र में किसान बड़े पैमाने पर स्ट्रॉबेरी की व्यावसायिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञ राकेश राजवाड़े के अनुसार, इस नकदी फसल की रोपाई के लिए मौजूदा समय सबसे उपयुक्त माना जाता है। सितंबर का अंतिम सप्ताह बीतने और अक्टूबर की शुरुआत होने के साथ ही खेतों में काम शुरू करने की जरूरत होती है। यदि उत्पादक 1 अक्टूबर से 5 अक्टूबर के बीच पौधे लगा देते हैं, तो रोपाई के लगभग 45 दिनों के भीतर शुरुआती पैदावार आनी शुरू हो जाती है।
प्रति एकड़ पौधे, उपज और कमाई का गणित
एक एकड़ खेत में लगभग 5,000 स्ट्रॉबेरी के पौधे रोपे जा सकते हैं। सामान्य परिस्थितियों में प्रति पौधे से औसतन आधा किलो (500 ग्राम) फल मिल जाता है, जिससे कुल पैदावार लगभग 2,500 किलोग्राम तक पहुंच जाती है। बेहतर पोषण और अनुकूल मौसम मिलने पर एक पौधा 500 ग्राम से 750 ग्राम तक भी उत्पादन दे सकता है। बिक्री के लिहाज से शुरुआती सीजन में बाजार में इसके दाम काफी ऊंचे रहते हैं। यदि किसान को औसतन ₹200 प्रति किलो का भाव भी मिलता है, तो 2,500 किलोग्राम फल से करीब ₹5 लाख की सकल बिक्री हासिल की जा सकती है। हालांकि वास्तविक आमदनी बाजार के उतार-चढ़ाव, फल की गुणवत्ता और कुल उत्पादन पर निर्भर करती है।
लागत और शुद्ध मुनाफे का आकलन
स्ट्रॉबेरी की आधुनिक खेती में पौधे की खरीद, प्लास्टिक मल्चिंग, खाद, कीटनाशक और सिंचाई के प्रबंध पर खर्च आता है। राकेश राजवाड़े के आकलन के अनुसार, प्रति एकड़ कुल कृषि लागत लगभग ₹1 लाख से ₹1.5 लाख तक बैठती है। इन सभी शुरुआती और प्रबंधकीय खर्चों को निकालने के बाद भी किसान को एक सीजन में आकर्षक शुद्ध बचत मिलने की पूरी गुंजाइश रहती है।
खेत की तैयारी और मेड़ बनाने का तरीका
इस फसल के लिए जमीन तैयार करते समय मेड़ (बेड) बनाना और प्लास्टिक मल्चिंग बिछाना अनिवार्य तकनीक है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक पौधे से दूसरे पौधे की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए। वहीं दो समानांतर मेड़ों के बीच 90 से 120 सेंटीमीटर का फासला रखना सही रहता है, जिससे पौधों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती रहे तथा काम करने में सहूलियत हो।
खाद प्रबंधन और विंटर डाउन किस्म की उपयोगिता
फसल की गुणवत्ता मिट्टी के पोषण स्तर पर निर्भर करती है। खेत की आवश्यकता के अनुसार सड़ी गोबर की खाद, केंचुआ खाद (वर्मी कंपोस्ट), बोन मील और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व डाले जाने चाहिए। इसके साथ ही सामान्य रासायनिक संतुलन के लिए एनपीके उर्वरकों का संतुलित प्रबंधन किया जाता है। सरगुजा की स्थानीय जलवायु और ठंड को देखते हुए विंटर डाउन किस्म सबसे उपयुक्त और सफल साबित हुई है। सिलफिली इलाके में इसी किस्म की बदौलत किसान बड़े स्तर पर उत्पादन ले रहे हैं।
तुड़ाई का चक्र और बाजार प्रबंधन
अक्टूबर के पहले हफ्ते में रोपे गए पौधों में नवंबर के दूसरे पखवाड़े अथवा दिसंबर के शुरुआती सप्ताह तक फल पकने लगते हैं। अनुकूल मौसम में यह उत्पादन मार्च-अप्रैल तक लगातार जारी रहता है। पके फलों को एक दिन के अंतराल पर तोड़ना जरूरी होता है, क्योंकि फल नाजुक होते हैं। समय पर तुड़ाई और तुरंत नजदीकी मंडियों या व्यापारियों तक पहुंचाने का लॉजिस्टिक्स प्रबंध किसानों को पहले से ही तय कर लेना चाहिए।



















