छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र में लोक कला और सांस्कृतिक गायन की परंपरा को जीवित रखने की एक मिसाल देखने को मिलती है। यहाँ के यादव समाज ने अपने पारंपरिक गीत संगीत की अनूठी धरोहर को आज भी पूरी आत्मीयता से सहेजा हुआ है। इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में 60 साल के बुजुर्ग रामचंद्र यादव की महत्वपूर्ण भूमिका है। वे पिछले कई दशकों से बिना किसी लिखित पुस्तक या औपचारिक शिक्षा के केवल लोकगीतों को सुनकर कंठस्थ करने की पुरानी परिपाटी पर कायम हैं। अपने दादा और गाँव के वरिष्ठ लोगों से सीखी गई यह कला आज भी उनकी दिनचर्या और सामाजिक उत्सवों का अटूट हिस्सा बनी हुई है।
मौखिक परंपरा और बिना किताब के लोकगीत सीखने का सफर
रामचंद्र यादव के अनुसार लोकगीतों की यह विधा पूर्णतः मौखिक शिक्षण पर आधारित रही है। जब वे लगभग 15 वर्ष की आयु के थे, तभी से उन्होंने अपने गाँव के बुजुर्गों और अपने दादाजी को विभिन्न अवसरों पर गाते हुए ध्यान से सुनना शुरू कर दिया था। उस समय न तो कोई अभ्यास पुस्तिका थी और न ही कोई लिखित संग्रह। उन्होंने इन गीतों की लयात्मक धुन और शब्दों को सुनकर अपने मन में बिठा लिया और लगातार अभ्यास के जरिए इसमें निपुणता हासिल की। इस तरह वे बिना किसी किताब का सहारा लिए ही इस पारंपरिक विधा के कुशल गायक बन गए।
विभिन्न ऋतुओं और अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीत
सरगुजा की लोक संस्कृति में अलग-अलग अवसरों और समय के अनुसार गीतों की अपनी विशिष्ट शैलियाँ हैं। रामचंद्र यादव बिरहा, कजरी, चहका और लचका जैसी विविध पारंपरिक विधाओं के जानकार हैं। इनमें से बिरहा एक ऐसा लोकगीत है जिसे साल के किसी भी मौसम या महीने में गाया जा सकता है। यह गीत दैनिक जीवन की गतिविधियों से गहराई से जुड़ा होता है।
इसके विपरीत कजरी गीत का एक विशेष समय चक्र होता है। कजरी मुख्य रूप से सितंबर के महीने के दौरान और भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव से जुड़ी लोक परंपराओं के पावन अवसरों पर गाई जाती है। इसके अलावा चहका और लचका जैसी शैलियों का उपयोग भी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान माहौल को संगीतमय बनाने के लिए किया जाता है।
वैवाहिक समारोह और समधी मिलन की पुरानी परंपरा
पुराने दौर में शादी-विवाह के मौकों पर लोकगीतों का अपना एक अलग ही सामाजिक महत्व हुआ करता था। रामचंद्र यादव याद करते हैं कि जब विवाह समारोह के दौरान दोनों पक्षों के समधी आपस में मिलते थे, तब मनोरंजन के प्रमुख साधन के रूप में बिरहा गाने की खास परंपरा निभाई जाती थी। उस समय वर पक्ष और वधू पक्ष दोनों ओर के लोग एक-दूसरे से बिरहा सुनाने का आग्रह करते थे। गीतों की इस सुरीली जुगलबंदी से विवाह स्थल का पूरा वातावरण उल्लास और आत्मीयता से भर जाता था।
पशुचारण के दौरान मनोरंजन और संवाद का साधन
लोकगीतों का जुड़ाव केवल उत्सवों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह चरवाहों के दैनिक काम-काज का भी मुख्य सहारा था। गाँव के खेतों और जंगलों में गाय तथा भैंस चराते समय रामचंद्र यादव और उनके साथी चरवाहे नियमित रूप से बिरहा गाया करते थे। वे बताते हैं कि जब वे सुरीली आवाज में बिरहा गाते थे, तब आसपास चरने वाले मवेशी भी शांत होकर चरते रहते थे और इधर-उधर नहीं भटकते थे। उस जमाने में जब मनोरंजन के आधुनिक साधन उपलब्ध नहीं थे, तब ये पारंपरिक लोकगीत ही उनके लिए समय बिताने और आपस में जुड़ने का सबसे बड़ा जरिया बनते थे।
पुरखों की विरासत को सहेजने का अटूट संकल्प
उम्र के 60वें पड़ाव पर पहुँचने के बाद भी रामचंद्र यादव के मन में अपने समाज की इस समृद्ध लोक कला के प्रति वही पुराना उत्साह कायम है। उनका दृढ़ विश्वास है कि बिरहा और कजरी केवल गीत भर नहीं हैं, बल्कि यह उनके समाज और पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है। इसी सोच के साथ वे आज भी पूरी निष्ठा से इन गीतों को गाते हैं और अपनी आने वाली पीढ़ियों के सामने अपनी माटी की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए हैं।



















