जब हम दुनिया के बड़े देशों के शासन मॉडल को देखते हैं, तो आमतौर पर भारत या अमेरिका की तरह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों वाली व्यवस्था की तस्वीर सामने आती है। हालांकि, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और चौथे सबसे बड़े भौगोलिक क्षेत्रफल वाले देश चीन की प्रशासनिक संरचना बिल्कुल अलग है। चीन में भारत की तरह एक भी राज्य या प्रोविंस नहीं है जो स्वतंत्र संवैधानिक शक्तियों के साथ काम करता हो। इसके बजाय, पूरे देश का शासन एक केंद्रीय प्रणाली के तहत 'प्रांतीय स्तर की प्रशासनिक इकाइयों' (प्रोविंशियल लेवल एडमिनिस्ट्रेटिव डिवीजंस या PLADs) के माध्यम से चलाया जाता है।
34 इकाइयों में बंटा है चीन का सर्वोच्च प्रशासनिक ढांचा
चीन ने अपनी विशाल सीमा और विशाल आबादी को प्रबंधित करने के लिए अपने भूभाग को कुल 34 प्रांतीय स्तर की प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया है। यह व्यवस्था एक एकीकृत संरचना के रूप में काम करती है, जिसमें विभिन्न संवैधानिक और प्रशासनिक स्थिति वाली इकाइयों को एक ही श्रेणी के अंतर्गत रखा गया है। इन 34 सर्वोच्च प्रशासनिक इकाइयों का विवरण इस प्रकार है
- 23 प्रांत (Provinces): इसमें ताइवान भी शामिल है, जिस पर चीन अपना संप्रभु दावा पेश करता है।
- 5 स्वायत्त क्षेत्र (Autonomous Regions): ये विशेष जातीय अल्पसंख्यकों की बड़ी आबादी वाले क्षेत्र हैं।
- 4 केंद्र-नियंत्रित नगरपालिकाएं (Municipalities): ये देश के प्रमुख महानगर हैं जो सीधे केंद्र सरकार के अधीन काम करते हैं।
- 2 विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (Special Administrative Regions): हांगकांग और मकाऊ, जिन्हें एक अलग शासन मॉडल के तहत प्रबंधित किया जाता है।
23 प्रांत: चीन का औद्योगिक और आर्थिक केंद्र
चीन आधिकारिक तौर पर 23 प्रांतों को अपनी प्रशासनिक व्यवस्था का मुख्य हिस्सा मानता है। इनमें से प्रमुख प्रांतों में ग्वांगदोंग, झेजियांग, जिआंगसू, सिचुआन, हेनान, हुबेई, फुजियान और शानदोंग शामिल हैं। देश की अधिकांश आबादी इन्हीं प्रांतों में निवास करती है। साथ ही, चीन का विशाल विनिर्माण उद्योग, मुख्य व्यापारिक केंद्र और अंतरराष्ट्रीय निर्यात ढांचा इन्हीं इलाकों में केंद्रित है। हालांकि चीन इन 23 प्रांतों में ताइवान को भी गिनता है, लेकिन ताइवान पर स्व-शासित व्यवस्था है और बीजिंग का वहां सीधा प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है।
5 स्वायत्त क्षेत्र और उनका ऐतिहासिक सफर
चीन में जातीय अल्पसंख्यकों की बहुलता वाले इलाकों को प्रबंधित करने के लिए 5 स्वायत्त क्षेत्र बनाए गए हैं। इन क्षेत्रों को स्थानीय स्तर पर सीमित सांस्कृतिक और प्रशासनिक रियायतें दी गई हैं, लेकिन अंतिम निर्णय और प्रशासनिक नियंत्रण बीजिंग स्थित केंद्रीय सरकार और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के पास ही रहता है। इन पांचों क्षेत्रों का इतिहास और उनके गठन का क्रम इस प्रकार है
- इनर मंगोलिया: चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने चीनी गृहयुद्ध के दौरान 1 मई 1947 को इनर मंगोलिया क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित किया था। यह पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) की स्थापना (1949) से दो वर्ष पहले अस्तित्व में आया था और बाद में आधिकारिक स्वायत्त क्षेत्र बना।
- शिनजियांग: वर्ष 1949 में रिपब्लिक ऑफ चाइना (ROC) के अधिकारियों के आत्मसमर्पण के बाद यह क्षेत्र कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण में आया। शुरुआती दौर में इसे एक सामान्य प्रांत के रूप में रखा गया था, लेकिन 1 अक्टूबर 1955 को इसे शिनजियांग उइघुर स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा दे दिया गया।
- तिब्बत: वर्ष 1950 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने तिब्बत में प्रवेश किया। इसके बाद वर्ष 1951 में हुए 17-सूत्रीय समझौते के माध्यम से बीजिंग ने अपना प्रशासनिक नियंत्रण कायम किया। वर्ष 1959 के तिब्बती विद्रोह के बाद बीजिंग का शिकंजा और मजबूत हुआ और अंततः 1 सितंबर 1965 को तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) का औपचारिक गठन किया गया।
- गुआंग्शी: वर्ष 1949 में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के गठन के समय यह गुआंग्शी प्रांत के रूप में शामिल हुआ था। बाद में यहां रहने वाले झुआंग समुदाय की बड़ी आबादी को देखते हुए 15 मार्च 1958 को इसे गुआंग्शी झुआंग स्वायत्त क्षेत्र में बदल दिया गया।
- निंग्शिया: वर्ष 1949 में कम्युनिस्ट शासन के तहत यह निंग्शिया प्रांत था। यहां हुई मुस्लिम समुदाय की पर्याप्त संख्या को ध्यान में रखते हुए 25 अक्टूबर 1958 को इसे निंग्शिया हुई स्वायत्त क्षेत्र घोषित किया गया।
4 सीधे नियंत्रित शहर और 2 विशेष प्रशासनिक क्षेत्र
चीन के चार सबसे प्रमुख और बड़े शहरों को किसी भी प्रांत के क्षेत्राधिकार से बाहर रखा गया है। बीजिंग, शंघाई, तियानजिन और चोंगकिंग को सीधे केंद्रीय सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इन चारों महानगरों का प्रशासनिक दर्जा और अधिकार किसी पूरे प्रांत के बराबर माना जाता है।
इसके अलावा, हांगकांग और मकाऊ को विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (SAR) का दर्जा हासिल है। इन दोनों क्षेत्रों को 'एक देश, दो व्यवस्थाएं' (वन कंट्री, टू सिस्टम्स) के सिद्धांत के तहत शामिल किया गया था। इस व्यवस्था के तहत उन्हें अपनी अलग कानूनी, आर्थिक और न्यायिक प्रणालियां बनाए रखने की अनुमति दी गई थी, हालांकि हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों पर भी बीजिंग का केंद्रीय प्रभाव काफी मजबूत हुआ है।
भारत की संघीय व्यवस्था से चीन का मॉडल कितना अलग?
भारत और चीन के शासन मॉडल में सबसे बुनियादी अंतर उनकी संवैधानिक संरचना का है। भारत एक संघीय (फेडरल) ढांचे वाला देश है, जहां संविधान के तहत केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है। भारतीय राज्यों के पास अपनी निर्वाचित सरकारें और स्वतंत्र विधायी अधिकार होते हैं।
इसके विपरीत, चीन एक एकात्मक (यूनिटरी) शासन प्रणाली पर चलता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि देश की पूरी संवैधानिक और प्रशासनिक शक्ति केवल केंद्र सरकार और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पास केंद्रित है। चीन की स्थानीय या प्रांतीय इकाइयां अपनी शक्ति संविधान से स्वतंत्र रूप से प्राप्त नहीं करतीं, बल्कि वे केवल बीजिंग के निर्देशों और कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों को लागू करने के लिए उत्तरदायी होती हैं।



















