एशिया के दो सबसे प्रभावशाली राष्ट्रों, भारत और चीन के आपसी रिश्ते आने वाले समय में वैश्विक राजनीति और व्यापार की दिशा तय करने की क्षमता रखते हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक वाइल अव्वाद के अनुसार, वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में यह दुनिया इतनी बड़ी है कि वह इन दोनों दिग्गज देशों की आकांक्षाओं को एक साथ समायोजित कर सके। ऐसी स्थिति में टकराव या अनावश्यक होड़ के बजाय आपसी तालमेल और रणनीतिक साझेदारी को प्राथमिकता देना दोनों ही पक्षों के दीर्घकालिक हित में है। शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर होने वाला सीधा संवाद दोनों देशों के बीच वर्षों से चली आ रही अविश्वास की खाई को पाटने की दिशा में एक बेहद ठोस कदम साबित हो सकता है।
शीर्ष नेतृत्व की बातचीत और विश्वास बहाली के प्रयास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच प्रत्यक्ष बातचीत को संबंधों में ठहराव और नई स्थिरता लाने का अहम मोड़ माना जा रहा है। कूटनीतिक स्तर पर जब दो महाशक्तियों के शीर्ष प्रतिनिधि आमने-सामने बैठकर चर्चा करते हैं, तो उससे एक सकारात्मक राजनीतिक संकेत दोनों देशों के प्रशासनिक और कूटनीतिक ढांचे तक पहुंचता है। वाइल अव्वाद का कहना है कि दोनों नेताओं के बीच विकसित होने वाला व्यक्तिगत तालमेल भविष्य की कार्ययोजना तय करने में मुख्य भूमिका निभाता है। जब शीर्ष स्तर से स्पष्ट दिशा मिलती है, तो दोनों सरकारों के अधिकारी उन्हीं प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाते हुए द्विपक्षीय संबंधों को पुनर्जीवित करने के लिए जमीनी स्तर पर काम शुरू करते हैं।
सीमा विवाद का समाधान और आर्थिक प्रगति की अनिवार्य शर्त
भारत और चीन के बीच आर्थिक संबंधों को पूरी क्षमता तक ले जाने के लिए सीमा का शांतिपूर्ण वातावरण सबसे बुनियादी शर्त बना हुआ है। वाइल अव्वाद ने रेखांकित किया कि नई दिल्ली ने पेइचिंग के समक्ष यह बात पूरी दृढ़ता से स्पष्ट कर दी है कि सीमाई गतिरोध और तनाव को सुलझाए बिना व्यापार या निवेश के मोर्चे पर बड़ा विस्तार संभव नहीं है। यदि दोनों देश अपनी-अपनी आवश्यकताओं और परस्पर सम्मान को ध्यान में रखते हुए सीमा विवाद का सौहार्दपूर्ण हल निकाल लेते हैं, तो द्विपक्षीय व्यापार में कई गुना उछाल देखने को मिल सकता है। वास्तविक नियंत्रण रेखा और संबंधित विवादित बिंदुओं पर स्थायी समाधान निकलने के बाद ही दोनों राष्ट्र आर्थिक क्षेत्र में किसी बड़ी और निर्बाध साझेदारी की ओर बढ़ सकते हैं।
वैश्विक मंच पर तालमेल और बहुध्रुवीय व्यवस्था का निर्माण
राजनयिक विश्लेषक का यह भी मानना है कि दिल्ली घोषणापत्र में भारत की चिंताओं को जिस तरह से समर्थन मिला, वह दर्शाता है कि दोनों देश कई अहम विषयों पर एक साझा मंच तलाश रहे हैं और अपने-अपने दृष्टिकोण को करीब ला रहे हैं। विश्व राजनीति में एकध्रुवीय व्यवस्था का दौर अब समाप्त हो चुका है और दुनिया स्पष्ट रूप से बहुध्रुवीय ढांचे की दिशा में अग्रसर है। इस पृष्ठभूमि में आगामी वर्ष चीन में प्रस्तावित द्विपक्षीय व बहुपक्षीय बैठकें दक्षिण-दक्षिण सहयोग को और अधिक मजबूती प्रदान कर सकती हैं। विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एकजुट होकर प्रस्तुत करने के लिहाज से भी इन दोनों देशों का एक साथ आना विशेष महत्व रखता है।
भारत का अंतरराष्ट्रीय कद और क्षेत्रीय संतुलन
वाइल अव्वाद ने विश्लेषण करते हुए बताया कि भारत की वर्तमान रणनीतिक स्थिति वैश्विक पटल पर अत्यधिक सशक्त है। भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका, पश्चिमी देशों और तमाम एशियाई राष्ट्रों के साथ अपने संबंधों को बहुत परिपक्व और मजबूत बनाया है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत के रुख और उसकी आवाज को गंभीरता से लेता है। इस भू-राजनीतिक हकीकत को चीन का नेतृत्व भी भली-भांति समझता है। इसी कारण पेइचिंग अब दोनों देशों के बीच लंबित समस्याओं, विशेष रूप से सीमा से जुड़े जटिल मामलों के समाधान में पहले से अधिक व्यावहारिक और समझदारी भरा रुख अपनाता हुआ दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच शांतिपूर्ण संबंध न केवल एशिया के क्षेत्रीय संतुलन के लिए बल्कि संपूर्ण विश्व की स्थिरता के लिए भी अनिवार्य माने जा रहे हैं।



















