वैश्विक महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की खींचतान अब जमीन, समंदर और खुले आसमान की सीमाओं को पार कर अंतरिक्ष के शून्य में पहुंच चुकी है। दुनिया की दो सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक ताकतों, अमेरिका और चीन के बीच जारी प्रतिस्पर्धा ने अब पृथ्वी की कक्षा को युद्ध का नया केंद्र बना दिया है। अमेरिका ने इतिहास में पहली बार आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार कर लिया है कि उसने पृथ्वी की कक्षा के भीतर आक्रमण करने और रक्षा करने में सक्षम घातक प्रणालियां तैनात कर दी हैं। अमेरिकी रक्षा तंत्र के इस अभूतपूर्व कबूलनामे के तुरंत बाद बीजिंग ने बेहद तल्ख तेवर अपनाते हुए वॉशिंगटन पर अंतरिक्ष का सैन्यीकरण करने का आरोप लगाया है, जिससे दोनों मुल्कों के बीच रणनीतिक टकराव और गहरा गया है।
अमेरिकी वायुसेना का खुलासा और ऑन-ऑर्बिट हथियार
अमेरिका के मैरीलैंड में आयोजित एयर, स्पेस एंड साइबर कॉन्फ्रेंस के दौरान अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिक ने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को चौंकाते हुए एक बड़ा बयान दिया। ट्रॉय मिक ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि अमेरिकी सेना ने अपने सुरक्षा बलों के रणनीतिक उपयोग के लिए ऑन-ऑर्बिट स्पेस कंट्रोल वेपन्स बाकायदा तैनात कर दिए हैं। अमेरिकी सैन्य इतिहास में यह पहला अवसर है जब पेंटागन से जुड़े किसी शीर्ष अधिकारी ने ऑन-रिकॉर्ड यह स्वीकारा है कि अंतरिक्ष की कक्षा में उनके हथियार मौजूद हैं और संचालन के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इन प्रणालियों की वास्तविक मारक क्षमता, तकनीक और संचालन दायरे को पूरी तरह गुप्त रखा है। ट्रॉय मिक ने यह स्पष्ट करने से साफ इनकार कर दिया कि इस सैन्य तंत्र का परीक्षण किया जा चुका है या नहीं, यह किस तकनीकी आधार पर काम करता है और अंतरिक्ष में किन लक्ष्यों को नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखता है। उनका तर्क था कि इस गोपनीय प्रणाली के बारे में अत्यधिक विवरण सार्वजनिक करने से इसकी रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता यानी डिटरेंस कमजोर हो जाएगी। बाद में अमेरिकी स्पेस फोर्स ने स्थिति स्पष्ट करते हुए रेखांकित किया कि स्पेस कंट्रोल का सीधा अर्थ ऐसे आधुनिक सैन्य सिस्टम से है जो शत्रु देश के किसी भी सैटेलाइट को जाम कर सकता है, उसके उपकरणों को निष्क्रिय कर सकता है अथवा आवश्यकता पड़ने पर उसे पूरी तरह नष्ट भी कर सकता है।
रहस्यमयी हथियार की तकनीक और रणनीतिकारों की राय
अमेरिकी नेतृत्व के इस खुलासे के बाद अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषक इस बात का आकलन करने में जुट गए हैं कि वास्तव में अंतरिक्ष में किस प्रकार की तकनीक भेजी गई है। वैश्विक सुरक्षा पर नजर रखने वाली संस्था सिक्योर वर्ल्ड फाउंडेशन से जुड़ी विशेषज्ञ विक्टोरिया सैमसन का मानना है कि यह तैनाती संभवतः एक स्पेस-बेस्ड जैमर हो सकती है। सामान्यतः अमेरिका उन हथियारों के प्रयोग से परहेज करता है जो अंतरिक्ष में धमाका करके भारी मलबा फैलाते हैं, क्योंकि बिखरा हुआ मलबा खुद अमेरिकी उपग्रहों के सुरक्षित संचालन के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकता है। इसी सामरिक संतुलन को देखते हुए संभावना जताई जा रही है कि यह कोई लेजर या सिग्नल जाम करने वाला नॉन-काइनेटिक सैन्य उपकरण है, जो बिना मलबे का बवंडर बनाए शत्रु की संचार प्रणाली ध्वस्त कर देता है।
दूसरी ओर, थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के विशेषज्ञ क्लेटन स्वोप ने ट्रॉय मिक के इस बयान की रणनीति पर सवाल उठाए हैं। क्लेटन स्वोप का कहना है कि मिक की यह घोषणा बेहद उलझन भरी है। यदि कोई देश चीन या रूस जैसी प्रतिस्पर्धी शक्तियों के मन में मनोवैज्ञानिक भय उत्पन्न करना चाहता है, तो उसे अपने हथियार की विनाशकारी शक्ति का कुछ ठोस संकेत देना आवश्यक होता है। केवल यह कह देना कि हथियार तैनात है, विरोधी ताकतों में भय पैदा करने के बजाय उनके भीतर नई आशंकाओं और जवाबी तैयारियों को जन्म देता है।
डोनाल्ड ट्रंप का विजन और गोल्डन डोम परियोजना
अंतरिक्ष में इन शक्तिशाली हथियारों की उपस्थिति कोई तात्कालिक फैसला नहीं है, बल्कि यह डोनाल्ड ट्रंप की दीर्घकालिक रणनीतिक योजना का अभिन्न हिस्सा है। डोनाल्ड ट्रंप एक अभेद्य मिसाइल रक्षा कवच के निर्माण पर जोर दे रहे हैं, जिसे गोल्डन डोम नाम दिया गया है। इसी योजना के तहत ट्रॉय मिक ने खुलासा किया कि अमेरिका के पास अब ऐसे इंटरसेप्टर प्रणालियों का फ्लाइट रेडी हार्डवेयर उपलब्ध है, जो सीधे अंतरिक्ष में ही दुश्मन की मिसाइलों को ट्रैक करके उन्हें मार गिराने में पूरी तरह सक्षम हैं।
आधुनिक दौर के सैन्य अभियानों में उपग्रहों की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान हो चुकी है। जमीनी, समुद्री या हवाई अभियानों के सटीक नेविगेशन के लिए जीपीएस, मिसाइलों को लक्ष्य तक पहुंचाने वाली गाइडिंग प्रणाली, टोही निगरानी और सेना के आंतरिक संचार तंत्र सब कुछ अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे सैटेलाइट्स पर निर्भर करते हैं। यदि किसी युद्ध के दौरान किसी राष्ट्र के उपग्रहों को अंतरिक्ष में ही अंधा या बहरा कर दिया जाए, तो उसकी शक्तिशाली सेनाएं भी पंगु होकर रह जाएंगी। यही कारण है कि ट्रंप प्रशासन ने स्पेस फोर्स को पारंपरिक सीमाओं से परे जाकर आक्रामक और रक्षात्मक प्रणालियां तेजी से विकसित करने की पूरी छूट प्रदान की है।
बीजिंग की तीखी आपत्ति और रणनीतिक स्थिरता की मांग
अमेरिकी वायुसेना के इस आधिकारिक बयान के तुरंत बाद चीन ने कड़ा कूटनीतिक विरोध दर्ज कराया है। बीजिंग में संवाददाताओं से मुखातिब होते हुए चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि चीन निरंतर बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग का पक्षधर रहा है। गुओ जियाकुन ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि चीन अंतरिक्ष को हथियारों से पाटने और इस साझा क्षेत्र को युद्ध के मैदान में तब्दील करने के किसी भी प्रयास का पुरजोर विरोध करता है।
गुओ जियाकुन ने अमेरिका से अपील की कि वह अंतरिक्ष के भीतर अपनी सैन्य उपस्थिति का विस्तार तुरंत बंद करे और युद्ध स्तर पर की जा रही तैयारियों पर अंकुश लगाए। चीन का कहना है कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन और शांति बनाए रखने के लिए वॉशिंगटन को एक जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय सामरिक विश्लेषक चीन के इस रुख को एक सोची-समझी कूटनीतिक ढाल मानते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार चीन स्वयं बीते कई वर्षों से घातक एंटी-सैटेलाइट मिसाइलें, हाई-पावर लेजर गन और स्पेस जैमर्स विकसित करने में पूरी ताकत झोंक चुका है।
रूस और चीन की बढ़ती ताकत और 1967 की संधि
अंतरिक्ष में अपनी सैन्य उपस्थिति मजबूत करने वाला अमेरिका अकेला राष्ट्र नहीं है। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन के आकलन दर्शाते हैं कि रूस और चीन दोनों ने ही अपने काउंटरस्पेस हथियारों का एक व्यापक भंडार तैयार कर लिया है। वर्ष 2024 में अमेरिका ने यह दावा किया था कि रूस ने एक ऐसा सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित किया है जो अन्य उपग्रहों पर हमला करने में सक्षम है। इसके अतिरिक्त, 2022 में यूक्रेन पर सैन्य हमले के बाद से रूसी उपग्रहों द्वारा दर्जनों यूरोपीय उपग्रहों के सिग्नलों में व्यवधान डालने और सेंध लगाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
चीन भी अंतरिक्ष में अमेरिकी प्रभुत्व को सीधी चुनौती देने के लिए कई अत्याधुनिक तकनीकों पर दिन-रात काम कर रहा है। इनमें शत्रु के उपग्रहों को नष्ट करने में सक्षम ड्रोन्स, विशाल रोबोटिक आर्म्स से लैस सैटेलाइट्स और ऊर्जा केंद्रित करने वाले हाई-पावर लेजर्स शामिल हैं। रोबोटिक आर्म्स वाले चीनी उपग्रह कक्षा में मौजूद प्रतिद्वंद्वी सैटेलाइट्स को पकड़कर उनकी दिशा बदलने या उन्हें निष्क्रिय करने का सामर्थ्य रखते हैं। वॉशिंगटन द्वारा ऑन-ऑर्बिट हथियारों की पुष्टि असल में चीन और रूस द्वारा अंतरिक्ष में हासिल की जा रही इसी तकनीकी बढ़त का मुकाबला करने के लिए की गई है।
अंतरिक्ष में सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए 1967 में ऐतिहासिक आउटर स्पेस ट्रीटी लागू की गई थी। इस अंतरराष्ट्रीय संधि का मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष को जनसंहार और विनाश से बचाना था, जिसके तहत अंतरिक्ष में परमाणु हथियार या सामूहिक विनाश के साधन तैनात करने पर सख्त पाबंदी लगाई गई थी। हालांकि यह संधि पारंपरिक हथियारों, गैर-विनाशकारी लेजर प्रणालियों, सिग्नल जैमर्स या ऑन-ऑर्बिट रक्षात्मक इंटरसेप्टर्स पर पूरी तरह स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं देती। इसी कानूनी अस्पष्टता का लाभ उठाकर दुनिया की तीनों प्रमुख महाशक्तियां अंतरिक्ष के इस नए मोर्चे पर अपनी ताकत बढ़ाने में जुटी हुई हैं।



















