जमीन पर किसी भी आधुनिक सेना की कुल ताकत का मूल्यांकन केवल उसके बख्तरबंद टैंकों को गिनकर नहीं किया जा सकता। किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष में अग्रिम मोर्चे पर दुश्मन की रक्षात्मक पंक्तियों को तोड़ने, उनके बंकरों को नेस्तनाबूद करने और अपनी पैदल सेना तथा टैंक दस्तों के लिए सुरक्षित रास्ता तैयार करने का प्राथमिक जिम्मा तोपखाने का होता है। द्वितीय विश्व युद्ध के ऐतिहासिक मोर्चों पर सोवियत और अमेरिकी फौजों द्वारा बड़े पैमाने पर किए गए भीषण तोपखाने के हमलों ने यह साबित किया था कि लंबी दूरी से सटीक गोलाबारी करने वाले हथियार आक्रामक अभियानों में जीत की आधारशिला बनते हैं। अमेरिकी सेना के रणनीतिक इतिहास में भी तोपखाने को दुश्मन की किलेबंदी में सेंध लगाने और जमीनी हमलों को सीधा सहारा देने वाला सबसे घातक साधन दर्ज किया गया है। वर्तमान समय में आर्टिलरी को मुख्य रूप से तीन प्रमुख श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है, जिनमें खींची जाने वाली यानी टोव्ड तोपें, स्वचालित वाहन पर लगी सेल्फ-प्रोपेलड तोपें और एक साथ दर्जनों रॉकेट दागने वाले मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम शामिल हैं।
तोपखाने की तीन प्रमुख श्रेणियों में दोनों देशों की संरचनात्मक स्थिति
वर्ष 2026 के वैश्विक सैन्य सांख्यिकी आंकड़ों का बारीक विश्लेषण भारत और चीन के तोपखाने के ढांचे में एक बेहद बुनियादी और गहरा अंतर उजागर करता है। जहां भारतीय थलसेना का मुख्य जोर पारंपरिक टोव्ड आर्टिलरी के विशाल भंडार पर टिका हुआ है, वहीं चीन ने भारी निवेश करके स्वचालित सेल्फ-प्रोपेलड गन और रॉकेट प्रोजेक्टर्स के मामले में जबरदस्त बढ़त बना रखी है। दोनों देशों की सामरिक प्राथमिकताओं का यह फर्क उनकी सीमाओं के भूगोल और सैन्य सिद्धांतों के अनुरूप विकसित हुआ है।
यदि तीनों श्रेणियों के कुल स्टॉक को एक साथ जोड़कर केवल सांख्यिकीय दृष्टि से देखा जाए, तो चीन की कुल संख्यात्मक बढ़त साफ नजर आती है। भारत के पास 5,640 टोव्ड तोपें, 100 सेल्फ-प्रोपेलड तोपें और 300 मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम हैं, जिनका कुल जोड़ 6,040 बैठता है। इसके विपरीत, चीन के शस्त्रागार में 1,400 टोव्ड तोपें, 2,940 सेल्फ-प्रोपेलड तोपें और 2,770 मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम दर्ज हैं, जिनका कुल योग 7,110 तक पहुंचता है। इस तरह समग्र आंकड़ों में चीन के पास कुल मिलाकर 1,070 अधिक तोपखाना प्रणालियां मौजूद हैं, लेकिन इन आंकड़ों के भीतर प्रत्येक हथियार प्रणाली का सामरिक महत्व बेहद अलग है।
खींची जाने वाली टोव्ड तोपों में भारत की एकतरफा बढ़त
टोव्ड आर्टिलरी उन पारंपरिक तोपों को कहा जाता है, जिनके पास अपना कोई इन-बिल्ट इंजन नहीं होता और जिन्हें एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे तक ले जाने के लिए अलग से भारी ट्रकों, ट्रैक्टरों या विशेष सैन्य वाहनों से खींचना पड़ता है। इन तोपों को तैनात करने, पहियों को स्थिर करने और फायरिंग के लिए तैयार करने में विशेष जमीनी दल की जरूरत होती है। इस विशिष्ट श्रेणी में भारत का दबदबा निर्विवाद रूप से कायम है।
भारतीय सेना के पास कुल 5,640 टोव्ड तोपखाने प्रणालियां मौजूद हैं, जिसके दम पर भारत इस मामले में पूरी दुनिया में तीसरे स्थान पर काबिज है। इसकी तुलना में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के पास केवल 1,400 टोव्ड तोपें हैं और वैश्विक तालिका में उसका स्थान 9वां है। इसका सीधा अर्थ यह है कि संख्यात्मक रूप से भारत के पास चीन की तुलना में 4,240 अधिक टोव्ड तोपें हैं। सीधे अनुपात में तुलना करें तो भारत का टोव्ड तोपों का मौजूदा जखीरा चीन के मुकाबले लगभग 4 गुना बड़ा है।
पहाड़ी सीमाओं और मैदानी मोर्चों पर टोव्ड तोपों की सामरिक उपयोगिता
भारत के पास 5,640 जैसी विशाल संख्या में टोव्ड आर्टिलरी प्रणालियों की मौजूदगी के पीछे एक सोची-समझी सैन्य और भौगोलिक रणनीति काम करती है। भारतीय थलसेना को एक ही समय में दो पूरी तरह भिन्न भौगोलिक परिस्थितियों वाली सीमाओं की रक्षा करनी होती है। एक तरफ पश्चिमी सीमा के खुले रेगिस्तानी और मैदानी इलाके हैं, तो दूसरी तरफ उत्तरी और पूर्वी सीमा पर हिमालय की अत्यधिक दुर्गम और संकरी पर्वत श्रृंखलाएं हैं।
पहाड़ों के अत्यधिक ऊंचे इलाकों में भारी और चौड़े बख्तरबंद वाहनों की आवाजाही कई बार प्राकृतिक बाधाओं के कारण सीमित हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में टोव्ड गनों को आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग सामरिक फायरिंग पोजिशनों पर तैनात किया जा सकता है। इन तोपों की मदद से दुर्गम घाटी और अग्रिम चौकियों के बहुत बड़े भूभाग पर लगातार, लंबे समय तक और अत्यधिक सटीकता के साथ गोलाबारी करके इन्फैंट्री को सुरक्षात्मक आवरण प्रदान किया जाता है। इतनी विशाल संख्या में तोपों की उपलब्धता का सीधा फायदा यह होता है कि सेना लंबी खिंचने वाली लड़ाइयों में बिना किसी कमी के तोपखाने की सघन तैनाती बनाए रख सकती है।
सेल्फ-प्रोपेलड आर्टिलरी में चीन का भारी पलड़ा
जब चर्चा सेल्फ-प्रोपेलड यानी स्वचालित तोपों की आती है, तो सामरिक समीकरण पूरी तरह उलट जाते हैं। इस श्रेणी की तोपों को किसी बाहरी ट्रक से खींचने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि पूरी तोप प्रणाली एक मजबूत बख्तरबंद ट्रैक या पहियेदार वाहन के ऊपर ही एकीकृत रूप से स्थापित होती है। इसका सबसे बड़ा तकनीकी लाभ यह होता है कि यह युद्धक्षेत्र में टैंकों की रफ्तार से आगे बढ़ सकती है, तेजी से अपनी फायरिंग स्थिति बदलकर गोला दाग सकती है और दुश्मन के जवाबी हमले से पहले ही वहां से सुरक्षित निकल सकती है। इस प्रणाली की कार्यक्षमता का प्रदर्शन पोखरण के रेगिस्तानी इलाके में आयोजित 'वज्र घात' अभ्यास में के-9 वज्र तोप की घातक मारक क्षमता के जरिए देखा जा चुका है।
इस स्वचालित श्रेणी में चीन का संख्यात्मक पलड़ा बेहद भारी है। चीन के पास 2,940 सेल्फ-प्रोपेलड आर्टिलरी सिस्टम तैनात हैं और वह इस वर्ग में पूरी दुनिया में दूसरे पायदान पर स्थित है। इसके विपरीत, भारत के पास इस श्रेणी में वर्तमान में केवल 100 स्वचालित तोपें हैं, जिसके चलते वैश्विक रैंकिंग में भारत 35वें स्थान पर आता है। सीधे अंतर को देखें तो चीन के पास भारत से 2,840 अधिक स्वचालित प्रणालियां हैं। संख्या बल के आधार पर चीन का सेल्फ-प्रोपेलड तोपखाना भारत के स्टॉक से लगभग 29 गुना ज्यादा बड़ा है। यह भारी अंतर दोनों देशों के मशीनीकृत युद्धक ढांचे के बीच की खाई को साफ दर्शाता है।
मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम में दुनिया में शीर्ष पर चीन
तोपखाने की तीसरी और सबसे विध्वंसक श्रेणी मल्टीपल लॉन्च रॉकेट सिस्टम यानी एमएलआरएस की है, जिसे मोबाइल रॉकेट प्रोजेक्टर्स या रॉकेट आर्टिलरी के तौर पर भी पहचाना जाता है। इस आधुनिक हथियार प्रणाली की विशेषता यह है कि यह एक ही सचल लॉन्चर से पलक झपकत ही एक के बाद एक कई शक्तिशाली रॉकेटों की बौछार कर सकती है, जिससे बहुत बड़े क्षेत्रफल में मौजूद दुश्मन की छावनियों और बख्तरबंद काफिलों को मिनटों में तहस-नहस किया जा सकता है।
एमएलआरएस की इस विनाशकारी श्रेणी में चीन दुनिया भर में पहले स्थान पर बना हुआ है। आंकड़ों के अनुसार चीन के पास 2,770 सक्रिय रॉकेट लॉन्चर सिस्टम मौजूद हैं। इसके मुकाबले भारत के पास इस समय 300 एमएलआरएस सिस्टम हैं और भारत की वैश्विक रैंकिंग 16वीं है। इसका सीधा मतलब यह है कि चीन के पास भारत की तुलना में 2,470 अधिक रॉकेट लॉन्चर प्रणालियां हैं। अनुपात के हिसाब से देखा जाए तो चीन का रॉकेट तोपखाना भारत के मौजूदा स्टॉक से 9 गुना से भी अधिक बड़ा है।
शक्तियों का स्पष्ट विभाजन और सामरिक निष्कर्ष
दोनों सेनाओं के इन विस्तृत आंकड़ों का निचोड़ यह है कि दोनों पड़ोसी देशों ने अपनी सैन्य प्राथमिकताओं को अलग-अलग दिशाओं में विकसित किया है। भारत की सबसे मजबूत पकड़ और संख्यात्मक सर्वोच्चता टोव्ड तोपों के क्षेत्र में है, जहां 5,640 प्रणालियों के साथ भारतीय सेना दुनिया में तीसरे नंबर की महाशक्ति है। यह व्यवस्था हिमालयी सीमाओं पर स्थिर और टिकाऊ रक्षा कवच प्रदान करने के लिए बेहद मुफीद मानी जाती है।
दूसरी ओर, चीन की पूरी सामरिक ताकत तीव्र गतिशीलता, मशीनीकृत मारक क्षमता और बड़े इलाके को तबाह करने वाले रॉकेटों पर केंद्रित है। 2,940 सेल्फ-प्रोपेलड तोपों और 2,770 रॉकेट लॉन्चरों के दम पर चीन गतिशीलता और क्षेत्रफल में मार करने वाली दोनों ही श्रेणियों में दुनिया के शीर्ष देशों में शुमार है। इस प्रकार तोपखाने के मोर्चे पर एक तरफ जहां भारत के पास पारंपरिक गोलाबारी का विशाल पहाड़ है, वहीं दूसरी तरफ चीन ने उच्च गतिशीलता और आधुनिक रॉकेट प्रणालियों का एक विशालकाय ढांचा खड़ा कर रखा है।



















