जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के भूभाग को लेकर बीजिंग और इस्लामाबाद के बीच शुरू हुई नई कवायद पर भारत ने कड़ा कूटनीतिक प्रहार किया है। दोनों पड़ोसी देशों द्वारा संयुक्त सीमा आयोग को सक्रिय करने के फैसले को भारत ने सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि जिस जमीन पर पाकिस्तान अवैध रूप से काबिज है, उस पर किसी तीसरे पक्ष के साथ कोई भी बातचीत या समझौता पूरी तरह गैरकानूनी है। विदेश मंत्रालय ने इस पूरे घटनाक्रम पर सख्त रुख अपनाते हुए पाकिस्तान को अवैध रूप से कब्जाए गए सभी भारतीय इलाकों को तत्काल खाली करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष यह दोहराया गया है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न अंग रहे हैं और हमेशा रहेंगे।
संयुक्त सीमा आयोग के गठन को भारत ने किया पूरी तरह अमान्य
इस सप्ताह बीजिंग और इस्लामाबाद ने मिलकर चीन-पाकिस्तान संयुक्त सीमा आयोग की गतिविधियों को बहाल करने का एलान किया था। इस घोषणा के सामने आते ही भारतीय विदेश मंत्रालय ने तुरंत स्थिति स्पष्ट की। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक औपचारिक बयान जारी कर बताया कि इस संवेदनशील भूभाग को लेकर नई दिल्ली का दृष्टिकोण हमेशा से स्पष्ट, सुसंगत और अडिग रहा है। प्रवक्ता के अनुसार, भौगोलिक और ऐतिहासिक दृष्टि से पाकिस्तान और चीन के बीच कोई सीधी या साझा सीमा मौजूद ही नहीं है।
रणधीर जायसवाल ने जोर देकर कहा कि जिस क्षेत्र को लेकर दोनों देश सीमा आयोग बनाने और सीमांकन की प्रक्रिया चलाने का दावा कर रहे हैं, वह वास्तविक रूप से भारत का संप्रभु क्षेत्र है। पाकिस्तान ने भारतीय जमीन पर जबरन और अवैध नियंत्रण कर रखा है। जब किसी भूभाग पर किसी देश का कोई वैध अधिकार ही नहीं है, तो उसे किसी अन्य राष्ट्र के साथ मिलकर सीमा तय करने अथवा किसी तरह का अंतरराष्ट्रीय समझौता करने की कोई कानूनी मान्यता नहीं मिल सकती। भारत ने दोटूक शब्दों में कहा कि इस तथाकथित आयोग की कोई अंतरराष्ट्रीय या विधिक साख नहीं है और इसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता नहीं
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में देश की सीमाओं की रक्षा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता दोहराई। प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का एक-एक इंच भारत का अटूट हिस्सा है। यह ऐतिहासिक और संवैधानिक वास्तविकता अपरिवर्तनीय है, जिसे किसी भी द्विपक्षीय बातचीत, तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप या जबरन थोपे गए तंत्र से नहीं बदला जा सकता।
भारत ने स्पष्ट किया कि अवैध कब्जे वाले इन क्षेत्रों में यथास्थिति को बदलने या किसी विदेशी गतिविधि को वैधता प्रदान करने की हर कोशिश पूरी तरह निष्फल साबित होगी। रणनीतिक रूप से संवेदनशील इस इलाके में पाकिस्तान और चीन के बीच किसी भी प्रकार की प्रशासनिक, ढांचागत या कूटनीतिक मिलीभगत भारतीय संप्रभुता पर कोई कानूनी असर नहीं डाल सकती। भारत ऐसी सभी गतिविधियों का पुरजोर विरोध करता है, जिनका उद्देश्य अवैध अतिक्रमण को वैध ठहराना या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलत तथ्य पेश करना है।
1963 के अवैध समझौते का विवादित इतिहास
इस ताजा कूटनीतिक टकराव की जड़ें छह दशक पुराने इतिहास से जुड़ी हुई हैं। यह पूरा मामला पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के उत्तरी हिस्सों और लद्दाख से सटी सीमावर्ती पट्टी से संबंधित है। वर्ष 1963 में पाकिस्तान और चीन ने एक तथाकथित सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस अवैध समझौते के तहत पाकिस्तान ने भारत के अधिकार क्षेत्र में आने वाली हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन गैरकानूनी तरीके से चीन को सौंप दी थी।
भारत ने 1963 के इस अवैध समझौते को पहले दिन से ही सिरे से खारिज किया हुआ है। नई दिल्ली का प्राथमिक तर्क हमेशा से यह रहा है कि पाकिस्तान स्वयं उस भूभाग पर अनाधिकृत कब्जेदार था, इसलिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उसे दूसरे देश को जमीन हस्तांतरित करने या सीमा रेखा खींचने का कोई अधिकार हासिल नहीं था। यह समझौता अपनी उत्पत्ति के समय से ही शून्य और निष्प्रभावी रहा है। अब दशकों बाद उसी अमान्य समझौते के आधार पर एक संयुक्त सीमा आयोग को धरातल पर उतारने की कोशिश दोनों देशों की सोची-समझी साजिश का हिस्सा है, जिसे भारत ने कड़े शब्दों में दरकिनार कर दिया है।
आर्थिक गलियारे की सुरक्षा और जमीन हथियाने की रणनीति
कूटनीतिक और सुरक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि इस संयुक्त सीमा आयोग को खड़ा करने के पीछे दोनों देशों के गहरे रणनीतिक हित छिपे हुए हैं। चीन इस विवादित क्षेत्र से होकर अरबों डॉलर की लागत वाला चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपीईसी तैयार कर रहा है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से गुजरने वाली इन परियोजनाओं और विशाल चीनी वित्तीय निवेश को कानूनी आवरण देने के लिए बीजिंग सीमा विवाद को कागजों पर सुलझा हुआ दिखाना चाहता है।
दोनों देशों की योजना इस आयोग के माध्यम से इस पूरे इलाके पर अपने अवैध नियंत्रण को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की थी। लेकिन भारत के सख्त विरोध ने इस रणनीतिक पैंतरेबाजी को विफल कर दिया है। नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि जब तक भारतीय भूभाग पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा जारी है, तब तक वहां किया जाने वाला कोई भी निर्माण कार्य, वित्तीय निवेश या कथित सीमा समझौता कानूनन शून्य ही माना जाएगा।
इस्लामाबाद और बीजिंग दोनों को कड़ा कूटनीतिक संदेश
विदेश मंत्रालय के इस बेहद कड़े रुख से दोनों पड़ोसी राजधानियों को स्पष्ट संदेश पहुंचा दिया गया है। भारत की ओर से अवैध रूप से कब्जाए गए सभी इलाकों को तत्काल खाली करने की मांग उठाकर पाकिस्तान की आक्रामकता और अवैध कब्जे की वास्तविकता को वैश्विक मंच पर फिर उजागर किया गया है। भारत ने यह तय कर दिया है कि क्षेत्रीय सीमाओं के संबंध में किसी भी प्रकार की लीपापोती बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इसके समानांतर, बीजिंग को भी यह स्पष्ट कर दिया गया है कि भारत की संप्रभु भूमि पर पाकिस्तान के साथ मिलकर की जाने वाली कोई भी परियोजना या सीमा आयोग पूरी तरह अस्वीकार्य है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि अपनी क्षेत्रीय अखंडता, सीमाओं की सुरक्षा और राष्ट्रीय स्वाभिमान के साथ किसी भी स्तर पर कोई रियायत नहीं बरती जाएगी।



















