चीन के दक्षिणी छोर पर स्थित एक नया और बड़ा इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट इन दिनों वैश्विक स्तर पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस परियोजना के तहत पिंगलू नहर को अब जहाजों के मूवमेंट के लिए पूरी तरह से खोल दिया गया है। कुल 134.2 किलोमीटर लंबी यह कृत्रिम नहर दक्षिण-पश्चिमी चीन के अंदरूनी इलाकों को सीधे समुद्र तक पहुंचने का एक बिल्कुल नया और सुगम मार्ग प्रदान करती है। इस जलमार्ग के शुरू होने से न केवल क्षेत्रीय नौवहन को बढ़ावा मिला है बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों तक पहुंच भी काफी आसान हो गई है। पहाड़ों के बीच पानी के इस आधुनिक रास्ते की तुलना अक्सर मिस्र की प्रसिद्ध स्वेज नहर से की जाती है, क्योंकि दोनों ही परियोजनाएं व्यापारिक दूरियों को कम करने का काम करती हैं।
नहर का निर्माण और भौगोलिक स्थिति
इस मेगा प्रोजेक्ट की शुरुआत चीन के गुआंग्शी झुआंग स्वायत्त क्षेत्र में की गई थी, जहां निर्माण कार्य अगस्त 2022 में आरंभ हुआ था। चीन ने इस विशाल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट को 16 सितंबर 2026 को जहाजों के संचालन के लिए आधिकारिक तौर पर खोल दिया। तकनीकी रूप से यह 1949 के बाद देश का पहला ऐसा राष्ट्रीय स्तर पर नियोजित बड़ा रिवर टू सी प्रोजेक्ट है। यह नहर उत्तर में स्थित शिजियांग नदी प्रणाली को दक्षिण में बेइबू की खाड़ी से जोड़ती है। इस जलमार्ग को इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसमें लगभग 5 हजार टन वजन तक के बड़े जहाज आसानी से आवाजाही कर सकें। इस नए मार्ग के माध्यम से दक्षिण-पश्चिम चीन के माल को पारंपरिक समुद्री रास्तों की तुलना में लगभग 560 किलोमीटर कम दूरी तय करनी होगी।
पहाड़ों के बीच पानी का सफर और इंजीनियरिंग
इस जलमार्ग का निर्माण करना सामान्य नहर खोदने जैसा सीधा काम नहीं था क्योंकि इसके उत्तरी और दक्षिणी छोर के बीच पानी के प्राकृतिक स्तर में करीब 65 मीटर का भारी अंतर है। इस ऊंचाई की बाधा को पार करने और जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए रास्ते में तीन प्रमुख नेविगेशन हब बनाए गए हैं, जिन्हें मादाओ, किशी और छिंगनियान नाम दिया गया है। इन स्थानों पर अत्याधुनिक शिप लॉक स्थापित किए गए हैं, जो पानी की विशाल लिफ्ट की तरह काम करते हैं। जब कोई जहाज इन लॉक में प्रवेश करता है, तो पानी के स्तर को नियंत्रित करके उसे अगले चरण तक उठाया या घटाया जाता है। इस पूरे और जटिल निर्माण कार्य पर करीब 72.7 अरब युआन यानी लगभग 10.8 अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि खर्च की गई है।
व्यापारिक लाभ और लागत में कमी
इस विशाल जलमार्ग परियोजना के शुरू होने से चीन को भारी आर्थिक और रणनीतिक फायदे मिलने की उम्मीद है। देश के आंतरिक इलाकों विशेषकर युन्नान और गुइझोउ जैसे दक्षिण-पश्चिमी प्रांतों को समुद्री व्यापार तक सीधी और आसान पहुंच मिल गई है। अधिकारियों के मुताबिक इस नए मार्ग से लॉजिस्टिक्स लागत में लगभग 18 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक की बड़ी गिरावट आने का अनुमान लगाया गया है। इसके अलावा परिवहन खर्च में हर साल 5 अरब युआन से अधिक की बचत होगी। यह नहर चीन के व्यापक न्यू इंटरनैशनल लैंड सी ट्रेड कॉरिडोर का एक अहम हिस्सा है, जिसका मुख्य उद्देश्य देश के भीतर के क्षेत्रों को आसियान और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के साथ मजबूती से जोड़ना है।
पिंगलू और स्वेज नहर में अंतर
भले ही इस परियोजना की तुलना मिस्र की स्वेज नहर से की जा रही है, लेकिन दोनों की भौगोलिक स्थिति और कार्यप्रणाली में बुनियादी अंतर है। मिस्र में स्थित स्वेज नहर एक कृत्रिम समुद्र-स्तरीय जलमार्ग है जो करीब 193 किलोमीटर लंबी है और भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है, जिससे यूरोप और एशिया के बीच जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप के लंबे चक्कर से राहत मिलती है। इसके विपरीत पिंगलू नहर दो महासागरों को नहीं बल्कि चीन के अंदरूनी नदी नेटवर्क को सीधे समुद्र से जोड़ती है। यह गुआंग्शी क्षेत्र से निकलकर बेइबू खाड़ी के जरिए समंदर में मिल जाती है और इसका मुख्य उद्देश्य देश के भीतर के आर्थिक क्षेत्र को बंदरगाहों से जोड़ना है।
मानव निर्मित शॉर्टकट की समानता
इन दोनों जलमार्गों के बीच सबसे बड़ी समानता यह है कि दोनों ही इंसानों द्वारा प्रकृति के जलमार्गों के बीच बनाए गए रणनीतिक शॉर्टकट हैं, जिनका मकसद व्यापारिक समय और दूरी को न्यूनतम करना है। स्वेज ने दो बड़े समुद्रों के बीच का समुद्री फासला कम किया, जबकि पिंगलू ने देश के भीतर की नदियों को समंदर तक पहुंचाने का रास्ता आसान किया है। यही वजह है कि इसे चीन का एक अनूठा रिवर टू सी ट्रेड कॉरिडोर माना जा रहा है। इसे स्वेज नहर कहना मुख्य रूप से एक व्यापारिक भूमिका की तुलना है, न कि कोई तकनीकी या आधिकारिक समानता। दोनों की इंजीनियरिंग और संचालन प्रणालियां पूरी तरह अलग हैं, लेकिन व्यापार के लिए कृत्रिम जलीय रास्ते तैयार करने का बुनियादी विचार दोनों में एक जैसा है।



















