चीन हमेशा से ऐसी तकनीकों पर काम करता रहा है जो भविष्य के युद्धों की रूपरेखा तय करती हैं। उसने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में दुनिया को पहले ही हैरान कर दिया था और अब वह रोबोटिक्स के जरिए एक कदम और आगे निकल चुका है। इस बात के संकेत वर्ल्ड ह्यूमनॉइड रोबोट गेम्स के दौरान मिल चुके हैं, जहां टियांगगोंग अल्ट्रा नामक ह्यूमनॉइड रोबोट ने 100 मीटर की दौड़ महज 8.64 सेकंड में पूरी करने का दावा पेश किया था। इस प्रदर्शन ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया और अब चीन इससे भी काफी आगे की योजना पर काम कर रहा है।
सैन्य प्रशिक्षण में रोबोटों का इस्तेमाल
हालांकि इस तरह के रोबोटों की अजीब चाल-ढाल और कई बार उनके गिरने के वीडियो सोशल मीडिया पर अक्सर मजाक का पात्र बनते रहते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपी तकनीकी क्षमता को लेकर रक्षा विशेषज्ञ खासे चिंतित हैं। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के आधिकारिक अखबार ने शोधकर्ताओं से आग्रह किया है कि वे इन एडवांस रोबोटों को सिर्फ प्रयोगशालाओं तक सीमित रखने के बजाय सैन्य प्रशिक्षण में तेजी से शामिल करें। अखबार ने इन मशीनों को केवल एक साधन के रूप में नहीं बल्कि भविष्य के संभावित लड़ाकों के रूप में रेखांकित किया है, जिससे आने वाले समय में युद्ध के मैदान और अधिक खतरनाक रूप ले सकते हैं।
सेना के लिए क्यों उपयोगी हैं ह्यूमनॉइड रोबोट
यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि सेना महंगे और जटिल ह्यूमनॉइड रोबोटों पर दांव क्यों लगाना चाहेगी, जबकि पहिए या ट्रैक वाले ड्रोन कहीं ज्यादा सस्ते और मजबूत होते हैं। खुले मैदानों में ट्रैक वाले वाहन भारी वजन उठाने में सक्षम होते हैं और उन पर सुरक्षा कवच लगाना भी सरल होता है। इसके बावजूद, शहरों के भीतर और इमारतों के परिसरों में ह्यूमनॉइड रोबोट एक अलग बढ़त प्रदान करते हैं। इंसानों के लिए बसाई गई बस्तियों और ढांचों में ये मशीनें दरवाजे खोलने, सीढ़ियां चढ़ने, संकरे रास्तों से निकलने और वाहनों की ड्राइविंग सीट संभालने जैसे कार्य आसानी से कर सकती हैं।
बचाव कार्य से लेकर हमलों तक की क्षमता
इंसानों के अनुकूल बनाई गई हर उस जगह पर इन रोबोटों को उतारा जा सकता है जहां एक मानव पहुंच सकता है। इस तरह की मशीनें किसी खतरनाक इमारत के भीतर फंसे नागरिकों को बाहर निकालने, बम या जाल से भरे कमरों की पड़ताल करने और सैनिकों को सीधे खतरे की जद में आने से बचाने में मददगार साबित हो सकती हैं। यही तकनीक युद्ध के मैदान में दुश्मन पर धावा बोलने के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती है, जिसका मतलब है कि बचाव और आक्रमण दोनों मोर्चों पर तकनीकी क्षमताएं एक जैसी ही रहती हैं। अमेरिका की DARPA रोबोटिक्स चैलेंज ने भी अतीत में ऐसे रोबोटों के विकास को बढ़ावा दिया था जिनका मुख्य उद्देश्य परमाणु हादसों और अन्य भीषण आपदाओं के दौरान इंसानों की जान बचाना था।
सॉफ्टवेयर और सिमुलेशन की भूमिका
इस पूरी तकनीकी प्रगति में सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली बेहद अहम भूमिका निभाती है। रोबोटों को वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लिए उतारने से पहले उन्हें कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए लाखों अलग-अलग परिस्थितियों से गुजारा जाता है। रीइन्फोर्समेंट लर्निंग जैसी आधुनिक AI तकनीकों के माध्यम से ये रोबोट यह सीखते हैं कि ठोकर खाने पर खुद को कैसे संभालना है, कठिन जमीन पर कैसे कदम बढ़ाना है और बदलती परिस्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया कैसे देनी है। यदि इन प्रणालियों का उचित ढंग से नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह तकनीक केवल दुश्मनों के लिए ही नहीं बल्कि खुद अपनी सेना के लिए भी भारी जोखिम पैदा कर सकती है।


















