भारतीय क्रिकेट टीम और अफगानिस्तान के बीच 13 सितंबर से शुरू होने वाली द्विपक्षीय टी20 सीरीज को लेकर एक अनूठा प्रशासनिक और वित्तीय ढांचा सामने आया है। मुकाबला भले ही भारत की राजधानी दिल्ली स्थित अरुण जेटली स्टेडियम में आयोजित हो रहा हो, लेकिन मैदान के किराए से लेकर आयोजन के तमाम खर्चे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) नहीं देगा। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के नियमों का पालन करते हुए इस पूरी श्रृंखला का वित्तीय भार अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड (एसीबी) अपने ऊपर लेगा। क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह भले हैरान करने वाली बात हो, मगर वैश्विक खेल संचालन की नियमावली के तहत यह व्यवस्था पूरी तरह स्वाभाविक है।
आईसीसी के नियम और आधिकारिक मेजबानी का दायित्व
इस द्विपक्षीय सीरीज के वित्तीय मॉडल को समझने के लिए आईसीसी के मेजबानी से जुड़े नियमों को जानना जरूरी है। आधिकारिक दस्तावेजों में इस प्रतियोगिता का मुख्य मेजबान अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ही दर्ज है। भले ही सुरक्षा चिंताओं और ढांचागत बाधाओं के चलते अफगानिस्तान अपनी सरजमीं पर अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों का आयोजन करने में असमर्थ हो, लेकिन कागजी तौर पर मेजबान का दर्जा उसी के पास है। ऐसे में तटस्थ स्थल के रूप में भारत का इस्तेमाल करने पर भी आयोजन की समूची लागत मेजबान बोर्ड को ही चुकानी पड़ती है।
आईसीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार, मेजबान क्रिकेट बोर्ड को श्रृंखला से जुड़े सभी परिचालन और व्यवस्थागत खर्चों की भरपाई करनी होती है। इसमें स्थल का किराया, तकनीकी सुविधाएं और मैच संचालन से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जरूरत शामिल होती है। यही वजह है कि दिल्ली के अरुण जेटली स्टेडियम का इस्तेमाल करने के एवज में एसीबी को तय शुल्क जमा करना होगा।
मैच संचालन से लेकर सुरक्षा तक के विस्तृत खर्चे
अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड द्वारा उठाए जाने वाले वित्तीय दायित्वों का दायरा काफी व्यापक है। इस सीरीज के सफल संचालन के लिए एसीबी को जिन प्रमुख मदों में भुगतान करना होगा, उनमें मैदान और बुनियादी ढांचे का शुल्क सबसे अहम है। इसके अलावा, दोनों टीमों के खिलाड़ियों, कोचिंग स्टाफ और प्रबंधन सहयोगियों के लिए पांच सितारा होटलों में ठहरने की व्यवस्था का बिल भी एसीबी ही भरेगा।
खिलाड़ियों की चाक-चौबंद सुरक्षा, हवाई और स्थानीय आवाजाही का लॉजिस्टिक्स प्रबंधन भी मेजबान बोर्ड के खर्च का हिस्सा है। मैदान पर निष्पक्ष खेल संचालन के लिए तैनात अंपायरों, मैच रेफरी और आईसीसी अधिकारियों के मानदेय तथा भत्तों की जिम्मेदारी भी अफगानिस्तान बोर्ड के कंधों पर ही रहेगी। इस प्रकार, भारतीय धरती पर मैच होने के बावजूद वित्तीय रूप से भारतीय बोर्ड पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा।
बीसीसीआई की सहयोगी और मध्यस्थ भूमिका
इस पूरी व्यवस्था के दौरान बीसीसीआई किसी भी तरह का प्रत्यक्ष वित्तीय योगदान नहीं दे रहा है, लेकिन उसकी भूमिका एक मजबूत सुगमकर्ता के रूप में बनी हुई है। भारतीय बोर्ड अपने व्यापक प्रशासनिक अनुभवों और संसाधनों के जरिए अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड का मार्गदर्शन कर रहा है। वह राज्य स्तर के संगठनों, जैसे दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) और स्थानीय प्रशासनिक निकायों के साथ समन्वय स्थापित करने में एसीबी की सीधी मदद कर रहा है।
अतीत में भी भारतीय बोर्ड ने अफगानिस्तान में क्रिकेट के विकास के लिए बड़े भाई की भूमिका निभाई है। देहरादून और ग्रेटर नोएडा जैसे भारतीय मैदानों को अफगान टीम के घरेलू स्टेडियम के रूप में उपलब्ध कराने में बीसीसीआई ने अहम योगदान दिया था। वर्तमान सीरीज में भी बीसीसीआई यह सुनिश्चित कर रहा है कि युद्ध प्रभावित देश के इस क्रिकेट बोर्ड को किसी भी कानूनी, लॉजिस्टिकल या प्रशासनिक रुकावट का सामना न करना पड़े।
व्यावसायिक प्रतिबद्धता और आत्मीय संबंधों का संतुलन
भारत और अफगानिस्तान के बीच क्रिकेट के मैदान पर हमेशा ही जबरदस्त मुकाबला और भाईचारा देखने को मिलता रहा है। हालांकि, यह वर्तमान वित्तीय ढांचा दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय खेल प्रशासन में भावनात्मक संबंधों के साथ-साथ व्यावसायिक नियमों और वित्तीय पारदर्शिता का कितना महत्व है। नियम स्पष्ट करते हैं कि मेजबान का दर्जा जिसके पास होगा, खर्च की रसीद भी उसी के नाम कटेगी।
प्रशंसकों के लिए राहत की बात यह है कि इन प्रशासनिक प्रक्रियाओं का असर मैदान के रोमांच पर बिल्कुल नहीं पड़ेगा। 13 सितंबर से दिल्ली में शुरू होने वाली यह सीरीज भारतीय दर्शकों को अपनी ही सरजमीं पर उच्चस्तरीय और मैत्रीपूर्ण क्रिकेट प्रतियोगिता का आनंद लेने का पूरा अवसर देगी, जहां दोनों देश खेल भावना के साथ आमने-सामने होंगे।



















