क्रिकेट को हमेशा से अनिश्चितताओं से भरा खेल माना जाता है, जहाँ मैदान पर हर खिलाड़ी अपनी टीम की जीत सुनिश्चित करने के लिए अंतिम समय तक कड़ा संघर्ष करता है। लेकिन 30 अक्टूबर 1994 को उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित ग्रीन पार्क स्टेडियम में एक ऐसा वाकया सामने आया जिसने पूरी दुनिया के क्रिकेट प्रेमियों को स्तब्ध कर दिया। यह मुकाबला इसलिए भी खास और हैरान करने वाला था क्योंकि यह वह दौर था जब पिच पर खेल रहे थे सचिन तेंदुलकर और मोहम्मद अजहरुद्दीन जैसे दिग्गज, और इतिहास में पहली बार किसी मैच के दौरान बल्लेबाजों की मंशा पर सवाल उठे थे।
यह मुकाबला विल्स वर्ल्ड सीरीज का एक अहम मैच था जिसमें वेस्टइंडीज ने पहले बल्लेबाजी करते हुए भारतीय टीम के सामने जीत के लिए 258 रनों का लक्ष्य रखा था। भारतीय पारी के दौरान सचिन तेंदुलकर ने 34 रन बनाए और कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन ने 26 रनों का योगदान दिया। इन दोनों दिग्गज बल्लेबाजों के आउट होने के बावजूद भारतीय टीम बेहद मजबूत स्थिति में टिकी हुई थी और जीत की तरफ बढ़ रही थी। क्रीज पर मनोज प्रभाकर एक छोर को मजबूती से संभाले हुए थे और उनका साथ देने के लिए विकेटकीपर नयन मोंगिया मैदान पर उतरे थे।
उस समय समीकरण बेहद आसान नजर आ रहे थे क्योंकि भारत को जीत हासिल करने के लिए मात्र 54 गेंदों में 63 रनों की आवश्यकता थी और हाथ में 5 विकेट सुरक्षित बचे हुए थे। सामान्य परिस्थितियों में इस लक्ष्य को हासिल करना किसी भी वनडे मैच में बेहद आसान माना जाता है, लेकिन इसके बाद मैदान पर जो कुछ देखने को मिला उसने भारतीय क्रिकेट इतिहास पर एक ऐसा गहरा दाग छोड़ दिया जिसकी गूंज सालों बाद देश के बड़े मैच फिक्सिंग घोटालों में भी सुनाई दी।
वेस्टइंडीज के गेंदबाजों ने अपनी सामान्य लाइन और लेंथ से गेंदबाजी जारी रखी, लेकिन दूसरी तरफ भारतीय बल्लेबाजों ने अचानक रन बनाने की रफ्तार पर पूरी तरह ब्रेक लगा दिया। अंतिम 9 ओवरों यानी 54 गेंदों में जब चौकों और छक्कों की बरसात की उम्मीद की जा रही थी, तब नयन मोंगिया और मनोज प्रभाकर मिलकर केवल 16 रन ही बना सके। मोंगिया ने 21 गेंदों का सामना करते हुए महज 4 रन बनाए, जबकि प्रभाकर ने अपना शतक तो पूरा कर लिया और 154 गेंदों पर नाबाद 102 रन बनाए, लेकिन उन्होंने अपनी टीम को जीत की रेखा पार कराने के लिए कोई भी सकारात्मक प्रयास नहीं किया। परिणाम यह हुआ कि भारत यह मुकाबला 46 रनों से हार गया और स्टेडियम में बैठे दर्शक सन्न रह गए।
ड्रेसिंग रूम का गुस्सा और कड़ा एक्शन
इस बेहद धीमी और रक्षात्मक बल्लेबाजी से न केवल स्टेडियम में बैठे क्रिकेट फैंस नाराज थे, बल्कि खुद टीम के खिलाड़ी और प्रबंधन के लोग भी गुस्से में उबल रहे थे। तत्कालीन उप-कप्तान सचिन तेंदुलकर ने अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की थी और बताया था कि ड्रेसिंग रूम से बल्लेबाजों को धीमा खेलने का कोई भी संदेश नहीं दिया गया था। खिलाड़ी इस बात से इतने खफा थे कि उन्होंने काफी समय तक दोनों बल्लेबाजों से बातचीत तक बंद कर दी थी। मैच रेफरी रमन सुब्बा राव ने खेल भावना के विपरीत आचरण के लिए भारतीय टीम पर पेनल्टी लगाने की घोषणा की थी, जिसे बाद में तकनीकी कारणों से संशोधित किया गया। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने तुरंत सख्त रुख अपनाते हुए अनुशासनात्मक कदम उठाया और मनोज प्रभाकर तथा नयन मोंगिया को सीरीज के बचे हुए मुकाबलों के लिए टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
साल 2000 में जब क्रिकेट की दुनिया में मैच फिक्सिंग का काला सच बाहर आया, तब केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई और जस्टिस चंद्रचूड़ आयोग के सामने इस मैच को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए गए। नयन मोंगिया का हमेशा से यही तर्क रहा कि वे मैच में रन-रेट यानी नेट रन रेट के समीकरण को सुरक्षित रखने के लिए विकेट बचाने की रणनीति पर काम कर रहे थे। हालांकि, खेल प्रेमियों और क्रिकेट विश्लेषकों के लिए 54 गेंदों में सिर्फ 16 रन बनाने की यह थ्योरी कभी भी समझ नहीं आई। आज भी यह मुकाबला वनडे क्रिकेट के इतिहास के सबसे विवादास्पद और अनसुलझे अध्यायों में शुमार किया जाता है।



















