क्रिकेट जगत में एक मैच में दस विकेट हासिल करना किसी भी गेंदबाज के लिए सबसे बड़े सपनों में से एक होता है। लेकिन क्या स्थिति तब बनती है जब कोई खिलाड़ी इस अभूतपूर्व उपलब्धि को हासिल करने के तुरंत बाद ही राष्ट्रीय टीम से बाहर हो जाए और उसका अंतरराष्ट्रीय सफर सदा के लिए थम जाए। कुछ ऐसा ही हैरान करने वाला वाकया पूर्व भारतीय फिरकी गेंदबाज प्रज्ञान ओझा के साथ घटित हुआ था, जो अब चयन समिति में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
वानखेड़े स्टेडियम का वह यादगार मुकाबला
प्रज्ञान ओझा ने अपना अंतिम टेस्ट मैच साल 2013 के दौरान वेस्टइंडीज के विरुद्ध मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेला था। यह मुकाबला किसी आम मैच से कहीं बढ़कर था क्योंकि यह भारत के दिग्गज बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर का भी विदाई मैच था। इस ऐतिहासिक और भावनात्मक मुकाबले में प्रज्ञान ओझा ने अपनी घातक गेंदबाजी का मुजाहिरा करते हुए मैच की दोनों पारियों में पाँच-पाँच विकेट यानी कुल दस विकेट अपने नाम किए थे।
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के बाद भी संशय
शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्हें प्लेयर ऑफ द मैच के खिताब से नवाजा गया था, लेकिन उस समय इस गेंदबाज को अंदाजा नहीं था कि यह मुकाबला उनके करियर का आखिरी टेस्ट साबित होगा। इस मैच के बाद प्रज्ञान ओझा को दोबारा कभी भारत के लिए टेस्ट जर्सी पहनने का अवसर नहीं मिला। उनके अनुसार उन्हें आज तक इस बात का स्पष्ट कारण नहीं मिल पाया कि दस विकेट जैसी बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बावजूद उन्हें टीम से क्यों बाहर कर दिया गया।
शानदार थे टेस्ट क्रिकेट के आंकड़े
यदि प्रज्ञान ओझा के टेस्ट करियर के रिकॉर्ड पर नजर डाली जाए तो उनके आंकड़े बेहद प्रभावशाली नजर आते हैं। उन्होंने भारत के लिए केवल 24 टेस्ट मुकाबलों में ही 113 बल्लेबाजों को अपना शिकार बनाया था। इस लंबे फॉर्मेट में उनका सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी प्रदर्शन 89 रन खर्च करके 10 विकेट झटकना था। इसके अलावा उन्होंने अपने पूरे करियर के दौरान कुल 7 बार पारी में पाँच या उससे अधिक विकेट लेने का कारनामा किया था।
सीमित ओवरों के आंकड़े और चयन समिति की भूमिका
लाल गेंद के क्रिकेट के अलावा प्रज्ञान ओझा सीमित ओवरों में भी देश के लिए खेले। उन्होंने भारत के लिए 18 एकदिवसीय और 6 टी20 मुकाबलों में मैदान संभाला। एकदिवसीय मैचों में उनके नाम 21 विकेट दर्ज हैं, जबकि टी20 फॉर्मेट में उन्होंने 10 बल्लेबाजों को आउट किया। हालांकि सीमित ओवरों में उनका प्रदर्शन उतना प्रभावी नहीं रहा, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में उनका करियर समय से पहले समाप्त होना हमेशा चर्चा का विषय रहा है। अब प्रज्ञान ओझा खुद एक बड़ी जिम्मेदारी संभालते हुए भारतीय टीम के चीफ सिलेक्टर की भूमिका में आ चुके हैं।

















