क्रिकेट के खेल में 22 गज की पट्टी केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं होती, बल्कि यह बल्लेबाजों और गेंदबाजों के बीच होने वाले कड़े मुकाबले का सबसे मुख्य केंद्र होती है। दुनिया भर की पिचों का मिजाज अलग होता है और कई जगहों पर गेंद इतनी आसानी से बल्ले पर आती है कि रनों की बरसात हो जाती है, जबकि अन्य स्थानों पर गेंदबाजों को स्विंग और उछाल का पूरा फायदा मिलता है। न्यूजीलैंड में मैचों के आयोजन से पहले क्रेन के जरिए एक बड़े ब्लॉक को मैदान के बीच में फिट करते देखना एक बेहद दिलचस्प नजारा होता है। कीवी देश में क्रिकेट के अलग-अलग फॉर्मेट और मांगों के अनुसार पिचों को एक अलग नर्सरी या फैक्ट्रीनुमा जगह पर तैयार किया जाता है, जिन्हें बाद में स्टेडियम के मुख्य मैदान में लाकर स्थापित कर दिया जाता है।
मल्टी-स्पोर्ट्स संस्कृति और ड्रॉप-इन-पिच की जरूरत
न्यूजीलैंड में अधिकांश खेल मैदान केवल क्रिकेट के लिए समर्पित नहीं होते, बल्कि उनका उपयोग रग्बी जैसे अन्य लोकप्रिय खेलों के लिए भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। यही कारण है कि वहां ड्रॉप-इन-पिच का इस्तेमाल सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। पारंपरिक व्यवस्था के विपरीत, जहां पिच उसी मिट्टी पर उगाई और बनाई जाती है जहां मुकाबला होना है, ड्रॉप-इन-पिच को मैदान से किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर तैयार किया जाता है। जब यह पट्टी पूरी तरह से मैच खेलने के लिए तैयार हो जाती है, तब इसे भारी और विशेष उपकरणों की सहायता से उठाकर स्टेडियम के तय हिस्से में पहुंचा दिया जाता है। इस अनोखी प्रक्रिया के कारण ही इसे ड्रॉप-इन-पिच का नाम दिया गया है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि जिन स्टेडियमों में फुटबॉल या रग्बी जैसे दूसरे बड़े आयोजन भी होते हैं, वहां जरूरत के अनुसार इस क्रिकेट पट्टी को हटाया या लगाया जा सकता है, जिससे मैदान का उपयोग बहुउद्देशीय बना रहता है।
नर्सरी से मैदान तक का सफर और निर्माण प्रक्रिया
एक बेहतरीन ड्रॉप-इन-पिच को तैयार करने की पूरी प्रक्रिया में अत्यधिक मेहनत और उच्च स्तर की तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। सबसे पहले एक ठोस और मजबूत आधार का ढांचा तैयार किया जाता है, जिसके ऊपर चुनिंदा मिट्टी की परतें बेहद सावधानी से बिछाई जाती हैं। मिट्टी का सही चयन करना बेहद महत्वपूर्ण चरण होता है, क्योंकि इसी बात पर निर्भर करता है कि गेंद पिच पर टप्पा खाने के बाद कितनी ऊंचाई तक उछलेगी, बल्ले तक पहुंचने में कितनी रफ्तार लेगी और गेंदबाजों को कितना सीम मूवमेंट मिल पाएगा। इसके बाद मिट्टी को तय मानकों और वैज्ञानिक पैमानों के तहत अच्छी तरह से दबाया जाता है ताकि उसे पर्याप्त मजबूती मिल सके। इसके पश्चात उस पर खास किस्म की घास उगाई जाती है और नियमित रूप से पानी देने, उसकी कटाई करने, रोलिंग करने तथा नमी के स्तर को नियंत्रित रखने जैसी तमाम प्रक्रियाओं से उसे गुजारा जाता है। इस पूरे दौर में अनुभवी क्यूरेटर लगातार उसकी सेहत और स्थिति पर पैनी नजर बनाए रखते हैं।
स्टेडियम में फिटिंग और सतह का संतुलन
जब नर्सरी में पिच पूरी तरह से मैच खेलने के लिए तैयार हो जाती है, तब उसे एक विशेष ट्रे या मजबूत कंक्रीट-मेटल आधार समेत उठाया जाता है। क्रेन या अन्य भारी-भरकम मशीनों की मदद से इस भारी भरकम ब्लॉक को सावधानीपूर्वक स्टेडियम तक लाया जाता है और मैदान के बीचों-बीच पहले से तैयार गड्ढे में फिट कर दिया जाता है। इस चरण के बाद पिच और मुख्य मैदान के आस-पास की सतह के स्तर को बेहद बारीकी से बराबर किया जाता है, ताकि मुकाबला खेलते वक्त खिलाड़ियों को जमीन के असमान होने या ठोकर खाने जैसी किसी भी समस्या का सामना न करना पड़े। यह समझना बहुत जरूरी है कि ड्रॉप-इन-पिच का मतलब केवल मिट्टी की एक साधारण पट्टी को उठाकर इधर से उधर रख देना भर नहीं है। इसे इस उच्च स्तर पर विकसित करना पड़ता है कि इसकी मजबूती, उछाल और खेलने के अनुकूल गुणवत्ता पूरे मैच के दौरान बिना किसी रुकावट के बरकरार रहे।


















