भारतीय क्रिकेट में कुछ खिलाड़ियों की कहानी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहती, वह हौसले, संघर्ष और जिद की मिसाल बन जाती है। दुनिया के महानतम ऑफ स्पिन गेंदबाजों में शुमार हरभजन सिंह का नाम भी इसी फेहरिस्त में आता है। 'टर्बनेटर' और 'भज्जी' के नाम से मशहूर हरभजन सिंह ने अपनी घूमती गेंदों पर बड़े बड़े धुरंधर बल्लेबाजों को नचाया, लेकिन जिस मुकाम पर वे आज खड़े हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्हें टीम से बाहर होने, पिता को खोने और लगभग क्रिकेट छोड़कर विदेश में ट्रक चलाने के फैसले तक से गुजरना पड़ा।
शुरुआती दौर और अंतरराष्ट्रीय पदार्पण
3 जुलाई 1980 को पंजाब के जालंधर में जन्मे हरभजन सिंह को बचपन से ही गेंदबाजी का जुनून था। घरेलू क्रिकेट में अपनी फिरकी का कमाल दिखाने के बाद उन्हें जल्द ही राष्ट्रीय टीम में जगह मिल गई। मार्च 1998 में सिर्फ 17 साल की उम्र में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट मैच खेलकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा। शुरुआती मुकाबलों में उन्होंने अपनी काबिलियत की झलक जरूर दिखाई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का रास्ता इतना आसान नहीं था, जितना उन्होंने सोचा था।
टीम से बाहर, पिता का साया उठा और ट्रक ड्राइवर बनने की ठानी
करियर शुरू होने के करीब डेढ़ साल बाद ही खराब फॉर्म के चलते हरभजन को टीम से बाहर कर दिया गया। उस दौर में अनिल कुंबले भारतीय स्पिन आक्रमण के मुख्य आधार थे और जब कुंबले चोटिल हुए, तब भी चयनकर्ताओं ने भज्जी की बजाय दूसरे गेंदबाजों को आजमाया। इस उपेक्षा ने युवा हरभजन को अंदर तक तोड़ दिया। इसी बीच साल 2000 में उनके पिता का निधन हो गया और मां तथा पांच बहनों समेत पूरे परिवार की जिम्मेदारी अचानक उनके युवा कंधों पर आ गई। एक तरफ टीम से बाहर होने की टीस और दूसरी तरफ घर की बिगड़ती आर्थिक हालत, इन दोनों संकटों ने भज्जी को भीतर से इतना तोड़ दिया कि उन्होंने क्रिकेट को अलविदा कहने और परिवार का गुजारा चलाने के लिए अमेरिका जाकर ट्रक ड्राइवर बनने का पूरा मन बना लिया था।
बहनों की हिम्मत ने बदली तकदीर
इसी मुश्किल घड़ी में उनकी बहनों ने भज्जी के अंदर के क्रिकेटर को मरने नहीं दिया। बहनों ने उन्हें ढांढस बंधाया और दोबारा मैदान पर लौटने के लिए प्रेरित किया। बहनों के इसी अटूट भरोसे के बलबूते हरभजन ने रणजी ट्रॉफी में वापसी की और उस सीजन में शानदार गेंदबाजी करते हुए 28 विकेट अपने नाम किए। यह वापसी आगे चलकर उनके पूरे करियर की दिशा बदलने वाली साबित हुई।
गांगुली की जिद और ऐतिहासिक हैट्रिक
साल 2001 भारतीय क्रिकेट के लिए एक नया सवेरा लेकर आया। ऑस्ट्रेलिया की मजबूत टीम भारत के दौरे पर थी और अनिल कुंबले चोट के चलते बाहर थे। उस वक्त टीम के तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली ने हरभजन की प्रतिभा पर भरोसा जताते हुए उन्हें टीम में शामिल करने की जिद पकड़ ली। गांगुली का यह फैसला भारतीय क्रिकेट का रुख मोड़ने वाला साबित हुआ। उस ऐतिहासिक तीन मैचों की टेस्ट सीरीज में हरभजन सिंह ने कंगारू बल्लेबाजों को अपनी उंगलियों पर नचाते हुए कुल 32 विकेट चटकाए। इसी सीरीज के कोलकाता स्थित ईडन गार्डन्स टेस्ट में उन्होंने शानदार हैट्रिक ली, जो टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में किसी भी भारतीय गेंदबाज द्वारा ली गई पहली हैट्रिक थी। इस सीरीज ने न सिर्फ भज्जी का करियर दोबारा खड़ा किया, बल्कि उन्हें टीम इंडिया का सबसे भरोसेमंद हथियार भी बना दिया।
'दूसरा' का जादू और दो वर्ल्ड कप खिताब
हरभजन सिंह की सबसे बड़ी ताकत उनकी आक्रामकता, कभी हार न मानने वाला जज्बा और उनकी रहस्यमयी गेंद 'दूसरा' रही। ऑफ स्पिनर होते हुए भी गेंद को बाहर की ओर निकालने की इस कला ने दुनिया के दिग्गज बल्लेबाजों को भी उलझन में डाल दिया। भज्जी सिर्फ टेस्ट क्रिकेट के ही नहीं, बल्कि सीमित ओवरों की क्रिकेट के भी बादशाह थे। वे भारत की दो सबसे यादगार और ऐतिहासिक जीत, 2007 टी20 वर्ल्ड कप और 2011 वनडे वर्ल्ड कप जीतने वाली टीमों के अहम सदस्य रहे। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर निचले क्रम में उतरकर अपने बल्ले से तेज-तर्रार रन बनाना भी उनकी खासियत रही। टेस्ट क्रिकेट में 400 से ज्यादा विकेट चटकाकर वे यह ऐतिहासिक कारनामा करने वाले भारत के पहले ऑफ स्पिनर बने। ट्रक ड्राइवर बनने की कगार से टीम इंडिया के सबसे भरोसेमंद मैच विनर तक का यह सफर आज भी हर संघर्षरत खिलाड़ी के लिए एक सीख है।













