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जब बहनों ने नहीं मरने दिया क्रिकेटर, ट्रक ड्राइवर बनने से भारत के नंबर वन ऑफ स्पिनर तक हरभजन सिंह का सफरक्रिकेट
3 घंटे पहले· 5

जब बहनों ने नहीं मरने दिया क्रिकेटर, ट्रक ड्राइवर बनने से भारत के नंबर वन ऑफ स्पिनर तक हरभजन सिंह का सफर

पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी और टीम से बाहर होने के दर्द ने हरभजन सिंह को अमेरिका जाकर ट्रक ड्राइवर बनने की कगार पर ला दिया था, लेकिन बहनों के भरोसे और सौरव गांगुली की जिद ने उन्हें 400 से ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाला भारत का पहला ऑफ स्पिनर बना दिया।

संदीप यादवसंदीप यादवखेल संवाददाता 4 मिनट पढ़ें AI के लिए
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भारतीय क्रिकेट में कुछ खिलाड़ियों की कहानी सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहती, वह हौसले, संघर्ष और जिद की मिसाल बन जाती है। दुनिया के महानतम ऑफ स्पिन गेंदबाजों में शुमार हरभजन सिंह का नाम भी इसी फेहरिस्त में आता है। 'टर्बनेटर' और 'भज्जी' के नाम से मशहूर हरभजन सिंह ने अपनी घूमती गेंदों पर बड़े बड़े धुरंधर बल्लेबाजों को नचाया, लेकिन जिस मुकाम पर वे आज खड़े हैं, वहां तक पहुंचने के लिए उन्हें टीम से बाहर होने, पिता को खोने और लगभग क्रिकेट छोड़कर विदेश में ट्रक चलाने के फैसले तक से गुजरना पड़ा।

शुरुआती दौर और अंतरराष्ट्रीय पदार्पण

3 जुलाई 1980 को पंजाब के जालंधर में जन्मे हरभजन सिंह को बचपन से ही गेंदबाजी का जुनून था। घरेलू क्रिकेट में अपनी फिरकी का कमाल दिखाने के बाद उन्हें जल्द ही राष्ट्रीय टीम में जगह मिल गई। मार्च 1998 में सिर्फ 17 साल की उम्र में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट मैच खेलकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखा। शुरुआती मुकाबलों में उन्होंने अपनी काबिलियत की झलक जरूर दिखाई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का रास्ता इतना आसान नहीं था, जितना उन्होंने सोचा था।

टीम से बाहर, पिता का साया उठा और ट्रक ड्राइवर बनने की ठानी

करियर शुरू होने के करीब डेढ़ साल बाद ही खराब फॉर्म के चलते हरभजन को टीम से बाहर कर दिया गया। उस दौर में अनिल कुंबले भारतीय स्पिन आक्रमण के मुख्य आधार थे और जब कुंबले चोटिल हुए, तब भी चयनकर्ताओं ने भज्जी की बजाय दूसरे गेंदबाजों को आजमाया। इस उपेक्षा ने युवा हरभजन को अंदर तक तोड़ दिया। इसी बीच साल 2000 में उनके पिता का निधन हो गया और मां तथा पांच बहनों समेत पूरे परिवार की जिम्मेदारी अचानक उनके युवा कंधों पर आ गई। एक तरफ टीम से बाहर होने की टीस और दूसरी तरफ घर की बिगड़ती आर्थिक हालत, इन दोनों संकटों ने भज्जी को भीतर से इतना तोड़ दिया कि उन्होंने क्रिकेट को अलविदा कहने और परिवार का गुजारा चलाने के लिए अमेरिका जाकर ट्रक ड्राइवर बनने का पूरा मन बना लिया था।

बहनों की हिम्मत ने बदली तकदीर

इसी मुश्किल घड़ी में उनकी बहनों ने भज्जी के अंदर के क्रिकेटर को मरने नहीं दिया। बहनों ने उन्हें ढांढस बंधाया और दोबारा मैदान पर लौटने के लिए प्रेरित किया। बहनों के इसी अटूट भरोसे के बलबूते हरभजन ने रणजी ट्रॉफी में वापसी की और उस सीजन में शानदार गेंदबाजी करते हुए 28 विकेट अपने नाम किए। यह वापसी आगे चलकर उनके पूरे करियर की दिशा बदलने वाली साबित हुई।

गांगुली की जिद और ऐतिहासिक हैट्रिक

साल 2001 भारतीय क्रिकेट के लिए एक नया सवेरा लेकर आया। ऑस्ट्रेलिया की मजबूत टीम भारत के दौरे पर थी और अनिल कुंबले चोट के चलते बाहर थे। उस वक्त टीम के तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली ने हरभजन की प्रतिभा पर भरोसा जताते हुए उन्हें टीम में शामिल करने की जिद पकड़ ली। गांगुली का यह फैसला भारतीय क्रिकेट का रुख मोड़ने वाला साबित हुआ। उस ऐतिहासिक तीन मैचों की टेस्ट सीरीज में हरभजन सिंह ने कंगारू बल्लेबाजों को अपनी उंगलियों पर नचाते हुए कुल 32 विकेट चटकाए। इसी सीरीज के कोलकाता स्थित ईडन गार्डन्स टेस्ट में उन्होंने शानदार हैट्रिक ली, जो टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में किसी भी भारतीय गेंदबाज द्वारा ली गई पहली हैट्रिक थी। इस सीरीज ने न सिर्फ भज्जी का करियर दोबारा खड़ा किया, बल्कि उन्हें टीम इंडिया का सबसे भरोसेमंद हथियार भी बना दिया।

'दूसरा' का जादू और दो वर्ल्ड कप खिताब

हरभजन सिंह की सबसे बड़ी ताकत उनकी आक्रामकता, कभी हार न मानने वाला जज्बा और उनकी रहस्यमयी गेंद 'दूसरा' रही। ऑफ स्पिनर होते हुए भी गेंद को बाहर की ओर निकालने की इस कला ने दुनिया के दिग्गज बल्लेबाजों को भी उलझन में डाल दिया। भज्जी सिर्फ टेस्ट क्रिकेट के ही नहीं, बल्कि सीमित ओवरों की क्रिकेट के भी बादशाह थे। वे भारत की दो सबसे यादगार और ऐतिहासिक जीत, 2007 टी20 वर्ल्ड कप और 2011 वनडे वर्ल्ड कप जीतने वाली टीमों के अहम सदस्य रहे। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर निचले क्रम में उतरकर अपने बल्ले से तेज-तर्रार रन बनाना भी उनकी खासियत रही। टेस्ट क्रिकेट में 400 से ज्यादा विकेट चटकाकर वे यह ऐतिहासिक कारनामा करने वाले भारत के पहले ऑफ स्पिनर बने। ट्रक ड्राइवर बनने की कगार से टीम इंडिया के सबसे भरोसेमंद मैच विनर तक का यह सफर आज भी हर संघर्षरत खिलाड़ी के लिए एक सीख है।

प्रेरणा और सीख

हरभजन सिंह का सफर सिर्फ एक क्रिकेटर की कहानी नहीं, बल्कि मुश्किल हालात से लड़कर वापसी करने का सबक है।

  • परिवार का साथ सबसे बड़ी ताकत: जब हरभजन टूटने की कगार पर थे, तब उनकी बहनों के भरोसे ने उन्हें क्रिकेट छोड़ने से रोक लिया। मुश्किल वक्त में अपनों का साथ सबसे बड़ा सहारा बनता है।
  • असफलता के बाद फिर मेहनत: टीम से बाहर होने के बाद हरभजन ने रणजी ट्रॉफी में लौटकर 28 विकेट लिए। छोटे मंच पर दोबारा खुद को साबित करना बड़े मौके का रास्ता खोलता है।
  • सही समय पर मिला भरोसा बदल देता है करियर: सौरव गांगुली ने हरभजन की प्रतिभा पर भरोसा जताया और उन्हें मौका दिया। किसी एक इंसान का भरोसा पूरी दिशा बदल सकता है।
  • अपनी अलग पहचान बनाओ: 'दूसरा' जैसी अनोखी गेंद ने हरभजन को बाकी गेंदबाजों से अलग खड़ा किया। अपनी खास काबिलियत तराशना आपको भीड़ से अलग बनाता है।
  • हार मानने से पहले एक आखिरी कोशिश: ट्रक ड्राइवर बनने का फैसला ले चुकने के बावजूद हरभजन ने क्रिकेट को एक और मौका दिया, और यही फैसला उन्हें भारत के महानतम गेंदबाजों में शामिल कर गया।

सवाल-जवाब

हरभजन सिंह का जन्म कब और कहां हुआ था?
हरभजन सिंह का जन्म 3 जुलाई 1980 को पंजाब के जालंधर में हुआ था।
हरभजन सिंह ने अपना अंतरराष्ट्रीय करियर कब शुरू किया?
उन्होंने मार्च 1998 में सिर्फ 17 साल की उम्र में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट डेब्यू किया था।
हरभजन सिंह ट्रक ड्राइवर क्यों बनना चाहते थे?
साल 2000 में पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उन पर आ गई थी, और टीम से बाहर होने के दर्द के साथ आर्थिक तंगी के चलते उन्होंने अमेरिका जाकर ट्रक ड्राइवर बनने का मन बना लिया था।
हरभजन की वापसी में किसने अहम भूमिका निभाई?
उनकी बहनों ने ढांढस बंधाया और मैदान पर लौटने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद उन्होंने रणजी ट्रॉफी में 28 विकेट लिए।
2001 की सीरीज में हरभजन सिंह ने क्या कारनामा किया?
उन्होंने कोलकाता के ईडन गार्डन्स टेस्ट में हैट्रिक ली, जो टेस्ट क्रिकेट में किसी भारतीय गेंदबाज की पहली हैट्रिक थी, और पूरी सीरीज में कुल 32 विकेट लिए।
सौरव गांगुली की भूमिका हरभजन के करियर में कितनी अहम थी?
तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली ने चोटिल अनिल कुंबले की जगह हरभजन को टीम में शामिल करने की जिद की, जिसने उनका करियर बदल दिया।
हरभजन सिंह किन वर्ल्ड कप विजेता टीमों का हिस्सा रहे?
वे 2007 टी20 वर्ल्ड कप और 2011 वनडे वर्ल्ड कप जीतने वाली भारतीय टीमों के अहम सदस्य रहे।
हरभजन सिंह की खास गेंद कौन सी थी?
उनकी रहस्यमयी गेंद 'दूसरा' थी, जिससे वे ऑफ स्पिनर होते हुए भी गेंद को बाहर की ओर निकालते थे।
संदीप यादव
लेखक के बारे मेंसंदीप यादवखेल संवाददाता नई दिल्ली
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संदीप यादव एक खेल संवाददाता हैं जो दुनियाभर के लाइव मैच, टूर्नामेंट, खिलाड़ियों के अपडेट और खेल ख़बरों को कवर करते हैं। वे बड़े खेल आयोजनों की तेज़ और दिलचस्प कवरेज देते हैं।

संदीप यादव एक खेल संवाददाता हैं जो राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय खेलों — क्रिकेट, फ़ुटबॉल, टेनिस, एथलेटिक्स और बड़े खेल आयोजनों — की कवरेज में विशेषज्ञता रखते हैं। वे लाइव मैच, खिलाड़ियों के प्रदर्शन, टीम अपडेट, टूर्नामेंट, रैंकिंग और ब्रेकिंग खेल ख़बरों पर रिपोर्ट करते हैं। गति, सटीकता और विश्लेषण पर ज़ोर देते हुए संदीप वैश्विक खेल जगत के अहम पलों और घटनाक्रमों को दर्शाने वाली दिलचस्प खेल कहानियाँ देते हैं। उनकी रिपोर्टिंग में मैच रिपोर्ट, मैच से पहले और बाद का विश्लेषण, खिलाड़ी प्रोफ़ाइल और बड़ी चैम्पियनशिप व लीग की कवरेज शामिल है।

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