किसी भी अंतरराष्ट्रीय श्रृंखला के समापन के बाद टीम के प्रदर्शन की गहराई से समीक्षा करना बेहद जरूरी होता है। इस प्रक्रिया से सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के पहलुओं का पता चलता है। इसी दिशा में हाल ही में एक खास बातचीत के दौरान भारतीय क्रिकेट के तमाम पहलुओं पर खुलकर मंथन किया गया। चर्चा के दौरान कप्तानी के फैसलों, गेंदबाजों की रफ्तार और युवा बल्लेबाजों के प्रदर्शन पर विस्तार से बात रखी गई।
बातचीत की शुरुआत इस बात से हुई कि जब कोई मुकाबला ड्रॉ पर समाप्त होता है, तो अक्सर यह बहस छिड़ जाती है कि किस दल की जीत हुई और किसकी हार। हालांकि ऐसी चर्चाओं का कोई ठोस परिणाम नहीं निकलता क्योंकि मैच बराबरी पर छूटने के बाद दोनों टीमों के बीच अंक साझा कर लिए जाते हैं। फिर भी यह आंकलन जरूर किया जा सकता है कि मुकाबले में किस पक्ष की स्थिति अधिक मजबूत थी। इस संदर्भ में भारत का पलड़ा निश्चित रूप से भारी था और यह बात भारतीय खिलाड़ियों के साथ-साथ विपक्षी खेमे के खिलाड़ियों और प्रशंसकों को भी भली-भांति मालूम थी। मुकाबले पर पूरी पकड़ होने के बावजूद भारत की जीत दर्ज न कर पाना कई गंभीर सवालों को जन्म देता है और इसके पीछे के कारणों की समीक्षा करना जरूरी है।
मोहम्मद सिराज की गेंदबाजी और कम होती रफ्तार पर चिंता
चर्चा के दौरान तेज गेंदबाज मोहम्मद सिराज के प्रदर्शन और उनकी घटती गति का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। पिछले साल इंग्लैंड के दौरे पर उनकी औसत गेंदबाजी गति 135 से 136 किलोमीटर प्रति घंटा के आसपास थी, लेकिन इस ताज़ा श्रृंखला के दोनों टेस्ट मैचों में उनकी औसत गति गिरकर 125 किलोमीटर प्रति घंटा तक सिमट गई। पिच का मिजाज चाहे जो भी हो, एक पेशेवर तेज गेंदबाज के रूप में गति को बरकरार रखना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। पिच से मिलने वाली मदद या सतह के बर्ताव से इतर गेंदबाज को अपनी तेजी बनाए रखनी चाहिए। इसी श्रृंखला में प्रसिद्ध कृष्णा जैसे गेंदबाज ने भी गेंदबाजी की और उनकी औसत गति 137 किलोमीटर प्रति घंटा के करीब दर्ज की गई।
विश्लेषण के दौरान यह आशंका जताई गई कि संभवतः मोहम्मद सिराज इस पूरी श्रृंखला के दौरान किसी चोट या शारीरिक समस्या से जूझते हुए मैदान पर उतर रहे थे। अगर फिटनेस की कोई चिंता नहीं होती, तो सिराज इस तरह की गेंदबाजी कदापि नहीं करते। सालों से उन्हें एक ऐसे गेंदबाज के रूप में देखा गया है जो लंबे समय तक एक ही गति से लगातार गेंदबाजी करने के लिए जाने जाते हैं। वह पूरे जोश के साथ दौड़ते हैं और अपनी ऊर्जा बनाए रखते हैं। यदि वह किसी शारीरिक परेशानी के बावजूद खेल रहे थे, तो यह मुख्य कोच, कप्तान और गेंदबाजी कोच की जिम्मेदारी बनती है कि वे स्थिति का संज्ञान लें और खिलाड़ी से संवाद करें। पुराने समय के आक्रामक और तेज सिराज की कमी साफ महसूस की जा रही थी, जो अपनी पूरी रफ्तार से दौड़कर बल्लेबाजों को परेशान करते थे। पिच कैसी भी खेल रही हो, एक तेज गेंदबाज की रफ्तार में इस तरह की भारी गिरावट स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए।
कुलदीप यादव की उपयोगिता और सीमित स्पेल का असर
स्पिनर कुलदीप यादव की स्थिति पर बात करते हुए यह रेखांकित किया गया कि उन्हें प्लेइंग इलेवन में बहुत कम अवसर मिल रहे हैं। इसके अलावा जब-जब उन्हें मौका दिया जाता है, तब-तब उनके हाथ से गेंद उस लय और सटीकता के साथ नहीं निकल पा रही है जिसकी अपेक्षा की जाती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह एक बड़ा चैलेंज होता है कि खिलाड़ी को जब भी मौका मिले, वह तुरंत अपनी क्षमता साबित करे, चाहे वह गेंदबाज हो या बल्लेबाज। कुलदीप को पिच की सतह से वैसी गति और टर्न नहीं मिल पा रहा है जैसा उन्हें मिलना चाहिए था।
इस समस्या की गहराई तक जाने के लिए और अधिक विश्लेषण की आवश्यकता है। हालांकि एक अहम पहलू यह भी है कि टीम प्रबंधन की तरफ से उन्हें वह निरंतर समर्थन नहीं मिल रहा है जो एक खिलाड़ी के आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए जरूरी होता है। उनसे जो गेंदबाजी स्पेल कराए जा रहे हैं, वे बहुत छोटे होते हैं, जिसके कारण उनके मनोबल पर गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह मौजूदा समय में कुलदीप यादव के लिए एक बड़ी और गंभीर परेशानी का सबब बना हुआ है।
मैच के अहम पड़ाव और रणनीतिक चूक
मुकाबले के पांचवें दिन के खेल की समीक्षा करते हुए यह बताया गया कि एक ऐसा क्षण आया था जब मैच पूरी तरह भारत की पकड़ में था। उस समय चार विकेट और गिराए जा सकते थे, और रणनीति यह होनी चाहिए थी कि लंच तक या फिर लंच के एक घंटे के भीतर बेहद आक्रामक गेंदबाजी का प्रदर्शन किया जाए। लेकिन तीसरे और चौथे दिन के खेल के दौरान, विशेषकर दोपहर और शाम के सत्र में, जब श्रीलंकाई बल्लेबाज क्रीज पर डटे हुए थे, भारत की तरफ से रणनीति में कुछ चूक अवश्य हुई।
उस समय टीम को यह स्पष्ट संदेश देना चाहिए था कि हमारी स्थिति बेहद मजबूत है और हम इस मुकाबले को अपने नाम करने जा रहे हैं। विपक्षी बल्लेबाज चाहे जितनी भी कोशिश कर लें, वे इस स्थिति से बचकर नहीं निकल सकते। लेकिन मैदान पर ऐसा देखने को नहीं मिला क्योंकि अधिकांश फील्डर्स को कैचिंग पोजीशन से हटा दिया गया था। उस वक्त केवल एक स्लिप और एक गली को आमने-सामने रखा गया था और इसके अलावा कोई भी क्लोज़-इन फील्डर तैनात नहीं किया गया था। इस रणनीतिक ढिलाई का पूरा फायदा श्रीलंका के दोनों बल्लेबाजों ने उठाया और अपनी टीम को संकट से बाहर निकाल लिया।
श्रीलंकाई टीम के सकारात्मक पहलू और पिच का मिजाज
इस पूरी प्रक्रिया में श्रीलंका के युवा बल्लेबाजों का प्रदर्शन उनके लिए बेहद उत्साहजनक रहा और इस मुकाबले से उनके पाले में भारत की तुलना में कहीं अधिक सकारात्मक बातें गईं। हालांकि अगर पूरी श्रृंखला की बात की जाए तो भारत ने एक-शून्य की बढ़त के साथ श्रृंखला अपने नाम कर ली है, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन यदि केवल इस विशेष टेस्ट मैच का विश्लेषण किया जाए, तो श्रीलंका के लिए इसके टेक-अवे ज्यादा मजबूत और प्रभावशाली रहे।
मैच से पहले यह उम्मीद जताई जा रही थी कि पिच पर काफी टर्न देखने को मिलेगा, मगर असलियत इसके विपरीत रही। रुक-रुक कर होती रही बारिश के कारण पिच को बार-बार ढकना पड़ा, जिसकी वजह से उसे पर्याप्त धूप नहीं मिल पाई। अमूल्य रूप से चौथे और पांचवें दिन तक पिच जिस तरह सूखकर टूटती है और उसमें दरारें पड़ती हैं, वैसा इस बार देखने को नहीं मिला। जैसे-जैसे मुकाबला आगे बढ़ा, पिच और अधिक धीमी होती चली गई क्योंकि उसके भीतर नमी बनी रही। मैदान पर जैसे ही रोलर का इस्तेमाल किया गया, विकेट पूरी तरह बैठ गया और जो थोड़ा-बहुत टर्न मिल भी रहा था, वह केवल कुछ खुरदुरे हिस्सों से ही आ रहा था। इसके बावजूद टर्न में वह पैनापन नहीं था और गेंद काफी धीमी गति से आ रही थी, जिससे बल्लेबाजों को संभलने और क्रीज पर टिकने के लिए पर्याप्त समय मिल रहा था। यदि कोई बल्लेबाज अपनी लेंथ से चूक भी जाता था, तो भी धीमी गति के कारण उसे सुधार करने का मौका मिल जाता था।



















