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वैभव सूर्यवंशी के सामने लाल गेंद का नया इम्तिहान, कोच ने दिया 300 गेंदों का बड़ा चैलेंजक्रिकेट
22 अग॰ 2026, 9:50 pm (1 घंटे पहले)· 2

वैभव सूर्यवंशी के सामने लाल गेंद का नया इम्तिहान, कोच ने दिया 300 गेंदों का बड़ा चैलेंज

टी20 और आईपीएल के बाद लाल गेंद के फॉर्मेट में अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए वैभव सूर्यवंशी को उनके कोच ने लंबी पारियां खेलने की सलाह दी है।

क्रिकेट के गलियारों में जब कोई युवा खिलाड़ी अपनी बेखौफ शैली से धूम मचाता है, तो फैंस की निगाहें उस पर टिक जाती हैं। वैभव सूर्यवंशी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। इंडियन प्रीमियर लीग की चकाचौंध से होते हुए हाल ही में इंग्लैंड के खिलाफ टी20 टीम में अपनी जगह बनाने वाले इस युवा खिलाड़ी का सफर बेहद कम समय में काफी रोमांचक रहा है। हालांकि, सीमित ओवरों की तेज-तर्रार दुनिया से निकलकर पांच दिवसीय प्रारूप यानी टेस्ट क्रिकेट की लंबी राह पर कदम रखना पूरी तरह से एक अलग चुनौती है। वैभव के शुरुआती दिनों के मार्गदर्शक मनीष ओझा का मानना है कि छोटे फॉर्मेट में तेजी से सफलता पाना एक बात है, लेकिन भारतीय टेस्ट टीम का स्थायी सदस्य बनना उससे कहीं अधिक कठिन और लंबी तपस्या मांगता है। कोच की साफ अपेक्षा है कि यह युवा बल्लेबाज अब दुनिया के सामने यह साबित करे कि वह सिर्फ ताबड़तोड़ रन बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लाल गेंद के सामने क्रीज पर डटकर 300 गेंदें खेलने का माद्दा भी रखता है।

दलीप ट्रॉफी में उपकप्तानी की बड़ी जिम्मेदारी

वैभव सूर्यवंशी के करियर के लिहाज से लाल गेंद के फॉर्मेट में अपनी योग्यता साबित करने का यह सबसे बेहतरीन अवसर है। आगामी मुकाबलों के लिए उन्हें दलीप ट्रॉफी के तहत ईस्ट जोन का उपकप्तान नियुक्त किया गया है। इतनी कम उम्र में इस स्तर की कमान मिलना चयनकर्ताओं के उनके हुनर पर गहरे विश्वास को बयां करता है। इन चार दिवसीय मैचों में लगातार खेलना उनके खेल की गहराई को परखेगा। हालांकि, मैदान पर वास्तविक रन बनाना ही इस भरोसे की असल कसौटी होगी।

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प्रथम श्रेणी आंकड़ों की सच्चाई और अंडर-19 का दम

यदि वैभव के अब तक के प्रथम श्रेणी क्रिकेट के रिकॉर्ड पर नजर डाली जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि पारंपरिक लाल गेंद के मिजाज में खुद को ढालने की प्रक्रिया अभी शुरुआती दौर में है। उन्होंने अब तक कुल 12 प्रथम श्रेणी पारियों का सामना किया है, जिसमें 17.25 के मामूली औसत के साथ उनके बल्ले से 207 रन निकले हैं। इसके विपरीत, अंडर-19 यूथ टेस्ट मुकाबलों में उनका प्रदर्शन बेहद शानदार रहा है। ऑस्ट्रेलिया अंडर-19 टीम के खिलाफ उन्होंने दो बेहतरीन शतक जमाकर अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया था। यह आंकड़े बताते हैं कि उनके भीतर बड़ी पारियां खेलने की क्षमता मौजूद है, बस जरूरत सीनियर स्तर के लंबे फॉर्मेट में निरंतरता और संयम बनाए रखने की है।

मानसिकता और खेल की गति बदलने का कौशल

कोच मनीष ओझा के अनुसार, वैभव के लिए इस नए सफर में तकनीक से कहीं अधिक बड़ी परीक्षा उनकी मानसिक स्थिति की होगी। टी20 या वनडे जैसे छोटे फॉर्मेट में बल्लेबाज का पूरा ध्यान हर गेंद पर प्रहार करने पर होता है, लेकिन लाल गेंद की स्विंग और सीम मूवमेंट के आगे यह आक्रामक रुख घातक साबित हो सकता है। नई लाल गेंद के सामने संयम बरतना, अनावश्यक जोखिम से बचना और खराब गेंदों के आने का शांत भाव से इंतजार करना ही लंबी पारी की नींव रखता है।

कोच ने इस बात पर जोर दिया है कि वैभव को अब खेल की परिस्थितियों के अनुसार अपने गियर बदलने यानी रन बनाने की रफ्तार को कम-ज्यादा करने की कला सीखनी होगी। टेस्ट क्रिकेट में कभी डिफेंस को मजबूत रखकर गेंदबाजों के तूफान को टालना पड़ता है और मौका मिलते ही स्कोरबोर्ड को गति देनी होती है। ओझा की सीधी सलाह है कि यह युवा खिलाड़ी दुनिया को यह दिखाए कि वह महज 50 या 70 रन तेजी से बनाने वाला हिटर नहीं, बल्कि पिच पर टिककर लंबी पारी बुनने का हुनर भी बखूबी जानता है।

घरेलू क्रिकेट की तपस्या और निरंतरता की चुनौती

आज के दौर में उभरते हुए क्रिकेटरों के पास टी20 मुकाबले खेलने के कई मंच उपलब्ध हैं, लेकिन राष्ट्रीय टेस्ट टीम का द्वार केवल घरेलू क्रिकेट के कड़े संघर्ष से ही खुलता है। रणजी ट्रॉफी और दलीप ट्रॉफी जैसे प्रतिष्ठित घरेलू टूर्नामेंट्स में एक सत्र के दौरान खिलाड़ियों को बहुत सीमित यानी अमूमन 7 से 10 मैच ही खेलने को मिल पाते हैं। मनीष ओझा का कहना है कि टेस्ट टीम में अपनी जगह पक्की करने के लिए इन्हीं गिने-चुने अवसरों में लगातार शतक और दोहरे शतक जड़ने होते हैं। यह निरंतरता किसी एक सीजन के इत्तेफाक से नहीं आ सकती, बल्कि इसके लिए लगातार दो से तीन साल तक घरेलू स्तर पर रनों का अंबार लगाना पड़ता है। इस पूरी यात्रा में उतार-चढ़ाव और नाकामी का सामना भी करना होगा, इसलिए खुद खिलाड़ी के साथ-साथ समर्थकों और चयनकर्ताओं को भी पर्याप्त धैर्य रखना होगा।

नेट्स की मेहनत और भविष्य की संभावनाएं

इन तमाम मुश्किलों के बावजूद कोच को वैभव की क्षमता पर पूरा भरोसा है। उनके मुताबिक, वैभव ने अभ्यास सत्रों के दौरान नेट्स में लाल गेंद के साथ काफी समय बिताया है और जमकर पसीना बहाया है। उनके पास हर तरह की गेंदबाजी का सामना करने के लिए जरूरी बुनियादी तकनीक पहले से मौजूद है। अब सारा दारोमदार इस बात पर टिका है कि यह युवा खिलाड़ी मैदान पर उतरकर अपने टेम्परामेंट को किस प्रकार नियंत्रित करता है। यदि वैभव लाल गेंद के इस कड़े इम्तिहान में खुद को ढालने में सफल रहे, तो भारतीय क्रिकेट को आने वाले समय में एक ऐसा शानदार बल्लेबाज मिल जाएगा जो क्रिकेट के तीनों प्रारूपों पर लंबे समय तक राज करने की क्षमता रखता है।

सवाल-जवाब

वैभव सूर्यवंशी को दलीप ट्रॉफी में कौन सी जिम्मेदारी मिली है?
वैभव सूर्यवंशी को दलीप ट्रॉफी के लिए ईस्ट जोन का उपकप्तान बनाया गया है।
वैभव सूर्यवंशी के बचपन के कोच कौन हैं?
वैभव सूर्यवंशी के बचपन के कोच मनीष ओझा हैं।
प्रथम श्रेणी क्रिकेट में वैभव का प्रदर्शन कैसा रहा है?
उन्होंने अब तक 12 प्रथम श्रेणी पारियों में 17.25 के औसत से 207 रन बनाए हैं।
कोच मनीष ओझा ने वैभव को क्या मुख्य चुनौती दी है?
कोच ने उन्हें लाल गेंद के सामने क्रीज पर डटकर 300 गेंदें खेलने का हुनर दिखाने की चुनौती दी है।
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