बिहार की ऐतिहासिक धरोहरों और सांस्कृतिक प्रतीकों को आधुनिक रचनात्मकता के जरिए सहेजने का एक अनूठा प्रयास भोजपुर में देखने को मिल रहा है। यहां के युवा इंजीनियर प्रशांत बेकार पड़े कबाड़ और औद्योगिक स्क्रैप से विशाल कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं। बिना महंगे संसाधनों के शुरू हुआ यह रचनात्मक प्रयास पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन का भी सशक्त जरिया बन चुका है।
जलपोत के मॉडल से शुरू हुई रचनात्मक यात्रा
तकनीकी शिक्षा पूरी करने के बाद प्रशांत ने अपनी रचनात्मक यात्रा की शुरुआत पानी पर तैरने वाली एक खास नाव बनाकर की थी। इस शुरुआती प्रयोग ने पूरे राज्य का ध्यान उनकी इंजीनियरिंग दक्षता की ओर खींचा। इसके बाद उन्होंने 'वेस्ट टू वंडर' की अवधारणा को अपनाते हुए लोहे, धातु और बेकार पड़ी कबाड़ सामग्री से विशाल मॉडल और आकृतियां गढ़ना शुरू किया। इस पहल का मुख्य उद्देश्य बिहार के अलग-अलग जिलों के विशिष्ट प्रतीकों को कलात्मक रूप में प्रस्तुत करना था।
लीची से लेकर बोधिवृक्ष और बाबू वीर कुंवर सिंह तक
प्रशांत ने मुजफ्फरपुर के प्रमुख चौराहों पर वहां की विश्व प्रसिद्ध शाही लीची की एक विशाल और सुंदर स्क्रैप संरचना स्थापित की, जिसने शहर के सौंदर्य को एक नया रूप दिया। इसके बाद ज्ञान की नगरी गया में उन्होंने पवित्र बोधिवृक्ष की एक बेहद कलात्मक और भव्य प्रस्तुति तैयार की, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी। अब अपने गृह जिले भोजपुर में उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू वीर कुंवर सिंह की वीरता और स्वाभिमान को कबाड़ के जरिए एक विशाल प्रतिमा के रूप में साकार किया है।
वैश्विक अनुभवों को स्थानीय धरातल पर उतारने की पहल
प्रशांत ने अपने विदेशी मित्रों के साथ दुनिया के कई देशों की यात्राएं की हैं। उन यात्राओं के दौरान उन्होंने देखा कि किस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शहरों के सौंदर्यीकरण, सार्वजनिक कला और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में नवाचार का इस्तेमाल होता है। विदेशों में देखे गए इन्हीं आधुनिक तरीकों और अनुभवों को वे अब बिहार के विभिन्न हिस्सों में लागू कर रहे हैं, ताकि राज्य की लोक विरासत को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान मिल सके।
पंद्रह हुनरमंद युवाओं को मिला स्थायी रोजगार
कबाड़ से कलाकृतियां बनाने की यह मुहिम सिर्फ व्यक्तिगत रुचि तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने स्थानीय युवाओं के लिए आजीविका के रास्ते भी खोले हैं। प्रशांत के इस काम से करीब 15 लोग स्थायी रूप से जुड़े हुए हैं। इस टीम में पेशेवर डिजाइनर्स, वेल्डर्स, मूर्तिकार, चित्रकार और संचार विशेषज्ञ शामिल हैं। धातु के टुकड़ों और कबाड़ को तराशने के इस काम ने इन कारीगरों को अपनी कला प्रदर्शित करने का एक मजबूत मंच उपलब्ध कराया है।
प्रशासनिक सहयोग से वैश्विक पहचान बनाने का लक्ष्य
प्रशांत का संकल्प है कि जब भी दुनिया में हस्तनिर्मित कला और रचनात्मक नवाचार का जिक्र हो, तो बिहार का नाम सबसे आगे रहे। उनके इस विजन को जमीन पर उतारने के लिए अलग-अलग जिलों के जिलाधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों से पूरा सहयोग और प्रोत्साहन मिल रहा है। स्थानीय प्रशासन और नागरिकों के समर्थन से वे आज पर्यावरण सुरक्षा, कलात्मक विरासत और रोजगार को एक साथ जोड़ने वाले प्रेरक युवा के रूप में अपनी पहचान बना रहे हैं।



















