हिंदुस्तानी शादियों में रीति-रिवाजों का दायरा सिर्फ सात फेरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह दो परिवारों के अटूट मेल और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। इसी परंपरा का एक बेहद संवेदनशील और सुंदर पहलू वह खास भोजन है, जो विवाह के उपरांत नववधू को उसके ससुराल में पहली बार पेश किया जाता है। नवविवाहिता जब अपनी ससुराल की दहलीज लांघती है, तब से लेकर गृह प्रवेश और रसोई की पहली रस्म तक, खान-पान की हर थाली में मिठास, संपन्नता, शीतलता और नवजीवन के लिए मंगलकामनाओं के गहरे अर्थ समाए होते हैं।
उत्तरी राज्यों में दही और शर्करा से मंगल प्रवेश
उत्तर भारत के बड़े भूभाग में किसी भी नए सफर या पावन काम की शुरुआत से पहले दही में चीनी मिलाकर खिलाने की मजबूत परिपाटी है। वैवाहिक अनुष्ठानों के दौरान भी दूल्हा और दुल्हन दोनों के लिए यह प्रथा विशेष रूप से निभाई जाती है। दही स्वभाव से शांत और शीतल माना जाता है, जबकि चीनी जीवन में मिठास घोलने की प्रतीक है। जब नववधू नए परिवेश में कदम रखती है, तो यह साधारण सा मेल उसके आगामी दांपत्य सफर को मानसिक शांति, सौम्यता और मधुरता प्रदान करने की शुभकामना बन जाता है।
ससुराल की रसोई में खीर और पायसम की पहली मिठास
विवाह के तुरंत बाद कई भारतीय घरों में वधू के हाथों पहली बार रसोई में पकवान तैयार कराने की परंपरा का निर्वाह होता है। इस खास अवसर पर आमतौर पर खीर अथवा दक्षिण भारतीय शैली में पायसम बनाया जाता है। दूध, अक्षत यानी चावल और चीनी के संयोजन से पकने वाला यह मिष्ठान्न पारिवारिक जीवन में शुभता का संचार करने वाला माना गया है। नए आंगन में वधू का पहला भोजन पकाना केवल खाना बनाने की शुरुआत नहीं होता, बल्कि यह ससुराल पक्ष द्वारा नई बहू को घर की अन्नपूर्णा के रूप में स्वीकार करने और आत्मीय स्वागत करने का भावुक जरिया होता है।
गुजरात और राजस्थान के आंगनों में लापसी का मान
पश्चिमी भारत, विशेषकर गुजरात और राजस्थान के जनजीवन में विवाह से जुड़े मांगलिक अवसरों पर लापसी तैयार करने का विशेष विधान देखने को मिलता है। दरदरे गेहूं और शुद्ध गुड़ के मेल से बनने वाली यह पारंपरिक मिठाई वैभव, आर्थिक संपन्नता और शुभता की प्रतीक मानी जाती है। शादी के पूजन तथा अन्य पारिवारिक अनुष्ठानों में लापसी का भोग और वितरण यह संदेश देता है कि नया दांपत्य जीवन गेहूं की तरह पुष्ट और गुड़ की भांति हर रिश्ते में मिठास भरने वाला रहे।
दक्षिण के इलाकों में दूध और अक्षत से जुड़ा पोंगल
तमिलनाडु और दक्षिण भारत के तमाम समुदायों में दूध और चावल से तैयार होने वाले पारंपरिक व्यंजनों, जैसे पोंगल, का धार्मिक और वैवाहिक रस्मों में गहरा स्थान है। वहां दूध को मन और जीवन की शुचिता का प्रतीक माना जाता है, जबकि चावल जीवन निर्वाह, अन्न सुरक्षा और अखंड समृद्धि का द्योतक है। हालांकि हर तमिल घराने में रस्में बिल्कुल एक समान नहीं होतीं, और पारिवारिक कुल परंपराओं तथा समुदायों के अनुसार पकवानों की रीतियों में अपनी विविधता भी मौजूद रहती है।
पंजाब और पश्चिमोत्तर अंचल में दूध और मिठाइयों का सत्कार
पंजाब तथा उसके निकटवर्ती इलाकों में शादी के बाद की बैठकों और रस्मों में मीठा दूध तथा पारंपरिक मिठाइयां परोसने का खास चलन है। नवदंपति और नई बहू के मुंह में मिठास घोलकर परिवार के बड़े-बुजुर्ग यह कामना करते हैं कि दोनों के बीच का संवाद और संबंध सदा स्नेह से परिपूर्ण रहे।
आशीर्वाद और सत्कार का जीवंत सांस्कृतिक आईना
इन तमाम रीतियों का अभिप्राय यह कदापि नहीं है कि किसी खास व्यंजन को चखने मात्र से गृहस्थ जीवन की चुनौतियां स्वतः समाप्त हो जाती हैं। असल में यह भोजन के जरिए नई पीढ़ी को दिया जाने वाला बड़ों का मौन आशीर्वाद और नए सदस्य के प्रति अपनत्व प्रकट करने का माध्यम है। भारत की खूबी यही है कि हर प्रांत का खान-पान अलग होते हुए भी उसके पीछे छुपा मूल भाव एक जैसा रहता है, जो अपनी मिट्टी और संस्कारों की खूबसूरत कहानी बयां करता है।



















